अपशकुन
वीरेन्द्र बहादुर सिंह
उस दिन सुनीता ने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि शैलेष आएगा तो उससे साफ़-साफ़ कह देगी कि कल वह अपने मायके जाने वाली है।
पिछले पंद्रह दिनों से सुनीता यही निश्चय कर रही थी, लेकिन उसका निश्चय अमल में नहीं आ पा रहा था। ‘ओवरटाइम’ करके थका-हारा शैलेष जैसे ही आँगन में क़दम रखता, सुनीता उसके सामने दौड़ पड़ती। उसके हाथ से बैग ले लेती। शैलेष सोफ़े पर ठीक से बैठ भी न पाता कि ठंडे पानी का गिलास उसके हाथ में थमा देती। फिर ज़मीन पर बैठकर उसके जूतों के फीते खोलने लगती। कपड़े बदल कर शैलेष सुनीता के पीछे-पीछे रसोई में जाता। पत्नी के हाथ का गरमा-गरम भोजन खाकर शैलेष बैठक में आ जाता और किसी किताब को पढ़ने में डूब जाता।
सुनीता जब रसोई समेटकर बाहर आती, तब तक शैलेष किताब हाथ में लिए ही सो चुका होता। शैलेष को जगा कर उससे मीठी-मीठी बातें करने की अपनी प्रबल इच्छा को दबा कर वह झटपट बिस्तर तैयार कर देती और शैलेष गहरी नींद में पड़ता, उससे पहले उसे उठा कर उसके बिस्तर पर सुला देती। पूरे दिन की भागदौड़ और थकान के कारण शैलेष भी उस समय सुनीता से बातें करने के बजाय सो जाना ही पसंद करता। सुनीता भी आधा-पौन घंटा उपन्यास के पन्ने पलटती और फिर सो जाती।
सुबह उठते ही सुनीता घर के कामों में लग जाती और शैलेष खाना खा कर साढ़े नौ बजे ऑफ़िस चला जाता। सुनीता मोबाइल पर गाने सुनते और सहेलियों के साथ बातें करते हुए दिन बिताती। शाम को थका-हारा शैलेष आता और फिर वही क्रम शुरू हो जाता।
सुनीता के घर के सामने ही रहने वाले शोभना और ललित रोज़ शाम को आराम से टहलने निकलते। उस समय खिड़की पर खड़ी सुनीता शोभना के भाग्य से ईर्ष्या करते हुए धीरे से बुदबुदाती, “शोभना मुझसे कितनी सुखी है।”
कभी-कभी शोभना आवाज़ देती, “चलो सुनीता, चलना है टहलने?”
फिर ख़ुद ही जवाब दे देती, “तू क्यों आएगी! तेरे बिना शैलेष का स्वागत कौन करेगा? क्यों, सही कहा न?”
सुनीता तब शोभना की बात का समर्थन करते हुए बस केवल मुस्कुरा देती और हाथों में हाथ डाले वह दंपती आगे बढ़ जाता। ललित ने शोभना के भाई प्रवीण के साथ मिल कर रेडीमेड कपड़ों की फ़ैक्ट्री शुरू की थी, इसलिए उसे नौकरी जैसी बंदिशें नहीं थीं। वह रोज़ शाम को पत्नी के साथ घूमने का समय निकाल सकता था। लेकिन शैलेष को ऐसी सुविधा मिलना सम्भव नहीं था।
शैलेष के पर्याप्त साथ के अभाव से या फिर शोभना—ललित के सुख को देख कर कौन जाने क्यों सुनीता को अब अपने इस एकरस जीवन से ऊब होने लगी थी। हालाँकि हर रविवार को शैलेष और सुनीता शाम को घूमने या पिक्चर देखने जाते थे और बहुत ही आनंद से दिन बिताते थे। लेकिन अब सुनीता को सप्ताह में केवल एक रविवार से संतोष नहीं होता था। अगले दिन से फिर वही पुराना क्रम शुरू हो जाएगा, यह सोच कर रविवार को घूमने का आनंद भी फीका पड़ जाता था और वह जैसे मजबूरी में शैलेष के साथ जाती थी।
कई बार सुनीता सोचती कि कुछ समय के लिए वह मायके हो कर आए, लेकिन मायके जाने की बात शैलेष से कहने की उसकी हिम्मत नहीं होती थी। कारण यह था कि विवाह के बाद से अब तक सुनीता शायद ही कभी शैलेष से अलग हुई थी। जब भी उसे मायके जाने का मन होता था, शैलेष नौकरी से छुट्टी ले लेता था और दोनों साथ जाते थे और साथ ही लौटते थे। कभी शैलेष को छुट्टी नहीं मिलती और सुनीता को अकेले मायके जाना होता तो वह सम्भव होता तो जाना टाल देती और अगर जाना ही पड़ता तो मायके में माता-पिता और भाई-बहनों से मिलने की ख़ुशी से ज़्यादा उसे अपनी अनुपस्थिति में शैलेष को होने वाली असुविधा की चिंता रहती।
अब वह किस मुँह से शैलेष से कहती कि कल वह मायके जा रही है। अगर वह हिम्मत कर के कह भी देती और शैलेष पूछ लेता कि अचानक मायके जाने का विचार क्यों बन गया? तब वह क्या जवाब देती? फिर सुनीता मन ही मन जवाब तैयार करने लगती कि क्या उसका माँ-बाप और भाई-बहनों से मिलने का मन नहीं हो सकता?
लेकिन इस जवाब से उसे ख़ुद ही संतोष नहीं होता। वह ख़ुद से ही सवाल करती कि इतने दिनों तक अचानक इस तरह का मन क्यों नहीं हुआ? इस सवाल का जवाब सुनीता को नहीं मिलता। अपने जीवन को मशीन जैसा समझ बैठी सुनीता ने आख़िर तय कर ही लिया कि मायके जाने की बात किसी भी तरह शैलेष से कहनी ही होगी और अगर वह पूछता है कि इस तरह अचानक वह मायके क्यों जा रही है तो बेझिझक कह देगी कि वह तो रोज़ शाम को ऑफ़िस से आकर खा कर सो जाते हैं और सुबह उठ कर खा कर ऑफ़िस चले जाते हैं। इसमें उसे काम करने के अलावा मिलता ही क्या है?
लेकिन पंद्रह दिन बीत जाने पर भी सुनीता अपना यह विचार अमल में नहीं ला सकी थी। शैलेष आँगन में जैसे ही क़दम रखता, सुनीता उसकी ओर दौड़ पड़ती। वह अपनी बात कहना भूल जाती या याद होते हुए भी कह नहीं पाती।
“देखो, आज तुम्हारे लिए सिल्क की साड़ी लाया हूँ। एक बात मेरी समझ में नहीं आती कि आजकल तुम उदास क्यों रहती हो? तबीयत ठीक न हो तो चलो डॉक्टर को दिखा देते हैं।”
शैलेष के ऐसे स्नेहभरे शब्द सुन कर सुनीता भावुक हो उठती। लेकिन उस दिन तो सुनीता ने दृढ़ निश्चय कर लिया था। शैलेष की मधुर बातों में नहीं फँसेगी और वह आते ही वह अपनी बात कह देगी कि उसका मन बहुत घबराता है। वह कल मायके जा रही है।
अपनी इस बात के समर्थन में उसे कौन-कौन सी दलीलें देनी हैं, यह सब उसने सोच कर तैयार कर लिया था। पूरी मानसिक तैयारी के साथ वह खिड़की पर खड़ी हो कर शैलेष के आने की प्रतीक्षा करने लगी।
घर आने का रोज़ का समय बीत गया, फिर भी शैलेष के आने का कोई संकेत नहीं था। सुनीता खिड़की पर खड़ी-खड़ी थक गई। लगता है, आज फिर ओवरटाइम का चक्कर होगा, बुदबुदाते हुए वह बिस्तर पर लेट गई। अपने किए हुए निश्चय के बारे में सोचते-सोचते उसकी आँख कब लग गई, उसे पता ही नहीं चला।
अचानक जब उसकी आँख खुली तो उसने देखा कि घर में चारों ओर अँधेरा फैला है। बाहर सड़क पर बिजली के खंभों की बत्तियाँ जल चुकी थीं।
“शैलेष अब तक आ गए होंगे। लेकिन कितने आलसी हैं वह। घर में लाइट करने की या मुझे जगाने की भी नहीं सूझी। कहीं उसकी तरह बिना खाए ही तो नहीं सो गए?”
बड़बड़ाती हुई सुनीता उठी। लाइट के स्विच की ओर तेज़ी से बढ़ी। लेकिन जल्दी में उसका दायाँ हाथ रास्ते में रखे स्टूल से ज़ोर से टकरा गया और खननन की आवाज़ के साथ उसके हाथ की चारों काँच की चूड़ियाँ टूट गईं।
सुनीता सन्न रह गई। शकुन-अपशकुन में विश्वास रखने वाली सुनीता के दिल को इस घटना से ज़ोर का झटका लगा। मन को मज़बूत करके सुनीता ने लाइट जलाई। शैलेष कहाँ सो रहा है, यह देखने के लिए उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई। लेकिन झूले पर, सोफ़े पर या कुर्सी पर कहीं भी शैलेष सोया हुआ दिखाई नहीं दिया। सुनीता का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। शायद रसोई में होगा, यह सोचकर वह वहाँ भी देखकर आ गई। पूरे घर में कहीं भी शैलेष नहीं था।
“शैलेष अभी तक आया क्यों नहीं,” इस चिंता से सुनीता का चेहरा रोने जैसा हो गया। उसने घड़ी की ओर देखा, साढ़े नौ बज कर पाँच मिनट हो चुके थे। अब तो सुनीता रो ही पड़ी। शैलेष को छह बजे ऑफ़िस से छुट्टी मिल जाती थी। कभी ओवरटाइम भी होता तो भी वह आठ, सवा आठ बजे तक घर आ ही जाता था। अचानक सुनीता की नज़र अपने दाएँ हाथ पर गई, जहाँ अब चूड़ियाँ नहीं थीं। एक पल भी गँवाए बिना वह दौड़ कर टेबल के पास गई और दराज़ खोलने लगी। सौभाग्य से दराज़ में पड़ी पुरानी दो प्लास्टिक की चूड़ियाँ मिल गईं। उसने तुरंत उन्हें अपने ख़ाली हाथ में पहन लिया। तब जाकर उसका दिल थोड़ा शांत हुआ।
सुनीता बीए तक पढ़ी होने के बावजूद शकुन-अपशकुन में बहुत विश्वास करती थी। और उसमें भी विवाहित स्त्री की चूड़ी टूटना तो बहुत बड़ा अपशकुन माना जाता है, ऐसा उसका मानना था। महल्ले की स्त्रियों और सहेलियों से वह अक्सर कहा करती थी, “हाथ की चूड़ी स्त्री के सौभाग्य का प्रतीक होती है। इतना ही नहीं, यह पत्नी के पति के प्रति प्रेम की निशानी भी है। जब स्त्री के हाथ की एक भी चूड़ी टूट जाए, तो समझ लेना चाहिए कि उसके पति के प्रति उसके प्रेम में कहीं न कहीं कमी आ गई है।”
सुनीता की यह अजीब-सी फिलॉसफी सुन कर शैलेष कभी-कभी उसकी हँसी भी उड़ाता था। लेकिन सुनीता दृढ़ता से कहती, “आप भले न मानें, लेकिन मेरी बात सौ प्रतिशत सही है। कम-से-कम मेरे मामले में तो बिलकुल सही है।”
और उसकी बात कुछ हद तक सही भी थी। शादी को बारह साल हो चुके थे, लेकिन आज तक उसकी चूड़ियाँ कभी नहीं टूटी थीं। कभी शौक़ से नई डिज़ाइन की चूड़ियाँ पहन लेती थी, लेकिन चूड़ी टूटने के कारण बदलनी पड़े, ऐसा कभी नहीं हुआ था।
लेकिन उस दिन पहली बार चूड़ियाँ टूटने से उसका दिल घबरा उठा। और ऊपर से शैलेष अभी तक घर नहीं आया था। उसके मन में तरह-तरह की शंकाएँ उठने लगीं, “कहीं रास्ते में कोई दुर्घटना तो नहीं हो गई?” और सुनीता की आँखों के सामने एक दृश्य उभर आया, ‘राहगीर दुर्घटना में घायल हुए शैलेष को रिक्शे में डाल कर अस्पताल ले जा रहे हैं। शैलेष अस्पताल के बिस्तर पर बेहोश पड़ा है। डॉक्टर उसके सिर, आँख और हाथ पर पट्टियाँ बाँध रहे हैं।’
सुनीता काँप उठी। उसने दोनों हाथों से अपनी आँखें ढँक लीं। लेकिन बंद आँखों के सामने भी अपशकुन भरे दृश्य आते रहे। घबराई हुई सुनीता ने आँखों से हाथ हटा दिए। जैसे ही आँखें खोलीं, उसकी नज़र सबसे पहले अपने हाथ की प्लास्टिक की चूड़ियों पर पड़ी। तभी उसे याद आया कि आज उसने शैलेष के सामने विद्रोह करने का निश्चय किया था।
उसी क्षण उसे लगा कि चूड़ियाँ टूटने का अपशकुन और शैलेष का अभी तक घर न आना, इन दोनों का रहस्य समझ में आ गया। उसके मन में शैलेष के लिए शिकायत और दोष आया, इसलिए उसके प्रेम में कमी आई होगी। इसी वजह से उसकी चूड़ियाँ टूट गईं और यह अपशकुन हो गया। हाय, आज उसे यह क्या सूझ गया। उसने अपने सुख के लिए ग़लत विचार करके बेचारे शैलेष की ज़िन्दगी को ही ख़तरे में डाल दिया!
जबकि शैलेष के सुख में ही तो उसका सुख है। वह उसी के सुख के लिए तो ओवरटाइम करता है। बेचारे इतने थक जाते हैं, फिर भी दूसरे दिन जल्दी उठ कर ऑफ़िस चले जाते हैं। छह दिन जानवर की तरह मेहनत करने के बाद भी सातवें दिन आराम नहीं करते, बल्कि उसके साथ समय बिताते हैं। रविवार का पूरा दिन कितनी ख़ुशी से उसके साथ बिताते हैं! क्या उनका इतना स्नेह उसके लिए कम है कि वह उन्हें सातों दिन अपने पास चाहती है? छह दिन के थोड़े से साथ के बाद सातवें दिन का लंबा साथ कितना मधुर लगता है।
लेकिन अब शैलेष को वह कहाँ ढूँढ़ने जाए? वह कितनी बार उन्हें फोन कर चुकी थी, लेकिन संयोग देखो, फोन भी नहीं लग रहा था। इसलिए उसकी चिंता और बढ़ रही थी। ऑफ़िस तो कब का बंद हो गया होगा। इतने बड़े शहर में वह कहाँ जाए और किससे पूछे?”
सुनीता की आँखों से आँसू बह रहे थे। टेबल के पास रखी श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने हाथ जोड़ कर, आँखें बंद कर के सुनीता ने मन ही मन प्रतिज्ञा की कि अगर वह सही-सलामत घर आ जाएँ, तो अब वह कभी भी उनके ख़िलाफ़ विद्रोह करने का तो क्या, उनके दोष के बारे में सोचने का भी विचार नहीं करेगी।
और सचमुच जैसे उसकी प्रार्थना स्वीकार हो गई हो, तभी पीछे से घर आए शैलेष ने धीरे से उसके आँखों पर हाथ रख दिए। पति का स्पर्श पहचान कर सुनीता ने अपने हाथ से शैलेष के हाथों को आँखों पर दबा कर कहा, “आपने आज इतनी देर क्यों की, पहले यह बताइए। उसके बाद ही ये हाथ हटाने दूँगी।”
शैलेष ने हँसते हुए कहा, “अरे, यह भी बताना पड़ेगा? तो सुनो, सुमनलाल सेठ के बेटे प्रदीप की एक हफ़्ते बाद हाईस्कूल की परीक्षा है। सेठ ने कहा है कि एक हफ़्ते तक उसे अंग्रेज़ी का ऐसा ट्यूशन दे दो कि वह अंग्रेज़ी के पेपर में पास हो जाए। हफ़्ते के पैंतीस सौ रुपए पहले ही दे दिए हैं। और अगर उसे अंग्रेज़ी में पचास से ज़्यादा अंक आए तो पच्चीस सौ रुपए और इनाम में मिलेंगे। इसलिए ऑफ़िस से सीधे प्रदीप को ट्यूशन पढ़ाने चला गया था, इसी कारण देर हो गई।”
शैलेष के हाथ हटा कर उसकी आँखों में देखते हुए सुनीता ने चिंतित स्वर में कहा, “लेकिन इतना ज़्यादा परिश्रम करने की क्या ज़रूरत है? कहीं आपकी तबीयत ख़राब हो गई तो?”
शैलेष ने मुस्कुरा कर जवाब दिया, “अगले महीने तुम्हारा जन्मदिन है न? उस मौक़े पर तुम्हें जो बहुत पसंद है न, वह सिल्क की साड़ी उपहार देने की इच्छा है। बस, वह इच्छा पूरी हो जाए, उसके बाद चाहे तबीयत ख़राब हो जाए। फिर तो आराम से बिस्तर पर पड़े रहेंगे।”
पत्नी को बहुत पसंद आने वाली साड़ी ख़रीदने के लिए कुछ पैसे कम पड़ रहे थे। उन पैसों को जुटाने के लिए शैलेष अपनी सेहत की परवाह किए बिना इतनी मेहनत कर रहा था, यह सोच कर सुनीता का दिल भर आया।
“शै . . .ले . . . ष!” कहते हुए सुनीता का गला भर आया। आँखों के कोनों में छलक आए आँसुओं को छिपाते हुए सुनीता रोज़ की तरह ज़मीन पर बैठ गई और शैलेष के जूतों के फीते खोलने लगी।
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