धरती का दोहन 

15-05-2026

धरती का दोहन 

वीरेन्द्र बहादुर सिंह  (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

धरती रोई थी चुपके-चुपके, 
जब हमने उसकी छाती चीरी, 
लोहे के दाँतों वाली मशीनें, 
ले आईं कैसी अंधी पीरी। 
 
नदियों का जल बांधों में बाँधा, 
तालाबों की साँसें छीनी, 
कुओं की कोख हुई है सूनी, 
सूख गई हर बूँद महीनी। 
 
हमने सोचा धरती माता, 
सब कुछ सहक़र देती जाएगी, 
हम जितना भी लूटेंगे उससे, 
वो चुपचाप सहती जाएगी। 
 
पर अब उसके होंठ फटे हैं, 
माथे पर तपती रेखाएँ हैं, 
वन कटे तो आँधी उठती है, 
खेतों में जलती व्यथाएँ हैं। 
 
किसने छीना पंछी का घर, 
किसने बादल रोक दिए हैं, 
किसने पर्वत काट-काट कर, 
लोभ के दरवाज़े सी दिए हैं। 
 
भूगर्भ का पानी खींच रहे हम, 
जैसे कोई अंत न होगा, 
लेकिन हर ख़ाली होती नस में, 
कल का कैसा संताप सँजोया। 
 
धरती की धड़कन धीमी पड़ती, 
कम्पन उसके भीतर जागे, 
हमने समझा केवल मिट्टी है, 
उसके भी तो अपने भाग हैं। 
 
खेतों में हरियाली चाही, 
नलकों से जल बहता छोड़ा, 
जिस जल से जीवन पलता था, 
उसे स्वार्थों ने रेत में मोड़ा। 
 
शहरों ने जंगल निगल लिए हैं, 
धुएँ ने सूरज ढक डाला, 
नदियों में ज़हर घोल दिया है, 
नीला आकाश हुआ काला। 
 
पहले सावन गीत सुनाता, 
अब बादल डर-डर कर आते, 
कहीं बाढ़ें सब कुछ बहा दें, 
कहीं लोग प्यासे रह जाते। 
 
धरती जब संतुलन खोएगी, 
ऋतुओं का संगीत बिखर जाएगा, 
जहाँ हिमालय श्वेत खड़ा था, 
वहाँ आँसू का सागर आएगा। 
 
समुद्र उठेगा बाँह पसारे, 
किनारों को निगलने ख़ातिर, 
शहरों की ऊँची अट्टालिकाएँ, 
ढूँढ़ेगीं बचने की राहें फिर। 
  
मछुआरे सूने जाल लिए, 
किसान निहारें सूखे खेत, 
बच्चे पूछें कि जल कैसा होता? 
उत्तर देगा कौन विशेष? 
 
धरती केवल पत्थर नहीं है, 
वो माँ है, अन्नपूर्णा है, 
उसकी गोदी से ही हमने, 
सीखी हर भाषा, हर प्रार्थना है। 
 
जब तुम कुल्हाड़ी लेकर जाते, 
पेड़ों की गर्दन काटने को, 
सोचना, छाँव भी मर जाती है, 
जीवन का रिश्ता बाँटने को। 
 
जब तुम बटन दबाकर पानी, 
बेमतलब यूँ बहने देते, 
सोचना कोई गाँव कहीं पर, 
सूखी मटकी लेकर रोते। 
 
जब फ़ैक्ट्री का काला धुआँ, 
नभ में ज़हर घोलने जाए, 
सोचना कोई मासूम बच्चा, 
साँसों से लड़ता रह जाए। 
 
धरती बदला नहीं लेती है, 
बस चेतावनी देती रहती, 
कभी तपन से, कभी तूफ़ानों से, 
कभी नदी बन क्रोधित बहती। 
 
अब भी वक़्त है जागो मानव, 
लोभ की ज़ंजीरें तोड़ो, 
जल बचाओ, वन फिर रोपो, 
मिट्टी से नाता फिर जोड़ो। 
 
कुएँ बनाओ, वर्षा सहेजो, 
सूखी धरती को जल दो, 
जो तुमने उससे छीन लिया है, 
उसका थोड़ा सा फल दो। 
 
धरती फिर मुस्काएगी एक दिन, 
जब हम उसको माँ मानेंगे, 
लाभ-हानि से ऊपर उठकर, 
उसके आँचल को जानेंगे। 
 
वरना आने वाली पीढ़ी, 
इतिहासों में पढ़ती जाएगी
एक सभ्यता थी स्वार्थी सी, 
जो अपनी धरती खा गई थी। 
 
सुनो मनुज, यह अंतिम विनती, 
प्रकृति को फिर मत ललकारो, 
धरती थक कर सो गई तो, 
फिर किस गोदी में तुम उतारो। 

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