नारी (राजनन्दन सिंह)

15-11-2020

नारी (राजनन्दन सिंह)

राजनन्दन सिंह

नारी 
किसी प्रतिस्पर्धा का नाम नहीं है
किसी से कोई होड़ लगाने की


नारी
उस समर्पण का नाम है
जो ममता में परिवर्तित होने के लिए
प्रकृति बनकर समर्पित हो जाती है 
और विलीन कर लेती है पुरुष को स्वयं में


नारी तो वह पवित्र क्षीर सागर है
जिसकी गोद में लेटते हैं स्वयं भगवान विष्णु
जिनकी नाभी कमल में बैठकर स्वयं ब्रह्मा
करते हैं सृष्टि की रचना


ममता उस कमल का पराग है
जो सृष्टि रचनारत 
ब्रह्मस्पन्दन के फलस्वरूप झड़ती है


निर्मल और शांत उस क्षीर सागर 
यानि नारी हृदय में
शिशु के लिए
मानव के लिए
सृष्टि के लिए
संभावनाओं की माता
नारी ही है

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
किशोर साहित्य कविता
हास्य-व्यंग्य कविता
बाल साहित्य कविता
नज़्म
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में