कंक्रीट के जंगल और उसमें जलता मनुष्य

15-05-2026

कंक्रीट के जंगल और उसमें जलता मनुष्य

वीरेन्द्र बहादुर सिंह  (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

शहर उगा है यहाँ, 
धरती की छाती चीरकर
सीमेंट की जड़ों से, 
लोहे की शाखाओं से, 
और काँच की पत्तियों से। 
 
पेड़ों की जगह
अब इमारतें साँस लेती हैं, 
और हवा
थकी हुई मज़दूर की तरह
गलियों में हाँफती फिरती है। 
 
कभी यहाँ 
कोयल गाती होगी, 
अब हॉर्न की कर्कश धुन में
वह स्मृति भी दब चुकी है। 
 
यह कंक्रीट का जंगल है
जहाँ सूरज भी
इमारतों के बीच फँसकर
छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखर जाता है, 
और रात
नियान लाइटों की कृत्रिम चादर ओढ़कर
अपनी सच्ची अँधियारी भूल जाती है। 
 
इन ऊँची दीवारों के भीतर
एक मनुष्य रहता है
नहीं, शायद बस
उसका शरीर रहता है। 
 
मन तो कहीं
ट्रैफ़िक सिगनल पर अटका है, 
या किसी अधूरी नींद में
टूटता-बिखरता है। 
 
वह हर सुबह
अलार्म की चीख़ से जागता है, 
जैसे कोई सैनिक
युद्ध के लिए बुलाया गया हो। 
 
उसकी आँखों में
अब सपनों की जगह
ईमेल की पंक्तियाँ तैरती हैं, 
और दिल
एक एक्सेल शीट में बदल गया है, 
जहाँ हर भावना
लाभ-हानि में तौली जाती है। 
 
वह दौड़ता है
बसों के पीछे, 
समय के पीछे, 
और अंततः
अपने ही अस्तित्व के पीछे। 
 
इस जंगल में
हर कोई अकेला है, 
भीड़ में भी
जैसे कोई पेड़
अपनी जड़ों से कटकर
खड़ा हो बस दिखावे के लिए। 
 
यहाँ रिश्ते भी
सीमेंट की तरह सख़्त हो गए हैं, 
और भावनाएँ 
रेत की तरह
हाथों से फिसलती जाती हैं। 
 
एक बच्चा
खिड़की से झाँकता है, 
आसमान खोजता है
पर उसे दिखती है
बस एक और दीवार। 
 
उसकी हँसी 
मोबाइल की स्क्रीन में क़ैद है, 
और बचपन
वाई-फ़ाई के सिगनल में उलझा हुआ। 
 
एक बूढ़ा
पार्क की बेंच पर बैठा है, 
पर उसके पास
बात करने को कोई नहीं
सिवाय उन यादों के, 
जो अब इस शहर में
अनचाही चीज़ बन चुकी हैं। 
 
यह कंक्रीट का जंगल
धीरे-धीरे
मनुष्य को जलाता है
बाहर से नहीं, 
अंदर से। 
 
उसकी आत्मा
एक सूखी नदी की तरह
दरक रही है, 
जिसमें कभी
भावनाओं का जल बहता था। 
 
वह मुस्कुराता है
पर वह मुस्कान
एक मुखौटा है, 
जो हर शाम
थककर गिर जाना चाहता है। 
 
यहाँ हर कोई
कुछ बनना चाहता है, 
पर इस बनने की दौड़ में
सब कुछ खोता जा रहा है
अपना समय, 
अपनी शान्ति, 
और अंततः
अपना होना। 
 
शहर बढ़ता जा रहा है
ऊँचाई में, 
चौड़ाई में, 
पर मनुष्य
सिमटता जा रहा है
अपने भीतर। 
 
और एक दिन
वह रुक जाएगा
इस दौड़ के बीच, 
इस शोर के बीच, 
और पूछेगा ख़ुद से
क्या मैं सच में जी रहा था, 
या बस
इस कंक्रीट के जंगल में
धीरे-धीरे जल रहा था? 
 
तब शायद
किसी टूटे हुए कोने से
एक बीज उगेगा
आशा का, 
और याद दिलाएगा
कि जंगल
सिर्फ़ कंक्रीट का नहीं होता, 
और मनुष्य
सिर्फ़ जलने के लिए नहीं होता। 

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