मेरा गाँव

15-09-2020

मेरा गाँव

राजनन्दन सिंह

मेरे मन में बसा है मेरा गाँव
मुझे आदत है
कच्ची सड़कों 
अशहरीकृत पगडंडियों पर
सुबह की ओस भरी दूबियों पर
पैदल टहलने की 
नंगे पाँव
 
बदलती ऋतुओं के संग
बदलते गाँव के रंग
कभी बिछी हुई हरियाली
कभी गेंहू धान की
पकी हुई सुनहरी बाली
 
हुलसते चेहरे
ख़ुशी के गीत 
मुझे भाते हैं
मन को लुभाते हैं
खुली हवा 
और पेड़ों की घनी लंबी छाँव
मेरे मन में बसा है मेरा गाँव

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