पारा हुआ पचास

01-06-2026

पारा हुआ पचास

डॉ. सत्यवान सौरभ (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

जेठ दुपहरी आग सी, झुलसे खेत-खलिहान। 
पारा चढ़कर बोलता, व्याकुल हुआ जहान॥
 
सूरज बरसे आग जब, तपे धरा आकाश। 
पारा हुआ पचास तो, टूटे जन-विश्वास॥
 
लू के तीखे तीर से, घायल हर इंसान। 
पारा हुआ पचास जब, सूखे तन-मन-प्राण॥
 
पंछी बैठे छाँव में, खोए अपनी तान। 
पारा हुआ पचास तो, मौन हुआ विहान॥
 
सूख गए सब ताल जब, प्यासी हुई बहार। 
पारा हुआ पचास तो, जीना भी दुश्वार॥
 
बिजली भी बेदम हुई, पंखे हुए उदास। 
पारा हुआ पचास जब, छिना गया उल्लास॥
 
नदियाँ माँगें मेघ से, थोड़ी शीतल छाँव। 
पारा हुआ पचास तो, जलते सारे गाँव॥
 
धरती तपती ज्यों तवा, जलते पग-पग पाँव। 
पारा हुआ पचास तो, कठिन लगे हर ठाँव॥
 
बच्चे-बूढ़े सब कहें, कब बरसेगी धार। 
पारा हुआ पचास तो, संकट अपरम्पार॥
 
जल संरक्षण कीजिए, प्रकृति करे पुकार। 
पारा हुआ पचास तो, संकट बारंबार॥
 
काटे हमने वृक्ष सब, भोग रहे परिणाम। 
पारा हुआ पचास तो, कैसे मिले आराम॥
 
धरती माँ की पीर को, समझो हे इंसान। 
पारा हुआ पचास तो, संकट में है जान॥
 
जलती सड़कें पूछतीं, कहाँ गई बरसात। 
पारा हुआ पचास तो, कठिन हुए हालात॥
 
प्रकृति से जो खेलते, सुन लें यह संदेश। 
पारा हुआ पचास तो, संकट में परिवेश॥

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

दोहे
कविता
बाल साहित्य कविता
सामाजिक आलेख
नज़्म
कहानी
ऐतिहासिक
हास्य-व्यंग्य कविता
लघुकथा
ललित निबन्ध
साहित्यिक आलेख
सांस्कृतिक आलेख
किशोर साहित्य कविता
काम की बात
पर्यटन
चिन्तन
स्वास्थ्य
सिनेमा चर्चा
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में

लेखक की पुस्तकें