अल्केबुलान बनाम अफ़्रीका
डॉ. उषा रानी बंसल
नोट: प्रस्तुत लेख में प्राचीन अल्केबुलान की भौगोलिक, सामाजिक, राजनीतिक और व्यापारिक स्थिति बताने का प्रयास है।
अफ़्रीका का प्राचीन नाम ‘अल्केबुलान’ था। अल्केबुलान का अर्थ था “मानवता की जननी” या “ईडन का बगीचा”। इस नाम का उपयोग मूर, नूबियन, इथियोपियाई, यूनानी, रोमन, खार्ट हैडेन (Khart Haddens) आदि लोग करते थे। अरबी भाषा में इसका अर्थ था “काले लोगों की भूमि”। जब यूरोपीय लोग इस “सुनहरी भूमि” में आए और इसे अपना उपनिवेश बनाया, तो उन्होंने इसका नाम बदलकर ‘अफ़्रीका’ और ‘अफ़्रीका महाद्वीप’ रख दिया। (ठीक वैसे ही, जैसे आक्रांताओं ने ‘भारतवर्ष का नाम ’ पहले ‘हिंदुस्तान’ और फिर बदलकर ‘इंडिया’ कर दिया)
अल्केबुलान की भौगोलिक स्थिति:
अल्केबुलान का क्षेत्रफल 30.33 किलोमीटर है यह विश्व का एकमात्र देश है जहाँ से भूमध्य रेखा Equator, कर्क रेखा Tropic of Cancer, मकर रेखा Tropic of Capricorn तीनों रेखाएँ गुज़रती हैं।
इसकी सीमाएँ उत्तर में भूमध्यसागर Mediterranean Sea, अटलांटिक समुद्र Atlantic ocean, हिंद महासागर Indian ocean, लाल सागर Red Sea तक विस्तृत हैं। स्वेज नहर Swez canal इसे एशिया से अलग करती है।
इसमें 54 अधिकारिक देश हैं। अल्जीरिया का क्षेत्रफल सबसे बड़ा है और नाइजीरिया की जनसंख्या सबसे अधिक है।
अफ़्रीका के उत्तरी भाग में दुनिया का सबसे गर्म मरुस्थल सहारा है और दक्षिण में कालाहारी और नामिब (Namib) मरुस्थल हैं।
इसके उत्तर-पश्चिम में एटलस पर्वतमाला है। विश्व की सबसे लम्बी नदी नील नदी यहाँ पर है। इसके अतिरिक्त कांगो नाइजर जैसी नदियाँ भी हैं जो मीठे पानी का स्रोत हैं।
अफ़्रीका में बहुत से खनिज पदार्थ पाये जाते हैं जैसे प्राचीन काल में सोने, तांबा Copper की खानें। लोहा व लोहे का सामान Iron, नमक की खदान, चंदन की लकड़ी, हाथी दाँत, कछुए का खोल, शुतुरमुर्ग के पंख, कौड़ी, Ebony आबनूस आदि बहुतायत में थे।
अल्केबुलान के विभिन्न भागों और राज्यों में रहने वालों की भाषा अलग-अलग थी। अलग-अलग प्रदेशों के निवासियों के नाम भी भिन्न-भिन्न थे जैसे मालिनके (Malinke), अमाजिघ (Amazighs), बर्बर (Berber), बंटूस (Bantus) आदि।
इस तरह अल्केबुलान में प्राकृतिक सम्पदा का भंडार था, परन्तु कुछ देशों में खेती-बाड़ी मुख्य व्यवसाय था। गन्ने की खेती बहुतायत में होती थी। आर्थिक दृष्टि अल्केबुलान एक सम्पन्न स्वायत्त महाद्वीप था।
सामाजिक स्थिति:
अल्केबुलान में प्राचीन समय में समाज का कोई वर्गीकरण नहीं था। इनका समाज समतामूलक था। स्त्री-पुरुष में कोई बड़ा या छोटा नहीं था। इनका समाज मुख्यतया क़बीलाई था। परिवार का मुखिया ही परिवार का लालन-पालन करता था।
अफ़्रीका के समाज में विशाल भौगोलिक और ऐतिहासिक विविधता थी। यहाँ 3,000 से अधिक विभिन्न जातीय (ethnic) समूह निवास करते थे। जिनमें से प्रत्येक की अपनी अलग भाषाएँ, कला, और सामाजिक संरचनाएँ थीं। यह महाद्वीप अपनी समृद्ध जनजातीय परंपराओं, सामुदायिक जीवन और प्राचीन संस्कृति के लिए जाना जाता था। सामुदायिक भावना और संयुक्त परिवार वहाँ की विशेषता थे। अफ़्रीकी समाज में ‘उबुंतु’ (Ubuntu) जैसी विचारधाराओं का बहुत महत्त्व था, जिसका अर्थ है ‘मैं हूँ क्योंकि हम हैं।’ यहाँ व्यक्तिगत संपत्ति से ज़्यादा ‘समुदाय और परिवार’ को प्राथमिकता दी जाती थी। बड़े संयुक्त परिवारों में बुज़ुर्गों का सर्वोच्च सम्मान था और उन्हें निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त था। धर्म और आध्यात्मिकता का अफ़्रीका के समाज पर बहुत प्रभाव था। अफ़्रीका का समाज जातीय और सांस्कृतिक विविधता की विशेषताओं के आधार पर समझा जा सकता है।
अफ़्रीकी समाज में तब परिवर्तन आना प्रारंभ हुआ जब वहाँ पर इस्लाम धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ। अरब जो अफ़्रीका के सबसे पास थे उन्होंने उत्तरी अफ़्रीका पर विजय प्राप्त कर ली। वहाँ इस्लाम के निवासियों को मुस्लिम बनाया। जैसे-जैसे इस्लाम का प्रभाव बढ़ता गया वैसे-वैसे अफ़्रीकी समाज व सामाजिक मान्यताओं में परिवर्तन आना प्रारंभ हो गया। उत्तरी अफ़्रीका से दक्षिणी अफ़्रीका तक इस्लाम धर्म को स्वीकार करके वहाँ के निवासी मुस्लिम बन गये। इसके साथ ही इस्लामिक नियम, क़ानून, शिक्षा, कला व संस्कृति को भी वहाँ के व्यक्तियों ने अपना लिया। इस तरह कालांतर में 30% अफ़्रीका मुस्लिम हो गया।
यूरोपीय देशों में मुख्यतया पुतर्गालिओं से सम्पर्क में आने के बाद मध्य और दक्षिणी अफ़्रीका में ईसाई धर्म को मानने वालों की संख्या में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई। मुस्लिम और ईसाई धर्मों के प्रचार-प्रसार के बाद भी अफ़्रीकी समाज अपनी प्राचीन प्रकृति पूजा और पूर्वजवादी परम्पराओं का पालन करते रहे। उनकी आजीविका का प्रमुख साधन आखेट और कृषि था। कुछ जनजातियाँ जैसे केन्या के लोग पशुपालन भी करते थे। अफ़्रीका की जनजातियाँ जंगलों और प्राकृतिक वातावरण में जीवनयापन करती थीं।
विवाह:
प्राचीन अफ़्रीका में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं था वरन् दो परिवारों व समुदायों के बीच गहरा सामाजिक और आध्यात्मिक सम्बन्ध माना जाता था। यह एक सामुदायिक उत्सव होता था। वहाँ दहेज़ जैसी प्रथा नहीं थी। इसमें दूल्हा परिवार, वधू परिवार को उपहार में मवेशी या धन देता था। यह वधू के परिवार के नुक़्सान की भरपाई माना जाता था और दोनों परिवारों के बीच अटूट सम्बन्ध का प्रतीक था। बहु-विवाह भी प्रचलित थी। यह पुरुष की सामाजिक प्रतिष्ठा, धन और बड़े परिवार का सूचक थी। एक और प्रकार का विवाह भी प्रचलित था। कुछ पश्चिमी और उप-सहारा समाजों में महिलाओं को सम्पत्ति या भूमि पर अधिकार सुरक्षित रखने के लिए महिलाओं का अन्य महिला से विवाह भी प्रचलित था। विवाह उत्सव में कई दिनों तक नृत्य और दावत होती थी। स्थानीय शराब का सेवन होता था। संगीत और जश्न के माध्यम से पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता था। कुछ परिवारों में विवाह से पूर्व लड़का लड़की साथ में समय बिताते थे जिससे एक दूसरे को समझ सकें।
प्राचीन अफ़्रीका में वेश भूषा:
प्राचीन अफ़्रीकी समाज का पहनावा मुख्य रूप से वहाँ के मौसम, स्थानीय संसाधनों और सांस्कृतिक मान्यताओं पर आधारित था। इसमेंं प्राकृतिक रूप से उपलब्ध पौधों की छाल, घास, पत्तियों और जानवरों की खाल का उपयोग होता था। शुरूआत में लोग पेड़ों की छाल, सूखी घास और पत्तों को लपेटकर शरीर ढकते थे। (ऐसा विश्व भर में था) बाद में, ठंड और धूप से बचने के लिए जानवरों की खाल का प्रयोग किया जाने लगा। समय के साथ सूती वस्त्रों और हथकरघा कला का विकास हुआ। घाना में निर्मित ‘केंटे’ (Kente) और ‘अदिंक्रा’ (Adinkra) जैसे कपड़ों से बने पारंपरिक प्रतीकों के वस्त्र विश्व में भर में प्रसिद्ध हो गये। पारंपरिक समाज, जैसे मसाई जनजाति, में चमकीले रंगों (विशेषकर लाल रंग) को बहुत महत्त्व दिया जाता था। मोतियों से बने पारंपरिक आभूषण (Beads) इस पहनावे का अभिन्न अंग थे। बौबू (Boubou) मुख्यतया पश्चिम और उत्तरी अफ़्रीका में पहना जाने वाला एक लंबा, ढीला और चौड़ी आस्तीन वाला वस्त्र था। कफ्तान पूरे महाद्वीप में तथा दशिकी (ढीला ढाला कुर्ता) सुंदर कढ़ाई वाला पश्चिमी अफ़्रीका की पारम्परिक पोशाक थी।
राजनैतिक स्थिति:
प्राचीन समय में अफ़्रीका में कोई राजनैतिक विभाजन नहीं था। लेकिन इस्लाम के प्रचार-प्रसार के साथ जैसे-जैसे मुस्लमानों की संख्या बढ़ती गई वैसे-वैसे इस्लामिक प्रशासनिक व्यवस्था का प्रचलन होता गया। अल्केबुलान, अफ़्रीका में सोने की बहुत सी खानें थीं। सोने व तांबा आदि खनिज पदार्थों के कारण कुछ क्षेत्र बहुत धन सम्पन्न थे। इनका आपस में पारस्परिक व्यापार था। यह व्यापार मुख्यतया वस्तुओं के आदान प्रदान (Barter system) से होता था। नमक का प्रयोग व्यापार में स्थानीय मुद्रा के रूप में होता था जो स्वर्ण से भी अधिक मूल्यवान था।
इस काल में अफ़्रीकी महाद्वीप उन देशों में विभाजित नहीं था जैसा कि हम आज जानते हैं। उत्तरी अफ़्रीका में जो मूल साम्राज्य थे, वे थे: मोरक्को, अल्जीरिया की रीजेंसी, ट्यूनिस की रीजेंसी, त्रिपोली की रीजेंसी और मिस्र।
पश्चिमी अफ़्रीका में मूल साम्राज्य थे: सोंघाई, माली (आज का मॉरीशस), बामाना, अशांत (असांते), ओयो, बोर्नू, और आधुनिक नाइजीरिया में हौसा राज्य।
मध्य और दक्षिणी अफ़्रीका में मुख्य राज्य थे: कांगो, क्यूबा, न्दोंगो, मतम्बा, लुबा, लुंडा, मुतापा (आधुनिक मोज़ाम्बिक)।
पूर्वी अफ़्रीका और अफ़्रीकी हॉर्न क्षेत्र में इथियोपिया (एबिसिनिया) की सल्तनत, सेन्नार, स्वाहिली नगर-राज्य, अजुरान सल्तनत और मेरिना साम्राज्य स्थित थे।
ये सभी मूल साम्राज्य थे और आपस में व्यापार करते थे। इनमें से कई साम्राज्य बहुत समृद्ध और ख़ुशहाल थे। कुछ को ‘सुनहरे पक्षी’ (Golden Birds) के नाम से जाना जाता था।
जब अरब लोगों ने पहले उत्तरी अफ़्रीका पर विजय प्राप्त की, और फिर धीरे-धीरे उनका प्रभाव पश्चिमी अफ़्रीका तक फैल गया। अरब व्यापारियों ने अफ़्रीका के विभिन्न क्षेत्रों से व्यापार करना प्रारंभ किया। यह व्यापारिक मार्ग ट्रांस-सहारा मार्ग कहा जाता था। इन व्यापार मार्गों के माध्यम से वाणिज्य के साथ-साथ अफ़्रीका में इस्लामी आस्था का भी प्रसार हुआ, जिसने अफ़्रीकी समाजों को आर्थिक लाभ, प्रशासनिक साधन और एक साक्षर संस्कृति प्रदान की।
मुसलमान बनने के बाद, उन्हें कई पक्षों के बीच ऋण (क्रेडिट) और वचन-पत्रों (promissory notes) के प्रचलन से व्यापार का विस्तार करने में सहायता मिली। ये सभी पत्र किसी कारवां के निवेशक के होते थे। इसके साथ वह एक व्यापक सूचना नेटवर्क से जुड़ गया। इस व्यापार मार्ग के बीच-बीच में मरुद्यान (oasis) थे। जो नगर संचार और आदान-प्रदान के केंद्रों के रूप में कार्य करते थे।
यह क्षेत्र अरब के सबसे निकट स्थित था। यूँ तो अरब व्यापारी और विद्वान प्राचीन काल से ही ट्रांस-सहारा और नील घाटी के स्थल मार्गों से यात्रा करते आ रहे थे। जब इस्लाम सहारा के दक्षिण में स्थित सवाना क्षेत्र तक पहुँचा, तो वहाँ के शासक अफ़्रीकी अभिजात वर्ग ने इसे अपना लिया; कुछ मामलों में तो उन्होंने इसे अपनी पारंपरिक मान्यताओं के साथ मिला भी दिया—इस प्रक्रिया को ‘समन्वयवाद’ (Syncretism) कहा गया।
अफ़्रीका में इस्लाम के आने से लिखित अभिलेखों की प्रथा शुरू हुई, जो व्यापार के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हुए। और लिखित क़ानूनों का आधार प्रशासन को सुदृढ़ बनाने के लिए अत्यंत मूल्यवान साबित हुआ। मुस्लिम प्रशासनिक व्यवस्था व नियम क़ानून इन देशों ने अपना लिए। जिससे मुस्लिम शिक्षा, साहित्य, विभिन्न कलाओं का वहाँ पर विकास हुआ। इस्लाम स्वीकार करने वाले क्षेत्रों का इस्लामीकरण हो गया। जिसका परिणाम यह हुआ कि विभिन्न अफ़्रीकी साम्राज्य जैसे माली की दौलत और ख़ुशहाली ने पूरी इस्लामिक दुनिया के विद्वानों और क़ानून के जानकारों को अपनी ओर आकर्षित किया। चौदहवीं सदी में मनसा मूसा ने टिम्बकटू के ट्रेडिंग सेंटर को मस्जिदें और स्कूल बनाकर बदल दिया, जो इस्लामिक पढ़ाई और ज्ञान के भंडार बन गए। ट्रांस-सहारन कॉमर्स ने माली में सार्वजनिक कामों के विकास को भी बढ़ावा दिया, जिसमें सामाजिक और धार्मिक इमारतें बनाना शामिल था। पश्चिम अफ़्रीका जाने वाले यात्री यहाँ की स्थापत्य कला से बहुत प्रभावित हुए।
इस राजनीतिक विकास के फलस्वरूप विभिन्न देशों में अपना साम्राज्य बढाने की प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हो गई। उपर्युक्त देशों में साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का जन्म हुआ। इन सल्तनतों व साम्राज्यों में पारस्परिक युद्ध शुरू हो गया। कुछ देश समृद्धि के शिखर पर पहुँच कर जल्दी ही धाराशाई होने लगे। नये-नये देशों का, समुद्रतटीय देशों (Coastal City States) के निर्माण, उत्थान-पतन की गाथा शुरू हो गई। प्राचीन साम्राज्य के पतन से अफ़्रीका में अशांति व अराजकता फैलने लगी। आने वाली यूरोपीय शक्तियों को अफ़्रीका में पैर जमाने का मौक़ा मिल गया।
पारस्परिक युद्ध आम बात हो गई। पराजित राज्य के युद्ध बंदियों को अफ़्रीका के मध्य भाग Interior में तथा खेतीबाड़ी के काम के लिए बेचा जाने लगा। जिसने बाद में बहुत बड़े दास व्यापार का रूप धारण कर लिया।
अफ़्रीकी समाज जो पहले समतामूलक था उसका वर्गीकरण हो गया। इस सब उथल-पुथल में व्यापारियों, शक्तिशाली राजाओं, सुल्तान, मियाँ आदि को बहुत धन सम्पदा प्राप्त हुई परन्तु साधारण जनता की, सामुदायिक व्यवस्था के छिन्न भिन्न होने से बहुत हानि हुई। वह आम-से दास, ग़ुलाम बन बिक्री का सामान बन गई।
नोट: यह लेख पाठ्यक्रम की पुस्तकें तथा एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका तथा एक दो विश्वविद्यालय की साइट से देख कर लिखा है।
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