खेल के पार

15-09-2026

खेल के पार

दीपक शर्मा (अंक: 302, सितम्बर द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

मेरे मन में उस डर का बीज शायद तभी रोपा गया था, जब पिछले दिनों पापा मेरे ग्यारहवें जन्मदिन पर मेरे लिए ‘क्लूडो’ नाम का एक खेल उपहारस्वरूप लाए थे।

खेल के साथ एक कहानी जुड़ी थी—छह कमरों वाले एक घर के मालिक ने छह अतिथियों को रात्रिभोज के लिए घर पर बुलाया और भोज के बाद उसकी हत्या हो गई। खिलाड़ियों को बँटे पत्तों के सहारे तीन इकाइयाँ बूझनी होतीं—हत्यारा, हथियार और घटनास्थल।

एक तहदार बोर्ड के बिछने पर खेल शुरू किया जाता। बोर्ड पर छह कमरों के साथ चौकोर खाने चिह्नित थे, जिन्हें पासे की फेंक पर ऊपर आए अंक के हवाले से खिलाड़ी अपनी-अपनी गोटी विभिन्न कमरों की दिशा में ले जा कर पार करते और वहाँ पहुँचने पर हथियार और हत्यारे का नाम बूझने का अवसर पाते।

मुझसे ज़्यादा पापा उस खेल में रुचि लेने लगे थे। विशेषकर उसके हथियारों में। जो उन्हें बहुत उत्साहित कर दिया करते। उन्हें वह छूते, उठाते और वापस धर देते। हथियार थे भी भयंकर: पिस्तौल, छड़ी, रस्सी, छुरा, कुल्हाड़ी और स्पैनर।

मैं जानता था पापा माँ को पसंद नहीं करते थे। और उनसे छुट्टी पाना चाहते थे। कारण शायद माँ का एग्ज़ीमा था। हालाँकि वह संक्रामक नहीं था। मगर था क्रौनिक। चिरकालिक। सिबौहिरिक डर्माटाइटिस। इस में त्वचा के सिलेबस ग्लैंडज़, वसामय ग्रंथियाँ बहुसंख्यक हो जाती हैं और सोबम का, वसा का उत्पादन अतिशय मात्रा में होने लगता है। साथ ही त्वचा पर, विशेषकर पीठ और चेहरे पर फुंसियाँ निकल आती है, जिन~की मृत कोशिकाओं की बाहरी परत फिर पपड़ी बन कर गिरने लगती है।

वैसे तो गर्मी के महीनों में धूप के आधिक्य के कारण यह रोग कम तंग करता है किन्तु मानसिक तनाव की वजह से वह कभी भी आ धमकता है।

अब अपने स्कूल की क्लास में क्लूडो के हथियार वृहताकार रूप में मेरी आँखों के आगे घूमने लगते और मैं सोचता मेरे घर पहुँचने पर माँ मुझे मृत मिलेंगी।

पापा जिस डिग्री कॉलेज में पढ़ाते थे, वह वहाँ से किसी समय भी घर पर आ जाया करते। विषेशकर हर माह के पहले, तीसरे और पाँचवें शनिवार को।

जिस दिन उनका दूरदर्शन पर प्रोग्राम रहा करता: समालाप।

‘समालाप’ के अंतर्गत पापा किसी विशिष्ठ व्यक्ति से पंद्रह मिनट तक बातचीत किया करते।

किन्तु उन पंद्रह मिनटों के दौरान पूछे जाने वाले प्रश्नों को तैयार करने हेतु वह घर पर घंटों पढ़ते और फिर जैसे ही उन्हें नोकदार और चरपरे प्रश्नों का संतोषजनक उपक्रम मिलता, वह अपनी आवाज़ को उनके अनुरूप साधने लगते। आवाज़ के मोड़, उसके उतार-चढ़ाव तथा अपने शब्दों की रूप-रचना, विभक्ति तथा सुर-परिवर्तन के फ़ुरतीलेपन पर अतिरिक्त अधिकार पाने की ख़ातिर।

मेरी दुर्भीति पर और भार लादा दूरदर्शन की एक प्रोड्यूसर आशा चौधरी के टेलिफ़ोन ने। जिसे माँ ने सुना और पापा को सुनाया, “इस वैलेंटाइन डे पर आशा चौधरी हम दोनों को अपने प्रोग्राम में रखना चाहती है। दो अन्य दम्पत्तियों के साथ, जो हमारी तरह प्रेम-विवाह किए हैं।”

“आशा चौधरी एक शरारती औरत है,” पापा भड़क लिए, “तुम उस की बातों में न आना . . .”

“इस में शरारत कैसी?” माँ बोलीं, “तीन दम्पत्तियों में एक दम्पत्ति की शादी पिछले महीने हुई है, दूसरी की शादी को पच्चीस साल हो गए और तीसरे हम रहेंगे, बारह साल पुरानी शादी वाले . . .”

“असल में वह मुझे नीचा दिखाना चाहती है। तुम्हें मेरे साथ इसलिए रख रही है ताकि सारी दुनिया जान ले मैं कैसी औरत के साथ अपनी ज़िंदगी घसीट रहा हूँ। बाहर की दुनिया में अपने ‘समालाप’ द्वारा जिस लोकप्रियता के शिखर पर आज मैं खड़ा हूँ वह मुझे वहाँ से नीचे उतार लाना चाहती है। जो लोग मुझे बताया करते है कि बड़े से बड़े वी.आई.पी. (बहुत महत्त्वपूर्ण परसन) को मैं एल.आई.पी. (कम महत्त्वपूर्ण परसन) महसूस कराने में सफल रहता हूँ, वही लोग तुम्हारे साथ देख कर मुझे ‘एन अनइम्पौर्टैट परसन’ (एक महत्वहीन व्यक्ति) मानने लगेंगे। मेरी हाज़िरजवाबी, मेरी तीखी नज़र, मेरी मज़बूत पकड़ सब धरी की धरी रह जाएगी, जब लोग-बाग देखेंगे कि कैसे मैंने आँखें मूँद कर तुम जैसी फूहड़ कोढ़िन के साथ शादी कर रखी है . . .”

“कोढ़िन? क्या आप ने मुझे कोढ़िन कहा?” माँ रोने लगी, “मेरे एग्ज़ीमे को आप कोढ़ मानते हैं?”

“यह कोढ़ नहीं तो क्या है? कैसा तो मवाद फूटा करता है इन सब फोड़े-फुंसियों से . . .”

“आप मुझ से इतनी ज़्यादा नफ़रत करते है,” माँ का रोना बढ़ चला।

“जाओ, उधर जा कर आँसू टपकाओ,” पापा चिल्लाए, “मेरे सामने मनहूसियत मत फैलाया करो . . .”

“जा रही हूँ . . . मनसा . . . वाचा . . . कर्मणा . . .”

उसी रात मुझे लगा, “काश, इन दोनों से मुझे बारह साल पहले मिलने का अवसर मिला होता! उन्हें चेताने हेतु, सावधान! शादी रोक लो। आगे कष्ट है। क्लेश है। आपदा है। यह शादी हरगिज़ न करना।”

उसी रात माँ ने आत्महत्या की थी।

न पिस्तौल से। न छड़ी से। न रस्सी से। न कुल्हाड़ी से। न छुरे से। न स्पैनर से।

अपनी नींद की ज़्यादा गोली से।

शब्द-शस्त्रास्त्र के तहत . . .

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