हमारी नेशनल टॉफ़ी कौन-सी-लॉलीपॉप या रेवड़ी?
वीरेन्द्र बहादुर सिंह
पार्टी कार्यालय में पुराने सुनहरे दिनों की तरह सेव-ममरा की जगह अब थोड़ी स्टाइलिश झालमूड़ी फाँकी जा रही थी, तभी अचानक आ धमके बड़े नेताओं ने उन्हें डाँटा।
“मूर्खों, कब तक यूँ अतीत में ही खोए रहोगे? हटाओ इस झालमूड़ी को एक तरफ़। अब तो चॉकलेट खाने के ‘अच्छे दिन’ आ गए हैं।”
एक कार्यकर्ता उलझन में पड़ गया।
“नेताजी, अतीत में जीने की आदत तो आपने ही डाली है। हम 60 साल पहले क्या नहीं हुआ, 600 साल पहले क्या हुआ था और 6000 साल पहले हम कितने महान थे, ऐसी सारी पुरानी बातें करके ही तो यहाँ तक पहुँचे हैं।”
हालाँकि दूसरे कार्यकर्ता ने उसे डाँट दिया, “अरे बेवुक़ूफ़, झालमूड़ी अब हमारा राष्ट्रीय अतीत बन चुकी है, चॉकलेट हमारा डिप्लोमैटिक वर्तमान है और सुनहरे भविष्य का गाजर तो हमेशा लटकता ही रहने वाला है।”
इतना सुनते ही एक कार्यकर्ता को अचानक ज्ञान हुआ, “अरे नेताजी, हमारे देश के पास अभी तक कोई राष्ट्रीय टॉफ़ी नहीं है, यह भी कोई बात हुई? यह चॉकलेट तो आख़िर विदेशी चीज़ है। क्यों न हम अपनी राजनीतिक शैली के मुताबिक़ लटकते गाजर को ही राष्ट्रीय टॉफ़ी घोषित कर दें?”
दूसरा कार्यकर्ता बोला, “मेरी नज़र में तो पार्टी और सरकार की परंपरा को देखते हुए कोहनी पर लगाया जाने वाला गुड़ भी राष्ट्रीय टॉफ़ी बनने के पूरी तरह योग्य है। कोहनी पर गुड़ लगाकर न जाने कितने लोगों का कैरियर बन गया। इसकी ख़ासियत यह है कि सरकार जनता को तो लगाती ही है, लेकिन हर चुनाव में नेता हम जैसे छोटे कार्यकर्ताओं को भी कोहनी पर गुड़ लगाते रहते हैं।”
एक कार्यकर्ता जोश में आकर बोला, “हमें ज़रा भी कृतघ्न नहीं बनना चाहिए। सोचो, तरह-तरह की छोटी-बड़ी कितनी ही रेवड़ियों ने हमें चुनाव पर चुनाव जिताए हैं। एक समय था जब हम दूसरी पार्टियों द्वारा बाँटी जाने वाली रेवड़ियों की आलोचना करते थे, लेकिन अब हमने ख़ुद भी जगह-जगह रेवड़ीबाज़ सरकारें बना दी हैं। ऐसे हालात में राष्ट्रीय टॉफ़ी का सम्मान तो रेवड़ी को ही मिलना चाहिए।”
तीसरा कार्यकर्ता बोला, “भाइयों, कब तक गाजर, गुड़ और रेवड़ी में ही उलझे रहोगे? थोड़ा फ़ैंसी भी बनो। क्यों न हम लॉलीपॉप को ही नेशनल टॉफ़ी घोषित कर दें? पुरानी पीढ़ियों को लटकता गाजर दिखाकर या कोहनी पर गुड़ लगाकर हमने पुराने चुनाव जीत लिए, अभी रेवड़ियाँ बाँटकर चुनाव जीत रहे हैं, लेकिन भविष्य के चुनाव जीतने के लिए तो लॉलीपॉप ही आगे रखना पड़ेगा।”
अब तक चुपचाप बची-खुची झालमूड़ी का आख़िरी बुकड़ा खाने में व्यस्त एक पुराने कार्यकर्ता ने कहा, “अरे भाई, जो भी नेशनल टॉफ़ी रखनी हो रखो। इतना तो तय है कि चुनाव जीतने के बाद हम जनता को टॉफ़ी नहीं, बल्कि कड़वी दवा के घूँट ही पिलाते हैं।”
सभी कार्यकर्ताओं ने वफ़ादारी दिखाने के लिए उस कार्यकर्ता की जमकर पिटाई कर दी।
(सरकारी विज्ञापन बुढ़िया के बाल जैसी कॉटन कैंडी होते हैं, जनता चाहे जितना चाटती रहे, पेट कभी नहीं भरता)
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