अफ़्रीका और दास व्यापार
डॉ. उषा रानी बंसल
प्रस्तुत लेख में ‘दास’ का अर्थ तथा अफ़्रीका में दास व्यापार कब शुरू हुाआ और यूरोपीय शक्तियों की दास व्यापार में क्या भूमिका थी? उससे किसको क्या लाभ हुआ? इस पर विचार किया गया है।
इस लेख को लिखने के समय यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यह लेख १५-१८ शताब्दी में अफ़्रीकी दास व्यापार के बारे में ही है। यूँ तो विश्व भर में दास प्रथा के बारे में बहुत से ऐतिहासिक प्रमाण हैं।
यहाँ दास, ग़ुलाम तथा शूद्र को एक श्रेणी में रखने या समझने, तुलना करने का प्रयास नहीं किया गया है। इन शब्दों को स्पष्ट करना आवश्यक है।
दास अथवा ग़ुलाम कौन—शूद्र कौन? शूद्र पारंपरिक हिंदू वर्ण (जाति) व्यवस्था के चौथे और सबसे निचले तबक़े का सदस्य होता है। जहाँ एक ओर शूद्रों को गंभीर सामाजिक और धार्मिक पाबंदियों का सामना करना पड़ता था, वहीं दूसरी ओर वे क़ानूनी तौर पर वह आज़ाद नागरिक थे, न कि किसी की संपत्ति। (मनु संहिता)
दास तथा ग़ुलाम कौन? ग़ुलाम वह व्यक्ति होता है जिस पर क़ानूनी तौर पर किसी दूसरे व्यक्ति का मालिकाना हक़ होता है; उसे संपत्ति की तरह माना जाता है और उसके पास कोई मानवाधिकार नहीं होता था। (मनु संहिता)
दास और ग़ुलाम तथा शूद्र में निम्नलिखित अंतर थे और हैं:
1. क़ानूनी दर्जा और मालिकाना हक़
दास, ग़ुलाम: इन्हें चल संपत्ति (निजी संपत्ति) की तरह माना जाता था। इन्हें ख़रीदा, बेचा, बदला या विरासत में पाया जा सकता था, और इनसे बिना किसी मुआवज़े के पूरी तरह ज़बरदस्ती काम करवाया जाता था।
उदाहरण के लिया आप बाज़ार से आलू खरीदें तो उसे भूने, काटें, आलू टिक्की बनायें या सूप . . . आपकी मर्ज़ी। सब्ज़ीवाला कुछ नहीं कह सकता।
शूद्र: क़ानूनी तौर पर आज़ाद नागरिक होता है। इन्हें शादी करने, ज़मीन ख़रीदने, धन जमा करने (हालाँकि ऐतिहासिक रूप से कुछ ग्रंथों में इस पर पाबंदी थी), और अपनी संपत्ति अपने बच्चों को देने की आज़ादी थी।
2. काम का स्वरूप
ग़ुलाम: इन्हें वह हर काम करने के लिए मजबूर किया जाता था जिसकी मालिक माँग करता था; इनके पास कोई क़ानूनी सहारा नहीं होता था।
शूद्र: आमतौर पर ये मज़दूर, कारीगर, किसान, शिल्पकार और सेवा देने वालों के तौर पर काम करते थे। हालाँकि इनका तय फ़र्ज़ ऊँची जातियों की सेवा करना था, फिर भी इन्हें आमतौर पर इनके काम के बदले मज़दूरी या फ़सल का कुछ हिस्सा दिया जाता था।
धार्मिक और सामाजिक स्थिति
ग़ुलाम: इन्हें धार्मिक और सामाजिक समुदाय से बाहर रखा जाता था, और आमतौर पर इनके पास सामाजिक तौर पर आगे बढ़ने का कोई मौक़ा नहीं होता था।
शूद्र: ये हिंदू सामाजिक ढाँचे का एक अहम हिस्सा थे। हालाँकि इन्हें उपनयन (पवित्र धागा पहनने की रस्म) से वंचित रखा जाता था और वेदों का अध्ययन करने की मनाही थी, फिर भी वे व्यापक हिंदू धर्म और सामुदायिक जीवन में पूरी तरह से शामिल थे। प्रत्येक अनुष्ठान में इनकी उपस्थिति का विधान था।
दास और ग़ुलाम
‘दास’ शब्द को लेकर भ्रम: वास्तव में प्राचीन हिंदू ग्रंथों में ‘दास’ शब्द का इस्तेमाल करने से हो गया है। जिसका मूल अर्थ ‘सेवक’ होता था, लेकिन बाद के संदर्भों में इसका अनुवाद ‘ग़ुलाम’ के तौर पर किया जाने लगा। ऐतिहासिक रिकॉर्ड दिखाते हैं कि कर्ज़ में डूबे लोगों या युद्धबंदियों को कुछ समय के लिए ग़ुलामी में रखा जा सकता था। हालाँकि, यह एक तरह की अनुबंधित मज़दूरी थी, न कि हमेशा के लिए संपत्ति के तौर पर की जाने वाली ग़ुलामी। प्राचीन क़ानूनी संहिताएँ (जैसे कि अर्थशास्त्र) ख़ासतौर पर आज़ाद लोगों (आर्यों) को ग़ुलाम बनाए जाने से बचाती थीं।
अफ़्रीका के मिस्र (इजिप्ट) के पिरामिडों को बनानेवाले मज़दूर थे ऐसा इतिहास में उल्लेख मिलता है। वह ग़ुलाम या दास नहीं थे।
अफ़्रीका में विभिन्न देशों, साम्राज्यों के मध्य होने वाली लड़ाई में जो युद्धबंदी होते थे उन्हें दूसरे अफ़्रीकी देशों में बेचने-ख़रीदने की प्रथा का उल्लेख मिलता है।
आपको ज्ञात होगा कि भारत का स्थल मार्ग से अफ़्रीका-अरब होते हुए बेबीलोन, मेसोपोटामिया और रोम तक व्यापारिक सम्बन्ध था। परन्तु भारत में उत्पादित सामान को उपभोक्ताओं तक पहुँचने में बहुत से मध्यस्थों से होकर गुज़रना पड़ता था। जिससे सामान की क़ीमत बहुत बढ़ जाती थी। सामान कुछ ही रॉयल, राजपरिवार तथा धनसम्पन्न वर्ग ही ख़रीद पाते थे। चीन और भारत से जाने वाला सामान दुर्लभ व नायाब होता था। उसकी माँग बहुत अधिक थी। अफ़्रीका के कुछ देश बहुत धनसम्पन्न और सम्पदा के भंडारों से भरे हुए थे। इसी कारण विश्व व्यापार में उनकी भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण थी। उसी ने पहली वैश्विक अर्थव्यवस्था की नींव रखी थी। नौवीं से पंद्रहवीं सदी के दौरान, व्यापारिक कारवाँ नियमित रूप से सहारा रेगिस्तान से गुज़रते थे। वे दूर पश्चिमी अफ़्रीका से सामान मिस्र और उत्तरी अफ़्रीका के व्यापारिक केंद्रों तक पहुँचाते थे, और वहाँ से आगे, या तो भूमध्य सागर पार करके दक्षिणी यूरोप तक, या फिर ज़मीन के रास्ते सिनाई प्रायद्वीप होते हुए निकट पूर्व (आधुनिक सीरिया, जॉर्डन, लेबनान और इज़राइल) के लेवांत क्षेत्र तक जाते थे। वहाँ से, पश्चिमी अफ़्रीका का सामान ‘सिल्क रोड’ (रेशम मार्ग) के ज़मीन पर बने पश्चिमी छोर में से किसी एक तक पहुँच जाता था—जैसे कि लेबनान का तटीय शहर टायर, और उससे भी आगे अंदरूनी इलाक़ों में, सीरिया का अलेप्पो। इस प्रकार, अफ़्रीका इस विशाल व्यापारिक उद्यम के कारण बहुत उन्नत और सम्पतिशाली हो गया। उसके कई देश सोने की चिड़िया (Go।den Bird) कहे जाते थे।
वास्कोडिगामा जब भारत जाने का समुद्री मार्ग खोजते-खोजते अफ़्रीका पहुँचे गया, तब उसने केप आॉफ़ गुड होप से पश्चिमी तट से होते हुए उतमाशा अंतरीप पहुँच कर नये उपमहाद्वीपों की खोज की। उसके बाद पश्चिमी देशों ने अपने युद्धपोत और जहाज़ी बेड़े नये-नये समुद्री मार्ग खोजने के लिए समुद्र में उतार दिए। अफ़्रीका के बारे में जब से पश्चिमी देशों को पता चला तब से संसार ने अफ़्रीका के विभिन्न भागों से व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करना प्रारंभ किया। यह वह समय था जब पश्चिमी देश ग़रीबी से जूझ रहे थे। (विशेष रूप से पुर्तगाल) वह धन अर्जित करने के लिए नये मार्ग खोजने में लगे थे। (आज यह स्वीकार करना कठिन है कि वह कभी ग़रीब थे, इंग्लैंड तीन से अधिक देशों में बँटा था) इसी समय पश्चिम में बहुत सी भौगोलिक, तथा वैज्ञानिक खोजें हुईं, जैसे कम्पास, एस्ट्रोलेब (Astro।abe), कैरावल (Caravel) का आविष्कार हुआ जो समुद्री यात्रा में बहुत सहायक सिद्ध हुआ। इसे भौगोलिक खोजों का युग कहा गया।
इन भौगोलिक खोजों का लाभ उठा कर, व्यापार के लिए अधिक सुगम तथा छोटे समुद्री मार्ग खोजते-खोजते पुर्तगाली जहाज़ी बेड़े अफ़्रीका के तटों पर पहुँच गये। उनका इरादा यूरोप में चीन व भारत से आने वाले नायाब सामान को स्वयं ख़रीद कर यूरोप में अन्य देशों में बेचने का था। वह अरब और ट्रांस-सहारा थल मार्ग के स्थान पर जलमार्ग से व्यापार करना चाहते थे। इस तरह पश्चिमी देशों ने समुद्री मार्ग से अफ़्रीका के तटीय प्रदेशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करना प्रारंभ कर दिया।
सबसे पहले उन्होंने मलक्का से व्यापार करना प्रारंभ किया। मलक्का पूर्व और पश्चिम के बीच एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था। जलडमरूमध्य के सँकरे मार्ग पर मलक्का का नियंत्रण था। उसका भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन के बीच एक सीधा मार्ग पर नियंत्रण था। मलाका क्षेत्र का मसालों के व्यापार पर एकाधिकार था। पुर्तगाली इस व्यापार पर एकाधिकार करना चाहते थे। वर्ष 1521 में पुर्तगालियों ने मलाका पर आक्रमण कर दिया। वहाँ पुर्तगालियों ने व्यापार पर एकाधिकार जमाने का प्रयास ही नहीं किया वरन् वहाँ के व्यक्तियों को ईसाई बनाने लगे। इसका इतना पुरज़ोर विरोध हुआ कि मलक्का में उनके प्रवेश पर रोक लगा दी गई। लेकिन अँग्रेज़ों को मलक्का से व्यापार करने दिया गया क्योंकि वह केवल व्यापार कर रहे थे।
पश्चिमी देशों ने जापान, चीन कोरिया के साथ भी व्यापारिक सम्बन्ध बढ़ाये। लेकिन पुर्तगाली, स्पेन द्वारा वहाँ के नागरिकों को ईसाई बनाने के कारण वहाँ से भी निकल दिया गया। मलक्का के साथ यूरोपीय शक्तियों का 15वीं सदी में अफ़्रीका से व्यापारिक सम्बन्ध शुरू हुआ। इस समय माली साम्राज्य अफ़्रीका में सबसे बड़ा व शक्तिशाली था। पुर्तगालियों ने उनसे सम्पर्क करके ‘सेंट जॉर्ज ऑफ़ द माइन’ (St. George of the Mine) में क़िला बनवाया, जिसे बाद में ‘एलमिना’ (Elmina) कहा जाने लगा। लेकिन इससे पहले भी ‘अकलेबुलान’ (Aklehbulan) का अस्तित्व था और उसके विश्व के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे जैसा ऊपर लिखा जा चुका है। सोंघाई तथा माली साम्राज्यों में सोने, तांबा, नमक, बहुमूल्य रत्नों की खानें थीं इसीलिए पुर्तगालियों ने अपना व्यापार वहाँ से शुरू किया। पश्चिमी अफ़्रीका से सोने आदि के व्यापार के अतिरिक्त वह बेनिन से ग़ुलामों को ख़रीद कर उन्हें आज के घाना और कोटे डी आइवर में स्थित ‘अकान’ (Akan) खदानों तक पहुँचाने में मध्यस्थ की भूमिका भी निभाने लगे। एलमिना अफ़्रीका के अंदरूनी इलाक़ों में स्थित ग़ुलामों की ख़रीद-फ़रोख़्त का माध्यम बन गया।
अफ़्रीका में जब बड़े साम्राज्य स्थापित हुए तो उन्होंने अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिये आसपास के देशों से युद्ध करना प्रारंभ कर दिया। इन पारस्परिक गृहयुद्धों में जो युद्धबंदी बना लिये जाते थे उन्हें दास या ग़ुलाम की तरह बेचा जाने लगा। अफ़्रीकी शक्तियों ने इन दासों को पुर्तगालियों को बेचने की इच्छा जताई। पुर्तगाली जो नये-नये तरीक़ों से, कभी कौड़ी व्यापार पर, कभी गन्ने की खेती पर एकाधिकार कर धन कमाने का प्रयास कर रहे थे, उन्होंने गन्ने की खेती करनी शुरू की। गन्ने के बाग़ानों के लिए भारी संख्या में श्रमिकों की आवश्यकता थी। पंद्रहवीं सदी तक, पुर्तगालियों ने सेनेगैम्बियन तट तक अपनी पहुँच बना ली और अर्गुइन द्वीप (ट्रांस-सहारन व्यापार मार्गों का एक हिस्सा) पर अमाज़ी बस्तियों पर हमला किया, लोगों को ग़ुलाम बनाकर इबेरियन बाग़ानों में ले गए। जहाँ उन्होंने गन्ने की लाभदायक खेती प्रारंभ की थी। गन्ने की खेती ने पुर्तगालियों को ग़ुलामों को ख़रीदने तथा उनका व्यापार करने का एक नया अवसर प्रदान किया।
जैसे-जैसे साओ टोमे (São Tomé) में बाग़ान-आधारित अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ, ग़ुलाम श्रमिकों की आवश्यकता भी बढ़ती गई। पंद्रहवीं शताब्दी के अंत तक, यह द्वीप यूरोप को चीनी की आपूर्ति करने वाला सबसे बड़ा एकल स्रोत बन गया था, और यहाँ ग़ुलाम श्रमिकों की एक विशाल आबादी बस गई थी, जिन्हें ये एल्मिना से प्राप्त करते थे। बाद में, पुर्तगालियों ने ग़ुलामों के व्यापार को अपना मुख्य व्यापार बना लिया, क्योंकि गन्ने की खेती की तुलना में दास व्यापार अधिक लाभदायक था।
पुर्तगालियों ने ग़ुलामों का व्यापार कर पश्चिमी देशों को व्यापार का नया मार्ग दिखाया। इस मार्ग का अनुसरण करके डच, स्पेनिश, फ़्राँसीसी और अँग्रेज़ ने भी ग़ुलामों का व्यापार शुरू कर दिया। उन्होंने भी वहाँ अपनी व्यापारिक चौकियाँ स्थापित कर लीं।
पश्चिमी देशों के व्यापारियों में अधिक से अधिक ग़ुलाम ख़रीदने की होड़ मच गई। इस आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण तनाव बढ़ने लगा तब अफ़्रीकी राजव्यवस्थाओं ने ग़ुलाम व्यापार का विरोध करना शुरू कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, यूरोपीय लोगों और अफ़्रीका के व्यक्तियों और राज्यों के बीच युद्ध छिड़ गया।
सोलहवीं सदी में पुर्तगालियों ने वहाँ के ग़ुलाम व्यापार के स्वरूप को पूरी तरह से बदल दिया। पुर्तगाल, स्पेन, इंग्लैंड, फ़्राँस और नीदरलैंड के आग्नेयास्त्र, बंदूकें, बारूद, निर्मित वस्तुएँ अफ़्रीका के व्यापारियों को उपलब्ध कराने लगे। पश्चिमी अफ़्रीकी राज्य और तटीय राज्य इनके प्रति आकर्षित हो गये। अब सोना, ताबां, आदि वस्तुओं के बदले अफ़्रीकी व्यापारी बंदूक, आग्नेय अस्त्र-शस्त्र ख़रीदने लगे। जिसके बदले पश्चिमी व्यापारी ग़ुलाम ख़रीदने लगे। यह व्यापारिक आदान-प्रदान उन राज्यों में प्रारंभ हुआ, जो सोंघाई साम्राज्य के पतन के बाद गिनी की खाड़ी और अटलांटिक तट के किनारे-किनारे बसे थे। व्हिडाव, डहोमी जैसे राज्य यूरोप व्यापारियों को बंदी, युद्ध बंदी उपलब्ध कराने लगे इसके बदले में वह यूरोप व्यापारियों से बंदूकें जैसी वस्तुएँ ख़रीदने लगे। दासों को ख़रीद कर अमेरिका भेजना शुरू हो गया।
इसने अफ़्रीकी समाज की प्रकृति, जो समतावादी थे, को ही बदल दिया। अफ़्रीकी राज्यों का सैन्यीकरण होने लगा। जिसने अफ़्रीकी व्यापार की दशा व दिशा ही बदल दी। इसने अफ़्रीकी परिवारों, सामाजिक तथा राज्यों की स्थिरता समाप्त कर दी। अफ़्रीकी विकास रुक ही नहीं गया वरन् पतन के रसातल में चला गया।
अफ़्रीकी सरदारों ने इसे अमीर बनने का एक नया रास्ता समझा। इसलिए, लगातार होने वाले युद्धों में सैनिकों को बंदी बनाने पर अधिक बल दिया जाने लगा। उन्हें पकड़ कर ग़ुलामों के तौर पर बेच दिया जाता था। भूमध्य सागर के किनारे और पश्चिमी अफ़्रीका के तटीय इलाक़ों में बंदियों को पकड़ने और उन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाने पर नया ज़ोर दिया जाने लगा। इसका परिणाम यह हुआ कि तट के किनारे बसे कई राज्य महज़ उन रास्तों की तरह बन गए, जिनसे होकर उन बंदियों के काफ़िले गुज़रते थे, जिन्हें यूरोपीय ग़ुलाम-व्यापारियों के बाज़ारों में ले जाया जाता था।
(This engraving records part of Henry Morton Stanley's journeys through Africa। Stanley also hired porters from Tippu Tib, who was considered a “king” in the Zanzibar slave trade) this is originally like this
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि पूरे अफ़्रीका ने ग़ुलामों के व्यापार में हिस्सा नहीं लिया। अफ़्रीका के 2000 जातीय समूहों में से, औपनिवेशिक काल से पहले के राज्यों के सिर्फ़ 30 समूहों ने ही ग़ुलामों के व्यापार में हिस्सा लिया। 1970 समूहों का इससे कोई लेना-देना नहीं था। इसमें हिस्सा लेने वाले मुख्य राज्य थे: घाना का अशांति साम्राज्य, डहोमी, ओयो (नाइजीरिया), अलाडा, विदाह और बेनिन का राज्य, कांगो (पश्चिमी मध्य अफ़्रीका), सेनेगल/गाम्बिया, फुलानी, मैंडिंगो, मोरक्को, मिस्र, अयो संघ और माली।
पश्चिमी सहारा में, यह रास्ता तघाज़ा से टिम्बकटू तक जाता था। वहाँ से पूरब की ओर, एक दूसरा रास्ता नख़लिस्तान वाले शहर घादामेस को हौसालैंड के व्यापारिक केंद्रों से जोड़ता था। आख़िर में, एक ऐसा रास्ता भी था जो भूमध्य सागर के किनारे बसे एक बड़े बंदरगाह वाले शहर त्रिपोली को अफ़्रीका के भीतरी मध्य भाग में स्थित बोर्नू से जोड़ता था। इस तरह सत्रहवीं शताब्दी में अफ़्रीका में ग़ुलाम व्यापार का तेज़ी से विस्तार हुआ।
अठारहवीं शताब्दी में अफ़्रीका में दास/ग़ुलाम व्यापार
ग़ुलाम व्यापार का निजीकरण: 18वीं सदी में अफ़्रीका के कुछ हिस्सों में नए विस्तारवादी राज्य उभरे, जैसे कि डहोमी और सेगू। वे पकड़े गए लोगों को यूरोपीय लोगों को बेच रहे थे। दास व्यापार के उदय और उससे होने वाले लाभों ने अफ़्रीकी राज्यों के बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता का मार्ग प्रशस्त किया। तटीय क्षेत्रों में दास व्यापार का निजीकरण शुरू हो गया। इसका परिणाम यह हुआ कि तटीय दास व्यापारिक बाज़ारों में ग़ुलाम बनाए गए लोगों की संख्या में भारी वृद्धि हुई।
इस व्यापार से अफ़्रीका के व्यापारियों और यूरोपीय राष्ट्रों, दोनों को लाभ हुआ। यह व्यापारिक कंपनियों और ट्रांस-सहारा दास व्यापार केंद्रों के लिए एक वरदान साबित हुआ। इन राज्यों ने युद्ध को जीवन शैली के रूप में अपना लिया गया। कुछ राज्यों ने स्वयं को सैन्य रूप से सुदृढ़ बना लिया।
हालाँकि, समग्र रूप से समाजों को इससे कोई लाभ नहीं हुआ, और न ही उन लोगों को, जिन्हें ग़ुलाम बनाया गया था।
परिणामस्वरूप, इसने तत्कालीन परिस्थितियों और ट्रांस-सहारा व्यापार के दायरे को बदल दिया। गिनी की खाड़ी पर स्थित ‘बाइट ऑफ़ बेनिन’ के तटीय क्षेत्र को ‘स्लेव कोस्ट’ के नाम से जाना जाने लगा। पश्चिमी अफ़्रीका में यूरोपीय लोगों के आगमन के साथ ‘'व्हिडा’ (Whydah) ग़ुलाम व्यापार का मुख्य केंद्र बन गया।
ट्रांसअटलांटिक ग़ुलामों के व्यापार को यूरोपियन शिपिंग, यूरोपियन फ़ाइनेंस, यूरोपीयन क़ानूनी व्यवस्था, यूरोपियन बाग़ों में दासों की बढ़ती माँग ने बहुत बढ़ावा दिया। नेशनल आर्काइव के अनुसार पुर्तगाल और इंग्लैंड ने कुल अफ़्रीकी ग़ुलामों में से 70% ग़ुलाम अमेरिका में बेचे थे। जिन्हें ग़ुलाम बनाया गया वह अधिकतर पीड़ित अफ़्रीकी थे, अपराधी नहीं थे। उन्हें घेर कर ज़बरदस्ती ग़ुलाम बनाया गया था।
जैसा कि नीचे के चित्र में दिखाया गया है:
स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय में इस पर जो शोध हुए उनमें स्पष्ट तौर पर लिखा गया कि ग़ुलामों के व्यापार में 17-18वीं सदी में अफ़्रीकी लोगों की तस्करी की गई। उनकी जाँच पड़ताल के अनुसार 17-18वीं शताब्दी में रीजनल ट्रेडिंग नेटवर्क से अमेरिका के प्लांटेशन उद्योगों के लिए अफ़्रीकी ग़ुलामों को समुद्र मार्ग से अमेरिका ले जाया गया और वहाँ बाँटा, तथा बेचा गया।
स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के तुलनात्मक अध्ययन केंद्र के शोध के अनुसार इस हिंसक-अफ़्रीकी मानव तस्करी ने यूरोपियन और अमेरिकन उद्योगों को बैंकिंग से लेकर मैन्यूफ़ैक्चरिंग, आधारभूत संरचना व पूर्वावश्यकता में ग़ुलामी करवा कर ख़ुद को अमीर बनाया। औपनिवेशिक व्यवस्था को पोषित किया। पश्चिमी संसार में सुदृढ़ अर्थव्यवस्था व्यवस्था की नींव रखी। अमेरिका एक विकसित देश बन कर उभरा।
यह मानव तस्करी कितने बड़े परिमाण पर की गई उसके लिए अफ़्रीका से ले जाने वालों के आँकड़ों पर नज़र डालना आवश्यक है।
आंकड़े बोलते हैं:
1. 1601-1700 ई. के बीच, अफ़्रीका के पश्चिमी और मध्य तटों से लगभग 1.3-1.5 मिलियन (13 से 15 लाख) बंदियों का व्यापार किया गया।
2. 18वीं शताब्दी (1701-1800 ई.) में, लगभग 6.1 मिलियन (61 लाख) लोगों को जहाज़ों पर चढ़ाया गया।
3. ब्रिटिश और फ्रांसीसी जहाज़ों ने 2.5 मिलियन (25 लाख) दासों को अमेरिका की बाग़ान अर्थव्यवस्थाओं के लिए माल के रूप में पहुँचाया।
4. इस दास व्यापार में अंगोला (जो अब कांगो है), की हिस्सेदारी 39% थी।
5. बेनिन की खाड़ी और बियाफ्रा की खाड़ी (जो अब नाइजीरिया, बेनिन और कैमरून हैं), की संयुक्त हिस्सेदारी 35% थी।
6. गोल्ड कोस्ट (जो अब घाना है) ने लगभग 10% दासों की आपूर्ति की, और व्हिडा तट से 37,800 बंदियों को बाहर ले जाया गया।
यह भी एक ऐतिहासिक सत्य है कि एक बार सेगो (Segou) की सेना द्वारा पकड़े या कब्ज़े में लिए जाने के बाद, उनके सामने दो संभावित विकल्प होते थे: उन्हें ट्रांस-सहारा दास व्यापार के हिस्से के रूप में रेगिस्तानी ख़ानाबदोशों को बेचा जा सकता था, या उन्हें उन कारवाँ व्यापारियों को बेचा जा सकता था जो ‘दास तट’ (Slave Coast) पर यूरोपीय दास व्यापारियों के साथ व्यापार करते थे।
दास व्यापार का परिणाम
दास व्यापार या मानव तस्करी विश्व के इतिहास की सबसे निंदनीय, घृणित अमानवीय त्रासदी है। यह चित्र ग़ुलामों की दशा को दिखा रहा है:
अफ़्रीका के समाज पर इसका परिणाम यह हुआ कि युवा आबादी कम हो गई।, स्त्री-पुरुष, लड़कों को ग़ुलाम बना कर बेच दिया। जिससे वहाँ की जनसंख्या में भारी गिरावट आ गई। कुछ क्षेत्र बिल्कुल उजड़ गये। कुछ में केवल वृद्ध और अपंग, बीमार ही बचे रह गये। सब जगह भुखमरी फैल गई। अफ़्रीकी समाज व्यवस्था तबाह हो गई। अफ़्रीकी समाज जो समतामूलक, उगंटू दर्शन पर आधारित था, उसका वर्गीकरण हो गया। अफ़्रीका का जनसांख्यिकी विकास रुक गया। पारिवारिक संरचनायें बिखर गईं। लिंग अनुपात बिगड़ गया। इस व्यापार ने अफ़्रीका की पारम्परिक कृषि व्यवस्था नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। अर्थ व्यवस्था केवल मनुष्यों को पकड़कर ग़ुलाम बना कर अधिक से अधिक संख्या में बेचने पर आधारित हो गई। समाज में अमीर और ग़रीब के बीच गहरी खाई बन गई।
आर्थिक दृष्टि से अफ़्रीका के देश जो कभी सोने की चिड़िया कहलाते थे, जिनके पास अपार प्राकृतिक खनिज सम्पदा के भंडार थे, वह सब यूरोपीय व व्यापारियों ने हस्तगत कर उसे निर्धन बना दिया। इस हस्तगत किये कच्चे माल, खनिज पदार्थों का उपयोग कर यूरोपीयन ने पूँजीवाद, औद्योगिकीकरण और वैश्विक औपनिवेशिकवाद की नींव डाली। अफ़्रीका का व्यापार जो पहले भारत, चीन से लेकर मेसोपोटामिया, रोम तक फैला था वह सिकुड़ कर दास व्यापार तक सीमित हो गया। इस व्यापार ने अफ़्रीका की पारम्परिक कृषि व्यवस्था नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। अर्थ व्यवस्था को केवल मनुष्यों को पकड़ कर ग़ुलाम बना कर अधिक से अधिक संख्या में बेचने तक सीमित हो गई। यूरोपीयनों ने अफ़्रीका की उन्नत सभ्यता संस्कृति को बदनाम कर, (एक अंग्रेज़ी कहावत है, to kill a dog, give it a bad name) अफ़्रीका की संस्कृति व सभ्यता को नष्ट कर पाश्चत्य सभ्यता को उन्नत विकासशील सभ्यता दिखा कर उसका प्रचार-प्रसार किया। (पाश्चात्य सभ्यता दूसरों के शोषण और हेन-तेन अपना उल्लू सीधा करने पर आधारित थी, जिसे उन्होंने महिमा मंडित किया) अफ़ीकियों के पेट पर लात ही नहीं मारी वरन् उनका आत्मविश्वास, आत्मगौरव, आत्मसम्मान सब छीन कर उनके पैरों तले की ज़मीन ही छीन ली। स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की शोध (CCSRE) में लिखा है कि “. . . this violent trafficking enriched European and American industries-from banking to manufacturing-foundation an economic foundation for the modern Western world, while leaving black population with generational inequality.”
यूरोपियन और अमेरिका के देशों पर इसका प्रभाव यह हुआ कि उसने विश्व को एक दूसरी घिनौनी, अमानवीय होड़ में लगा दिया। स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की शोध ने निष्कर्ष के तौर पर लिखा कि:
व्यापार और अत्यधिक लाभदायक बाग़ानी फ़सलों (चीनी, कपास, तंबाकू) से उत्पन्न धन यूरोप में जमा हो गया, जिससे पूँजीवाद प्रारंभ हुआ। पूँजी के संचय ने औद्योगिक क्रांति को धन उपलब्ध करने में मदद की।
इससे वैश्विक बंदरगाहों का विकास हुआ। प्रमुख यूरोपीय बंदरगाह शहर—जैसे ब्रिटेन में लिवरपूल और ब्रिस्टल, और फ़्राँस में नैनटेस—दास जहाज़ों और आयातित सामानों के सीधे केंद्र के रूप में बहुत तेज़ी से विकसित हुए।
वैश्विक वर्चस्व ने त्रिकोणीय व्यापार को बढ़ावा दिया। इसने वैश्विक व्यापार मार्गों पर एकाधिकार स्थापित करने के पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता को जन्म दिया। जिससे यूरोपीय देशों में राजनीतिक और क्षेत्रीय शक्ति का भारी विस्तार हुआ। आपसी संघर्ष हुआ।
अफ़्रीका की राजनीति पर इसका दूरगामी प्रभाव पड़ा। अफ़्रीकी देशों में सैन्यीकरण का प्रारंभ हुआ। अफ़्रीकी देश बंदूक आदि युद्ध के सामानों की आपूर्ति के लिए वह यूरोपीय शक्तियों पर निर्भर होते चले गये। व्यापार का आधार ही बदल गया। खनिज पदार्थों व कृषि उत्पादों, नमक, भारत और चीन में बने सामानों के स्थान पर अफ़्रीकी ग़ुलाम हो गये। इससे अफ़्रीकी देशों में पारस्परिक युद्धों में तेज़ी आई। तटीय क्षेत्रों में नित नये राज्य अस्तित्व में आने लगे और शीघ्र उनका विनाश होने लगा। अधिक से अधिक ग़ुलाम पकड़ने के लिए निरंतर युद्ध करना अनिवार्य हो गया। अफ़्रीका में राजनैतिक अस्थिरता हो गई। राज्य व्यवस्था, प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा गई। सरकारी राज-काज ठप्प हो गया। क़ानून और न्याय व्यवस्था का लोप हो गया। केवल अमानुषिक तरीक़े से ग़ुलामों को जहाज़ों पर लादने-लदवाने का काम शुरू हो गया। चित्र में जहाज़ पर ग़ुलामों का ज़बरदस्ती लदान देखिए:
इन घटनाओं से स्थानीय राज्यों में हिंसा फैल गई। आंतरिक विनाश और विखंडन ने अफ़्रीकी समाजों को स्वाभाविक रूप से कमज़ोर बना दिया। जिससे 19वीं सदी में यूरोपीय उपनिवेशीकरण की नींव पड़ गई। इसके साथ ही पाश्चात्य देशों ने अफ़्रीका में उपनिवेश, कॉलोनी बसाना शुरू कर दिया। अफ़्रीका का विभाजन इसका परिणाम था। इस तरह अफ़्रीका तथा अफ़्रीकी व्यक्तियों का नए लिबास में शोषण का युग प्रारंभ हुआ।
18वीं सदी तक वह केवल व्यक्तियों को ग़ुलाम बना रहे थे, अब उन्होंने उनके देशों पर अधिकार कर, पूरे क्षेत्र में कॉलोनियाँ बसा कर नये ढंग से शोषण का काम शुरू कर दिया। हद तो यह हो गई कि पश्चिमी देशों ने आपस में अफ़्रीका का विभाजन कर लिया। अब वहाँ राजनैतिक अव्यवस्था पैदा करते रहते हैं।
(ग़ुलाम व्यापार के बचाव में यह तर्क दिया जाता है कि “अफ़्रीकी लोगों ने यह अपने साथ ख़ुद किया।”) लेकिन इसके पीछे सत्य को समझना चाहिए। क्योंकि शोषणकारी व्यवस्थाएँ अक्सर स्थानीय संगठनों, संस्थाओं की सहायता से ही सम्भव होती हैं, जबकि वे ख़ुद—माँग और सत्ता की बड़ी संरचनाओं से संचालित होती हैं। दुनिया के कई क्षेत्रों में मानवीय शोषण देखने को मिला है। महत्त्वपूर्ण तथ्य व्यापार का पैमाना और नैतिकता, स्पष्टता होती है। नुक़्सान सदा उस देश का, देशवासियों का होता है जहाँ यह प्रतिस्पर्धा होती है)
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- ऐतिहासिक
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- 1857 की क्रान्ति के अमर शहीद मंगल पाण्डेय
- 18वीं और 19वीं शताब्दी के दौरान भारत में उद्योग
- अफ़्रीका और दास व्यापार
- अल्केबुलान बनाम अफ़्रीका
- औपनिवेशिक भारत में पत्रकारिता और राजनीति
- जापान का यूरोपीय व्यापारियों से सम्बन्ध और ईसाई मिशनरियों का देश निकाला
- पतित प्रभाकर बनाम भंगी कौन?
- भारत पर मुस्लिम आक्रमणों का एक दूसरा पक्ष
- शतरंज के खिलाड़ी के बहाने इतिहास के झरोखे से . . .
- सतत वैज्ञानिक अनुसंधान और भाषा
- सत्रहवीं सदी में भारत की सामाजिक दशा: यूरोपीय यात्रियों की दृष्टि में
- सोलहवीं सदी: इंग्लैंड में नारी
- स्वतंत्रता आन्दोलन में महिला प्रतिरोध की प्रतिमान: रानी लक्ष्मीबाई
- बाल साहित्य कविता
- यात्रा-संस्मरण
- शोध निबन्ध
- कहानी
- स्मृति लेख
- चिन्तन
- सांस्कृतिक कथा
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- इक्कसवीं सदी में कछुए और ख़रगोश की दौड़
- कलिकाल में सावित्री व सत्यवान
- क्या तुम मेरी माँ हो?
- जब मज़ाक़ बन गया अपराध
- तलवार नहीं ढाल चाहिए
- धन व शक्ति की कहानी
- नये ज़माने में लोमड़ी और कौवा
- भेड़िया आया २१वीं सदी में
- मुल्ला नसीरुद्दीन और बेचारा पर्यटक
- राजा प्रताप भानु की रावण बनने की कथा
- रोटी क्या है?: एक क़िस्सा मुल्ला नसीरुद्दीन का
- सांस्कृतिक आलेख
- बच्चों के मुख से
- आप-बीती
- लघुकथा
- कविता
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- आई बासंती बयार सखी
- आज के शहर और कल के गाँव
- आशा का सूरज
- इनके बाद
- उम्मीद का सूरज
- उलझनें ही उलझनें
- उसकी हँसी
- ऊँचा उठना
- कृष्ण जन्मोत्सव
- चित्र बनाना मेरा शौक़ है
- जाने समय कब बदलेगा
- ज़िंदगी के पड़ाव ऐसे भी
- पिता को मुखाग्नि
- प्रिय के प्रति
- बिम्ब
- बे मौसम बरसात
- बेटी की विदाई
- भारत के लोगों को क्या चाहिये
- मैं और मेरी चाय
- मैसेज और हिन्दी का महल
- राम ही राम
- लहरें
- लुका छिपी पक्षियों के साथ
- वक़्त
- वह
- संतान / बच्चे
- समय का क्या कहिये
- स्वागत
- हादसे के बाद
- होने न होने का अंतर?
- होरी है……
- सामाजिक आलेख
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- कुछ अनुभव कुछ यादें—स्लीप ओवर
- दरिद्रता वरदान या अभिशाप
- पूरब और पश्चिम में शिक्षक का महत्त्व
- भारतीय नारी की सहभागिता का चित्रांकन!
- मीडिया के जन अदालत की ओर बढ़ते क़दम
- वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय लोकतंत्र में धर्म
- सनातन धर्म शास्त्रों में स्त्री की पहचान का प्रश्न?
- समान नागरिक संहिता (ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में)
- हास्य-व्यंग्य कविता
- ललित निबन्ध
- रेखाचित्र
- बाल साहित्य कहानी
- यात्रा वृत्तांत
- हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- साहित्यिक आलेख
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