अपने प्यारे गाँव से, बस है यही सवाल

01-06-2026

अपने प्यारे गाँव से, बस है यही सवाल

डॉ. प्रियंका सौरभ (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

अपने प्यारे गाँव से, बस है यही सवाल। 
बूढ़ा पीपल है कहाँ, गई कहाँ चौपाल॥
 
माटी की सौंधी महक, अब लगती है दूर, 
कंक्रीटों के बीच में, खो बैठे हम नूर। 
रिश्तों की हर डोर अब, लगती क्यों बेहाल—
अपने प्यारे गाँव से, बस है यही सवाल॥
 
खेल-कूद के दिन गए, छूटा बचपन साथ, 
मोबाइल में क़ैद है, हर रिश्ते की बात। 
हँसी-ठिठोली खो गई, सूना हर घर-द्वार—
अपने प्यारे गाँव से, बस है यही सवाल॥
 
बाबा की वो छाँव थी, माँ का स्नेह अपार, 
कहाँ गए वो लोग सब, कहाँ गया संस्कार। 
टूट गई हर परंपरा, बदला सारा हाल—
अपने प्यारे गाँव से, बस है यही सवाल॥
 
लौट चलें उस ओर अब, जहाँ प्रेम की छाँव, 
पीपल, बड़, चौपाल संग, बसता सच्चा गाँव। 
मन फिर से ये पूछता, ढूँढ़े हर इक हाल—
अपने प्यारे गाँव से, बस है यही सवाल॥

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