नोट कहाँ कब बोलते, करते सिक्के शोर

15-06-2026

नोट कहाँ कब बोलते, करते सिक्के शोर

डॉ. प्रियंका सौरभ (अंक: 299, जून द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

नोट कहाँ कब बोलते, करते सिक्के शोर। 
केवल औछे लोग ही, दिखलाते हैं ज़ोर॥
 
धन-दौलत के मद फँसे, भूले सब व्यवहार, 
अहंकारों की आग में, जलता उनका द्वार। 
सच्चे हीरे मौन हैं, झूठे करते शोर—
नोट कहाँ कब बोलते, करते सिक्के शोर॥
 
मीठे वचन ग़रीब के, लगते हैं अनमोल, 
घमंडी की बात में, कहाँ प्रेम के बोल। 
मानवता के सामने, फीके चाँदी-तोर—
नोट कहाँ कब बोलते, करते सिक्के शोर॥
 
ऊँचे होकर वृक्ष भी, झुके ज़मीं की ओर, 
फल से लदकर डालियाँ, कब दिखलाती ज़ोर। 
औछेपन की धूप में, सूखें मन के छोर—
नोट कहाँ कब बोलते, करते सिक्के शोर॥

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