ठंडे दिल के योद्धा

15-05-2026

ठंडे दिल के योद्धा

वीरेन्द्र बहादुर सिंह  (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

शब्दों के शस्त्रागार में बैठे
कुछ शान्तिप्रिय साहित्यकार, 
मौन की तलवारें चमकाते
विचारों के करते व्यापार। 
 
बाहर धधकती आग समय की, 
भीतर चाय की भाप उठे, 
दुनिया जलती रहे किनारों पर, 
ये भावों के काग़ज़ चुनें। 
 
किसी ने कहा
युद्ध तो हमने देखा है पहले, 
अकादमी की सभा में, 
जहाँ शब्द बाण बनते थे
और मुस्कानें छलती थीं दबे में। 
 
दूसरा बोला
हम शाश्वत के राही हैं मित्र, 
क्षणिक हलचल से क्या लेना? 
हम तो पीड़ा को भी रूपक बना
आत्मा का रस ही हैं बुनना। 
 
पर कहीं भीतर
एक बूढ़ा नवोदित काँप उठा
क्या सचमुच हम इतने दूर हो गए
कि मनुष्य की चीख़
हमारे छंदों तक नहीं पहुँचती? 
 
युद्ध
सिर्फ़ बारूद नहीं होता, 
वह भूख की दरारों में पलता है, 
वह विस्थापन की थकान में रोता है, 
वह माँ की आँखों में
बिना आँसू के बहता है। 
 
पर यहाँ 
युद्ध का अर्थ बदल जाता है, 
वह पुरस्कार की घोषणा में ढलता है, 
वह प्रायोजित यात्राओं में सजता है, 
वह लाइक्स और कमेंट्स की
संख्या में सिमट जाता है। 
 
कितना विचित्र है यह संसार
जहाँ मृत्यु समाचार बनती है, 
और संवेदना
एक उचित अवसर की प्रतीक्षा करती है। 
 
कवि कहता है
मूड आएगा तो लिखूँगा, 
जैसे दर्द भी
उसकी सुविधा का अनुचर हो। 
 
कहानीकार सोचता है
जहाँ पाठक हैं, वहीं सत्य है, 
जैसे युद्ध भी
पसंदों की गिनती से तय हो। 
 
निबंधकार तौलता है
पुरस्कार मिलेगा या नहीं? 
जैसे विचार भी
बाज़ार में बिकने वाली वस्तु हों। 
 
और आलोचक
वह तो सबसे सजग है, 
उसे युद्ध का पहला असर
भोजन-रद्द होने में दिखता है। 
 
ओह! 
कैसा अद्भुत युग है यह
जहाँ त्रासदी की परिभाषा
प्रीतिभोज के रद्द होने से तय होती है। 
 
कहीं कोई शहर जलता है, 
कहीं कोई बच्चा
अपने खिलौनों के साथ दफ़न होता है, 
कहीं कोई सैनिक
अपना नाम इतिहास में खो देता है
और यहाँ 
चाय-बिस्किट के बीच
संवेदनाएँ डुबोकर खा ली जाती हैं। 
 
क्या यही है साहित्य? 
क्या यही है मनुष्यता? 
या यह केवल
एक सुंदर ढंग से सजा हुआ पलायन है
जहाँ हम शब्दों की ओट में
सत्य से बचते हैं? 
 
शायद
साहित्यकार होना
युद्ध से दूर रहना नहीं, 
बल्कि
उसकी ज्वाला को
अपने भीतर महसूस करना है। 
 
शायद
शान्तिप्रिय होना
मौन रहना नहीं, 
बल्कि
अन्याय के विरुद्ध
धीरे-धीरे जलना है। 
 
और शायद
सबसे बड़ा युद्ध
बाहर नहीं, 
भीतर होता है
जहाँ 
संवेदना और सुविधा
आमने-सामने खड़े होते हैं, 
जहाँ 
सत्य और स्वार्थ
एक-दूसरे को परखते हैं। 
 
जो उस युद्ध में हार गया
वह चाहे जितने शब्द लिखे, 
वह केवल लेखक रहेगा, 
साहित्यकार नहीं। 
 
और जो जीत गया
वह भले ही मौन रहे, 
उसका हर शब्द
मानवता का घोष होगा। 
 
इसलिए
हे ठंडे दिल के कवियों, 
एक बार अपने भीतर झाँको, 
देखो
क्या अब भी कुछ जलता है वहाँ? 
 
यदि हाँ, 
तो वही अग्नि
तुम्हारा सच्चा काव्य है। 
 
यदि नहीं
तो फिर
तुम्हारे शब्द भी
राख ही हैं। 

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