यूएसए औेर इसका चरित्र: संपादकीय पर प्रतिक्रिया

01-04-2025

यूएसए औेर इसका चरित्र: संपादकीय पर प्रतिक्रिया

राजनन्दन सिंह (अंक: 274, अप्रैल प्रथम, 2025 में प्रकाशित)


संपादकीय शीर्षक: यूएसए औेर इसका चरित्र
(साहित्यकुञ्ञ मार्च द्वितीय, 2025)

 

राजनीति चाहे क्षेत्रीय हो अथवा वैश्विक, यदि किसी साहित्यिक पत्रिका का संपादकीय विषयवस्तु बनती है, इसका मतलब वह या तो कुछ सृजनात्मक कर रही है अथवा अपनी हदें पार कर रही है। या फिर कर चुकी है। वरना साहित्य सदा ही राजनीति से बचने का प्रयास करती है। अमेरिका की पोल राष्ट्रपति ट्रंप ने खोल दी है। वे ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ की बात करते हैं। जिसका तार्किक अर्थ है अमेरिका अपनी महानता गँवा चुका है। जिसे वह फिर से प्राप्त करना चाहता है। वास्तव में यही उनकी बड़बोली पराजय है। 

अभी हाल ही में उन्होंने भारतीय चुनावों को प्रभावित करने के लिए अमेरिका से भारत को बड़ी रक़म दिये जाने की बात की। लगभग एक सप्ताह तक भारतीय इस वहम में तुक्का मारते रहे कि सरकार गिराने के लिए शायद यह रक़म विपक्षियों को दी गई होगी। लेकिन ट्रंप ने एक दिन अपना मित्र बताते हुए खुलकर हमारे प्रधानमंत्री का ही नाम ले लिया। इससे पहले उसने हमारे अवैध प्रवासियों को सैनिक विमान से बेड़ियों में भेजा। ताकि ध्रुवों में बँटे भारतीय आपस में लड़ें-भिड़ें और मरें। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यहाँ भारत की प्रशंसा होनी चाहिए कि भारतीयों ने समझदारी दिखाते हुए ट्रंप की कुमंशा को ध्वस्त किया। परन्तु इसका अर्थ यह कभी भी नहीं है कि भारत इस अमेरिकी बदमाशी को भूल जाएगा। उसे (ट्रंप को) वहम है कि यहाँ चमचे और अंधभक्त आपस में लड़ते हैं तो बीच में उनकी लड़ाई का लाभ वे अमेरिका को दिला देंगे। उसे पता नहीं है कि वास्तव में चमचे अंधभक्त ‘आपिये सपाई बसपाई’ आपस में लड़ते नहीं बल्कि अपनी मानसिक भड़ास तुष्ट करने के लिए एक दूसरे को दिन भर चिढ़ाते-कुढ़ाते और सिर्फ़ मज़े लेते हैं। यह सब हमारा दिन-दिन का ‘कुकुरहाव’ मात्र है। 

शाम होते ही हम सब कुछ भूल एक साथ बैठ जाते हैं और बैठकर चियर्स करने से पहले भाई हो जाते हैं। पहला पटियाला पैग समाप्त होते-होते आपस में हम सगे से भी बड़े सगे हो जाते हैं। हमारी लड़ाई पुनः तब शुरू होती है जब हमारा छठा पैग समाप्त होता है और सातवाँ पैग लेने से कुछ भाई पीछे हटने लगते हैं। 

हम भारतीय लोग अँग्रेज़ों की तरह दो लाइट पैग में दो घंटे ख़राब नहीं करते। हमारी पीने की संस्कृति चीन से मिलती-जुलती है। जब तक टुन्न नहीं होते हम नहीं उठते। मेरा व्यक्तिगत अनुभव कहता है कि इस मामले में हम सिर्फ़ चीन से थोड़ा पीछे हैं बाक़ी समुची दुनिया में और किसी से नहीं। चीन से भी पीछे इसलिए कि वहाँ पीवैये आपस में हर पैग टकराते हैं। कंप्पेई-कंप्पेई (bottom up-bottom up) का दौर चलता रहता है और कम से कम पीवैयों के संख्या x 2 बार चीयर्स किया जाता है। यानी यदि वे दस बैठे हैं तो प्रति व्यक्ति कम से कम बीस बार ग्लास टकराना ज़रूरी होता हैं। हाँ उनके गलास में पेय मात्रा कितनी रहे इसके लिए कोई दबाव नहीं होता। किसके ग्लास में कितना पेय रहना है ये पीने वाले अपनी क्षमतानुसार स्वयं तय करते हैं, वहाँ ज़ोर लगाने वालों की नहीं चलती। लेकिन हमारे भारत में ऐसा नहीं होता। यहाँ तो साक़ी सभी ग्लासों को एक पंक्ति में खड़ा कर सभी में एक लेवल से पेय डालते हैं। यहाँ सिर्फ़ किसमें कितना सोडा सॉफ़्ट या पानी डालना है ये पीवैये स्वयं तय करते हैं। सातवें पैग में अक्सर हमारी सभा कम से कम एक सप्ताह के लिए किसी न किसी शिकायत के साथ समाप्त हो जाती है। जो अगले बैठक से पहले किसी न किसी बहाने आराम से दूर होती रहती है। 

यू.एस.ए. यदि एक आक्रामक, अशिष्ट और स्वार्थी प्रवृत्ति का देश है तो भारत भी धैर्य के साथ उचित अवसर तक शत्रु की सौ बदतमिज़ियाँ माफ़ करते रहने वाली प्रवृत्ति का देश है। हालाँकि मेरी नज़र में हमारी यह प्रवृत्ति सही नहीं है परन्तु सौवीं ग़लती पूरी हो जाने के बाद भारत फिर अक्रामक नहीं सीधा रौद्र रूप धारण करता है। ट्रंप से बड़े-बड़े बड़बोले हमारे यहाँ फ़ुटपाथ की चाय दुकानों पर बैठे रहते हैं। इसलिए ट्रंप को दुनिया में जो करना है, करता रहे परन्तु भारत को न छेड़े। हम पहले ही कई-कई अंदरूनी ध्रुवों में बँटे हुए हैं। ऐसे में अमेरिका अपनी आदतों से बाज़ नहीं आया और कहीं यदि हम सभी विदेशी ताक़तों के विरुद्घ चिढ़कर एक हो गये तो फिर चाहे वे विदेशी हों या फिर हमारे ही अपने देशी। नेताओं एवं उनकी पार्टियों के लिए सही नहीं होगा। फिर बदलाव होगा बदलाव! 

—राजनन्दन सिंह

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