काला कौआ

राजनन्दन सिंह

काला कौआ करता काँव-काँव
दिन-रात विचरता गाँव-गाँव
 
सम्मान कहीं न पाता है
वह जहाँ कहीं भी जाता है
 
वह कर्कश क्या-क्या खाता है
और नहीं किसी को भाता है
 
नक़ल की उसकी अक़ल नहीं
कोयल सी उसकी शकल नहीं
 
वह धूरत सर से पाँव-पाँव
वह करता रहता काँव-काँव

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