माटी अब भी पूछती

01-04-2025

माटी अब भी पूछती

प्रियंका सौरभ (अंक: 274, अप्रैल प्रथम, 2025 में प्रकाशित)

 

पैदा क्यों होते नहीं, भगत सिंह से वीर, 
माटी अब भी पूछती, कब जागेगी पीर? 
 
स्वप्न सिसकते रह गए, कहाँ गई वह बात, 
चिंगारी तो जल रही, राख हुई सौग़ात। 
 
नारे मंच पर गूँजते, हुई ज़ुबां है मौन, 
जोश बिखरकर रह गया, जज़्बा लाये कौन। 
 
होते हैं भाषण बहुत, पर ख़ामोश ज़मीर, 
शब्द बचे हैं युद्ध के, गए कहाँ रणधीर? 
 
भारत माता पूछती, कौन बने क़ुर्बान, 
लाल हुए थे जो कभी, लगते अब अनजान? 
 
सबके हित की बात का, बुझने लगा उबाल, 
सत्ताओं की साँकलें, बाँध रहीं भूचाल। 
 
सत्ताओं की साँकलें, बाँध रहीं तक़दीर, 
ख़ुद को ख़ुद से हारकर, भारत खड़ा अधीर। 

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