कुछ तो कहो गांधारी

01-12-2020

कुछ तो कहो गांधारी

सुशील यादव


समीक्षित उपन्यास: कुछ तो कहो गांधारी
लेखक: डॉ. लोकेन्द्र सिंह कोट
प्रकाशक: कलकार मंच, दुर्गापुरा, जयपुर, राजस्थान
पृष्ठ संख्या: 94
मूल्य: 150 रु.


लेखक प्रकाशक परिचय 

‘कुछ तो कहो गन्धारी‘ उपन्यास के रचयिता डॉक्टर लोकेन्द्र सिंह कोट हैं। १८ फरवरी १९७२ को बडनगर (उज्जैन) म.प्र.में जन्मे श्री कोट पेशे से डॉक्टर हैं, वे संप्रति शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय रतलाम में अध्यापन कार्यरत हैं। उन्हें सराहनीय लेखन के लिए, भारत सरकार एवं राज्य सरकार से अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।

इस पुस्तक को प्रकाशित करने का सौभाग्य ‘कलमकार मंच’ दुर्गापुरा जयपुर को प्राप्त हुआ है।

लेखक ने इसे, समय नदी और स्त्री को समर्पित किया है, जिसकी झलक उपन्यास के हर ताने-बाने में विद्यमान है। लेखक ने आमुख-अभिव्यक्ति में स्वीकार किया है कि गाँव से जुड़ी यादों को शब्द के माध्यम से अभिव्यक्ति देने बाद जो सुकून उनको मिला है वह उसके भीतर के कसमसाहट को विराम देने में या भावनात्मक स्तर पर उसे उऋण करने में सक्षम हुए हैं। 

मेडिकल क्षेत्र, और लेखन, दो ध्रुवों के मेल पर, उनका कहना है, हर चीज़ आर्थिक पहलू के तराजू में रखा नहीं जाता। 

जीवन की विसंगतियों को अपने उपन्यास में उकेरने के प्रयास में, उनके किरदार स्वयं बोलते नज़र आते हैं।

लेखक ने स्वगत बातें करने की अपेक्षा, कभी ‘समय’  को या कभी नदी ’गांधारी’ को प्रत्यक्ष या परोक्ष में पुकारा है या वाचाल बनाया है।

उनका ये मानना कि नदी और स्त्री की अपनी एक कहानी होती है, अपना एक अध्याय होता है, कदाचित, किसी मायने में भी इसमें विसंगति नज़र नहीं आती।

आइये उपन्यास-संक्षेप से परिचय कराएँ: 

“कुछ तो कहो गांधारी”  क़स्बेनुमा गाँव मांडव के आसपास के घटनाक्रम को आरंभ में एक आठ दस बरस के बालक संदीप की स्मृति से जोड़ता है। 

पास बहती गांधारी नदी से लगाव, वहीं एक निश्छल हँसी लिए दूर पहाड़ी से आई उसके स्कूल की ११वीं कक्षा की मदालसा नाम की छात्रा, एक किशोर वय का आकर्षण, चंद मुलाक़ातें। अंतिम एकांत की मुलाक़ात में, बरसात से भीगे युवा संवाद, संदीप के वयस्क आचरण पर मदालसा का चंडी रूप में आक्षेप, कि तुम भी वही निकले . . . छली, कपटी . . . देह के भूखे . . . 

इस घटना बाद संदीप का गुमी हुई, मदालसा को ढूँढ़ने और पछताने के दिन गांधारी नदी के वेग को महसूस करने में व्यय हुए।

उस क़स्बे की हवेली जो अपने साम्राज्य के झंडे गाड़ती थी, आज मालिक ठाकुर के संग, पराभव के दिन देख रही है। नीची जातियों के लिए इसकी हदें वर्जित थीं।आपसी विवाद के चलते विभक्त हवेली में “आटे के डिब्बे भी” बोल जाते थे। नई पीढ़ी ने क़दम बढ़ाए, कुलीन कुल के वंशज नौकरी करने शहर गए। पैसा जो आता वे शाही शौक़ में ख़त्म कर देते। कोई औलाद कामयाबी के परचम उठाने में कामयाब नहीं हुई। आठ भाइयों मे अंतिम ठाकुर ज़िंदा बचे। इस हवेली का वफ़ादार रामदीन, ठाकुर की सेवा में रहता। अवसाद ने ठाकुर को डॉक्टरी लहज़े में बाईपोलर ठहरा दिया था। यहाँ, लेखक ने समय के मार्फ़त आकलन का पर्याय तलाश लिया है। 

हालात के मद्देनज़र कोठी को होटल में तब्दील किये जाने का प्रयास हुआ। ठाकुर साहब को तीन कमरे, आजीवन उस होटल में दिेये जाना तय हुआ। कुंठित कुटुम्बियों को, होटल में तब्दीली, एक अवसर से कम नहीं जान पड़ा| हवेली का फिर से कायाकल्प हो गया था।

हेरिटेज होटल की पहचान मिलने के बाद आदिवासी बहुल इलाक़े में राजनैतिक सरगर्मी बढ़ी। चुनावी साल में गांधारी नदी पर बाँध बनाने की योजना बनी। एनजीओ की उस इलाक़े में सरगर्मी बढ़ गई। गांधारी नदी पर बिसात बिछ गई।
किशोरावस्था पार किये विधुर ठाकुर सा’ को उनके हमउम्र दोस्तों ने, मय-उलाहना के समझाइश दी कि कब औरतें, मर्द को मर्द या कब नामर्द समझती हैं। चार मित्रों ने ठाकुर के मर्दानगी टेस्ट की गोपनीय योजना बनाई। ज़मींदार ठाकुर के बँधुआ मज़दूर रामदीन की पत्नी जो सद्य ब्याहता थी, जिसका लावण्य चर्चित था। नामधन्य वह भी गन्धारी थी। 

यहाँ गन्धारी चयन में ठाकुर को जातिगत आक्षेप था। उस नीच औरत के साथ . . . ? ठाकुर मित्रों ने हवा भर दी . . . नीची ऊँची जात क्या . . . बस शरीर रगड़ना है। सेवक रामदीन को मित्रों ने फँसा लिया, गन्धारी को किसी पूजा के बहाने बुलवा लिया, उसकी मदहोशी में सभी उसकी अस्मत के लुटेरे बन बैठे|

रामदीन इस हादसे से क्षुब्ध सपत्नीक पड़ोस के गाँव में पाँच-छ: वर्षों तक निर्वासित जीवन व्यतीत करने बाद, ज़मीन के मोह में वापस गाँव लौटे। पत्नी सालों बाद एक पुत्री की माता बनी। बचपन से यौवन तक स्निग्ध उन्मुक्त हँसी उसके होठों की शोभा रहती, जिसकी वज़ह से हंसली के दूजे नाम की स्वामिनी बनी। गौना होने की कगार तक अति महत्वाकांक्षी पति विजय, ज्ञान के अतिरेक में धीरे -धीरे पागलपन तक पहुँच के ट्रक हादसे में काल कवलित हो गया। 

कालांतर हंसली की माँ गंधारी भी दुनिया छोड़ गई।

इन सभी पात्रों के नियोजन बाद, नायक संदीप यू एस से जमी हुई नौकरी छोड़ गाँव के मोह में वापस आया। एक एनजीओ जो बत्र्ज़ “गांधारी बचाओ“ पर चल रहा था उसमें शामिल हो गया। आदिवासी अंचल के लोगों का गांधारी बाँध की ऊँचाई में विस्थापित हो जाने के ख़तरे को भाँप कर जो संकल्प संदीप के मन में था उससे कुछ लोग प्रसंशा की नज़र से देखते और मेगासेसे रिवार्ड तक नामित होने पर खुछ विरोधी ख़फ़ा हो रहते।

रिवार्ड मिलने की नौबत सि्र्फ़ नामित होने तक रह गई, अचानक किसी अज्ञात ने एक दिन उसे निशाना बन कई फायरिंग कर दी। संदीप की कालगति में मौत को देख नदी गांधारी जिसके लिए संदीप ने जीवन जिया, चुप रही . . . !
 यहीं आंदोलित हो . . . लेखक कहता है, “कुछ तो कहो गांधारी “ . . .!

 सपाट स्पष्ट, बेलाग अलग लहज़े में लिखा गया यह उपन्यास पठनीय है।

लेखक ने अपनी ऊर्जा, मन के भीतरी तहों को उकेरने का प्रयास जगह -जगह समय को सापेक्ष बना कर किया है। 

वास्तव में समय से बड़ा द्रष्टा कोई नहीं . . . .!

कहीं उपालंभ बतौर, नदी गांधारी अपने वेग में उफनती आती है, जो इस उपन्यास की मूल धारा को एक बाँध में बाँधने का काम करती है। यूँ तो बाँध की ऊँचाई से, वर्तमान पीढ़ी के बाद के फ़ायदे बहुत हैं मगर राजनीति वर्तमान में होती है, जो लोगों के विस्थापन में हुई गड़बड़ी का लेखा-जोखा रख के अपना काम करती है जिसका शिकार कभी-कभी संदीप जैसे पात्र हो जाते हैं।

बहरहाल, श्री लोकेन्द्र सिंह कोट की क़लम से “कुछ तो कहो गांधारी” जैसा उपन्यास रच गया है, वे बधाई के पात्र हैं। उन्होंने पात्र चयन, उनके संवाद निर्वाह और वातावरण को जिस गहनता से व्यक्त किया है वह सराहनीय है।
 

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