मन पर लाख सवाल

15-06-2026

मन पर लाख सवाल

डॉ. प्रियंका सौरभ (अंक: 299, जून द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

तीस दिनों के दर्द में, बने न जिसकी ढाल। 
उससे चाहो उम्र भर, सेवा फिर हर हाल॥
 
जननी बनते ही नहीं, जन्मे केवल लाल, 
उसके हिस्से आ गया, पीड़ा का भूचाल॥
टूटी नींद, थका बदन, मन पर लाख सवाल—
तीस दिनों के दर्द में, बने न जिसकी ढाल॥
 
तानों की बरसात में, भीग गई मुस्कान, 
“हमने भी सब सह लिया . . . ” सुन-सुन रोए प्राण॥
मरहम की जगह मिले, शब्दों के ही जाल—
तीस दिनों के दर्द में, बने न जिसकी ढाल॥
 
रिश्ते केवल काम से, चलते नहीं जनाब, 
नेह मिले तो घर लगे, वरना सूना ख़्वाब॥
जिस घर में सम्मान हो, वहीं बसे ख़ुशहाल—
तीस दिनों के दर्द में, बने न जिसकी ढाल॥
 
बहू नहीं उपकरण यह, ना सेवा की खान, 
उसके भी अरमान हैं, उसका भी सम्मान॥
प्रेम, सहारा जो मिले, खिल उठे हर हाल—
तीस दिनों के दर्द में, बने न जिसकी ढाल॥

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