मछली, जल और जाल
वीरेन्द्र बहादुर सिंह
मछली का जीवन जल है,
जल ही उसका संसार,
लहरों की गोद में पलती,
वहीं उसका हर विस्तार।
नीले गहरे सागर में,
या शांत नदी की धार,
वह तैरती निर्भय होकर,
जैसे कोई स्वप्न अपार।
जल की बाँहों में झूले,
उसकी हर साँस बसी,
उसे लगता ये साथ मेरा
कभी न होगा ख़त्म अभी।
धूप छने जब जल के भीतर,
सोने-सी किरणें आएँ,
मछली अपने छोटे मन में
सपनों के दीप जलाए।
वह समझे यही सत्य है,
यही सदा का साथी,
जल से बढ़कर कौन यहाँ है,
कौन है उससे मातृ-छाती?
पर जीवन के इस मृगतृष्णा में
छुपा हुआ एक सत्य कठोर,
जो दिखता है अपना-अपना,
वही छोड़ता अंत में तोड़।
एक दिन लहरें कुछ बदलीं,
जल में हलचल छा गई,
मछली ने सोचा खेल है ये,
कोई नई लहर आ गई।
पर वो तो जाल था फैला,
किसी लोभी की चाह में,
धीरे-धीरे घिरती मछली
आ फँसी उसकी बाँह में।
जल वहीं था, पास ही बहता,
पर अब कुछ कर न सका,
जिसने जीवन भर सँभाला,
वो भी साथ न दे सका।
मछली छटपटाई बहुत,
लहरों को पुकारा बारबार,
हे मेरे जीवन के साथी,
अब तो कर लो मेरा उद्धार।
पर जल मौन था, शांत खड़ा,
जैसे कोई सत्य कठोर,
कह रहा हो मैं साधन हूँ,
साथी नहीं सदा के लिए और।
मछली ने तब जाना आख़िर,
क्या है जीवन का सार,
जिसे अपना समझा सदा,
वो भी नहीं सच्चा आधार।
जाल में फँसी वो देह
धीरे-धीरे शिथिल हुई,
आँखों में एक प्रश्न लिए
वह अंतिम सीमा तक गई।
क्यों भरोसा किया मैंने
उस पर जो न था मेरा?
मन ही मन वह पूछ रही थी
जीवन का अंतिम फेरा।
तब कहीं भीतर से आवाज़ आई,
मौन में छिपा हुआ उपदेश
संसार का हर रिश्ता क्षणिक है,
सिर्फ़ आत्मा ही है शेष।
जल, जाल और मछली
तीनों की यह कथा पुरानी,
जीवन का गहरा दर्शन है,
जिसमें छुपी सच्चाई ज्ञानी।
जो दिखता है सदा अपना,
वो भी एक दिन छूटेगा,
और जिस पर तेरा अभिमान है,
वो भी तुझसे रूठेगा।
इसलिए हे मनुष्य समझ ले,
मत कर इतना अभिमान,
संस्कार, सत्य और करुणा ही
हैं तेरे सच्चे पहचान।
मछली की यह मौन कहानी
हर दिल को ये कहती है
जल में रहकर भी जान ले,
सच्ची शरण भीतर रहती है।
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- कविता
-
- अकेला वृद्ध और सूखा पेड़
- कृष्ण की व्यथा
- जीवन
- तुम्हारा और मेरा प्यार
- नारी हूँ
- बिना पते का इतिहास
- बुढ़ापा
- बुढ़ापा और दवाओं का डिब्बा
- बेटी हूँ
- भेड़
- मछली, जल और जाल
- मनुष्य
- माँ
- मृत्यु का इंतज़ार
- मेरा सब्ज़ीवाला
- मैं उन सड़कों पर नहीं चल सकता
- मैं तुम्हारी मीरा हूँ
- रंगमंच
- रणचंडी की पुकार
- रह गया
- रूखे तन की वेदना
- वॉर पॉल्यूशन: युद्ध की राख में जलती पृथ्वी
- शब्द
- शीशों का नगर
- सावधानी के बीच चूक
- सूखा पेड़
- स्त्री क्या है?
- स्त्री मनुष्य के अलावा सब कुछ है
- कहानी
- हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
-
- 10 मिनट में डिलीवरी भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़
- अक्षय कुमार—बोतल का बादशाह, कंगना—सिलेंडर क्वीन
- इंसानों को सीमाएँ रोकती हैं, भूतों को नहीं
- इस साल के अंत का सूत्र: वन नेशन, वन पार्टी
- कंडक्टर ने सीटी बजाई और फिर कलाकार बनकर डंका बजाया
- किसानों को राहत के बजट में 50 प्रतिशत रील के लिए
- गए ज़ख़्म जाग, मेरे सीने में आग, लगी साँस-साँस तपने . . .
- गैस कंट्रोल और गेस्ट कंट्रोल
- नई स्कीम घोषित: विवाह उपस्थिति सहायता अनुदान योजना
- नेताओं पर ब्रांडेड जूते फेंके जाएँ, तभी प्रगति कहलाएगी
- पार्टी के सिर पर पानी की मार चल रही है, शर्म नाम की चीज़ नहा डालो
- पालिटिक्स में हँसी के लिए और प्रदूषण में खाँसी के लिए तैयार रहना पड़ता है
- पेंशन लेने का, टेंशन देने का
- प्रयोग बकनली का और बकबक नली का
- बारहवीं के बाद का बवाल
- मैच देखने का महासुख
- राजा सिंह की काम करने की पद्धति: ‘सिस्टम न बदलो, नाम बदलो।’
- राजा सिंह के सहयोगी नेता नेवला कुमार के चुनाव जीतने का रहस्य
- विरोधियों से थको मत, विरोधियों को थका दो: विपक्ष के नेता खरगोशलाल का नया सूत्र
- शिक्षा में नई डिग्री—बीएलओ बीएड
- संसद में हंगामा करने लीडर बन गए रीडर
- साल 3032 में शायद
- हमारी गारंटी, वर-कन्या समय पर स्टेज पर पधारेंगे . . .
- ग़रीबी, बेरोज़गारी, महँगाई, भुखमरी, भ्रष्टाचार: जंगल की अमूर्त विरासतें
- किशोर साहित्य कहानी
- सामाजिक आलेख
-
- आज स्वामी विवेकानंद की जन्म जयंती: धर्म और भक्ति, युवा पीढ़ी, श्रद्धा, महिला जगत तथा भारत के भविष्य के बारे में उन्होंने क्या कहा . . .
- आर्टीफ़िशियल इंटेलिजेंस और बिना इंटेलिजेंस का जीवन
- क्या अब प्यार और सम्बन्ध भी डिजिटल हो जाएँगे
- ग्लोबल वर्कफ़ोर्स में जेन-ज़ी: एक कंपनी में औसतन 13 महीने की नौकरी
- तापमान भले शून्य हो पर सहनशक्ति शून्य नहीं होनी चाहिए
- नए वर्ष का संकल्प: दुख की शिकायत लेकर मत चलिए
- ब्राउन कुड़ी वेल्डर गर्ल हरपाल कौर
- हैं दीवारें गुम और छत भी नहीं है
- चिन्तन
- ऐतिहासिक
- ललित कला
- बाल साहित्य कहानी
- सांस्कृतिक आलेख
-
- अहं के आगे आस्था, श्रद्धा और निष्ठा की विजय यानी होलिका-दहन
- आसुरी शक्ति पर दैवी शक्ति की विजय-नवरात्र और दशहरा
- त्योहार के मूल को भुला कर अब लोग फ़न, फ़ूड और फ़ैशन की मस्ती में चूर
- मंगलसूत्र: महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा देने वाला वैवाहिक बंधन
- महाशिवरात्रि और शिवजी का प्रसाद भाँग
- हमें सुंदर घर बनाना तो आता है, पर उस घर में सुंदर जीवन जीना नहीं आता
- लघुकथा
- काम की बात
- साहित्यिक आलेख
- सिनेमा और साहित्य
- स्वास्थ्य
- सिनेमा चर्चा
-
- अनुराधा: कैसे दिन बीतें, कैसे बीती रतियाँ, पिया जाने न हाय . . .
- आज ख़ुश तो बहुत होगे तुम
- आशा की निराशा: शीशा हो या दिल हो आख़िर टूट जाता है
- कन्हैयालाल: कर भला तो हो भला
- काॅलेज रोमांस: सभी युवा इतनी गालियाँ क्यों देते हैं
- केतन मेहता और धीरूबेन की ‘भवनी भवाई’
- कोरा काग़ज़: तीन व्यक्तियों की भीड़ की पीड़ा
- गुड्डी: सिनेमा के ग्लेमर वर्ल्ड का असली-नक़ली
- दृष्टिभ्रम के मास्टर पीटर परेरा की मास्टरपीस ‘मिस्टर इंडिया'
- पेले और पालेकर: ‘गोल’ माल
- मिलन की रैना और ‘अभिमान’ का अंत
- मुग़ल-ए-आज़म की दूसरी अनारकली
- पुस्तक चर्चा
- विडियो
-
- ऑडियो
-