बनकर साहूकार वो, करने चले सुधार

15-06-2026

बनकर साहूकार वो, करने चले सुधार

डॉ. प्रियंका सौरभ (अंक: 299, जून द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

जिनके सिर है पाप की, ब्याज समेत उधार। 
बनकर साहूकार वो, करने चले सुधार॥
 
ख़ुद दलदल में धँस चुके, दें जग को उपदेश, 
चेहरे पर सत्संग है, भीतर काला वेश। 
जिनकी करनी चीखती, वो बाँटें संस्कार—
जिनके सिर है पाप की, ब्याज समेत उधार॥
 
लूट-झूठ की रोटियाँ, खाकर हुए जवान, 
आज वही ईमान की, खोल रहे दूकान। 
चोर दरवाज़ों से बढ़े, बन बैठे सरकार—
बनकर साहूकार वो, करने चले सुधार॥
 
कल तक जिनके नाम पर, थूक रहा था गाँव, 
आज वही चरित्र के, बाँट रहे हैं दाँव। 
दर्पण भी शर्मिंदा है, सुन उनके विचार—
जिनके सिर है पाप की, ब्याज समेत उधार॥
 
समय बड़ा निष्पक्ष है, रखता सबका लेख, 
पाप छुपे लाखों तले, सच लेता है देख। 
अंत समय खुल जाएगा, हर चेहरे का सार—
जिनके सिर है पाप की, ब्याज समेत उधार॥

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