पुरुष की ख़ामोशी

15-05-2026

पुरुष की ख़ामोशी

वीरेन्द्र बहादुर सिंह  (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

कभी जो बोलता था खुलकर, 
हँसी में अपनी दुनिया ढोता था, 
आज वही पुरुष ख़ामोश है
जैसे शब्दों का कोई सागर
अचानक सूख गया हो भीतर। 
 
वह ख़ामोश क्यों है? 
क्या इसलिए
कि बचपन से ही उसे सिखाया गया
रोना नहीं, तुम लड़के हो! 
और उसने अपने आँसू 
दिल की किसी अँधेरी तह में
चुपचाप दफ़ना दिए? 
 
या इसलिए
कि हर बार जब वह टूटा, 
किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखकर नहीं पूछा, 
तुम ठीक हो? 
बल्कि कहा गया
मज़बूत बनो। 
 
वह ख़ामोश है, 
क्योंकि उसके दर्द की भाषा
किसी ने सीखी ही नहीं। 
 
घर की ज़िम्मेदारियों के नीचे
दबा उसका मन, 
हर महीने की कमाई में उलझा उसका अस्तित्व, 
अपने सपनों को गिरवी रखकर
दूसरों की ख़ुशियों का घर बनाता रहा
और ख़ुद
एक अधूरा कमरा बनकर रह गया। 
 
वह ख़ामोश है, 
क्योंकि समाज ने उसके हिस्से
बस कर्त्तव्य लिखे, 
अधिकार नहीं। 
 
जब वह थककर बैठना चाहता है, 
उसे याद दिलाया जाता है
तुम घर के आधार हो। 
 
जब वह टूटता है, 
उसे कहा जाता है
तुम ही तो सहारा हो। 
 
तो वह
अपने टूटे हुए टुकड़ों को
ख़ुद ही जोड़ता है, 
और मुस्कान का एक मुखौटा पहनकर
फिर खड़ा हो जाता है। 
 
वह ख़ामोश है, 
क्योंकि उसके प्रेम को
कमज़ोरी समझा गया, 
उसकी संवेदनाओं को
मज़ाक़ बना दिया गया। 
 
जब उसने किसी से दिल की बात कहनी चाही, 
उसे हल्के में लिया गया
और फिर उसने तय किया
कि अब चुप ही रहना बेहतर है। 
 
वह ख़ामोश है, 
क्योंकि हर रिश्ते में
उसे मज़बूत दिखना पड़ा
चाहे वह बेटा हो, 
पति हो, 
पिता हो, 
या भाई। 
 
उसकी ख़ामोशी
कमज़ोरी नहीं है
यह एक लंबी लड़ाई का परिणाम है, 
जिसे वह बिना आवाज़ के लड़ रहा है। 
 
उसकी ख़ामोशी में
दर्द भी है, 
थकान भी है, 
त्याग भी है, 
और कहीं न कहीं
एक अधूरी पुकार भी है
कि कोई तो हो
जो बिना पूछे समझ ले, 
जो बिना शर्त सुने, 
जो कहे
तुम भी इंसान हो, 
तुम्हें भी रोने का हक़ है। 
 
पुरुष ख़ामोश है, 
क्योंकि उसकी आवाज़
सदियों से अनसुनी है। 
 
लेकिन याद रखना
उसकी ख़ामोशी के पीछे
एक तूफ़ान छुपा है, 
और जिस दिन वह बोलेगा, 
वह सिर्फ़ शब्द नहीं होंगे
वह उसकी पूरी ज़िन्दगी की कहानी होगी। 

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