घर अब भी जाता हूँ . . .

01-05-2026

घर अब भी जाता हूँ . . .

डॉ. सत्यवान सौरभ (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

घर अब भी जाता हूँ, 
वही आँगन, वही दरवाज़ा—
बस फ़र्क इतना है, 
अब कोई मेरा इंतज़ार नहीं करता। 
 
रसोई से ख़ुश्बू तो आती है, 
पर मेरा नाम नहीं लिया जाता। 
माँ पास ही होती हैं, 
पर जैसे मुझसे कुछ कहा नहीं जाता। 
 
पिता . . . 
जो पहले हर बात पूछते थे, 
अब चुप रहते हैं—
जैसे उन्हें मेरी ज़रूरत नहीं। 
 
छोटे की शादी के बाद
घर और भर गया है, 
और मैं . . . 
धीरे-धीरे कम हो गया हूँ। 
 
भाई सामने होता है, 
पर पहले जैसा नहीं। 
बातें होती हैं—अगर काम हो, 
पर उनमें अपनापन कहीं नहीं। 
 
अब मैं अपना टिफ़िन खोलता हूँ
उसी घर के एक कोने में, 
जहाँ कभी मेरा हिस्सा था, 
आज बस मेरी जगह रह गई है। 
 
कोई पूछता नहीं, 
मैं बताता नहीं। 
रिश्ते अब आवाज़ नहीं करते, 
बस ख़ामोशी में बदल जाते हैं। 
 
फिर लौट आता हूँ शहर, 
हर बार थोड़ा ख़ाली होकर। 
घर अब भी मेरा है—
पर मैं . . . अब पहले जैसा नहीं रहा। 

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