अधीन राज्य
दीपक शर्मा
इस मकान को उषा अपना अधीन राज्य मान कर चलती है और हम परिवार वालों को अपनी प्रजा।
बेशक उसके परिवार में मैं एक बाहरी व्यक्ति की हैसियत से आया था। दफ़्तर में उसका जूनियर बन कर और मकान में उसका किराएदार।
यह संयोग ही था कि जिस समय कस्बापुर के एक निजी संस्थान में मेरी पहली नियुक्ति हुई थी, उषा के मकान के वे दो कमरे ख़ाली थे जिन्हें अपने पिता के देहांत के समय से वह पिछले सोलह वर्षों से किराए पर चढ़ाती रही थी।
उस संस्थान में उस ने नौकरी भी पिता की असामयिक मृत्यु के उपलक्ष्य में पाई थी। भाई उसका कोई था नहीं और छोटी बहन के नाम पर इक्कीस वर्षीया जो जीव थी, वह प्रकृति की अवमानी का एक नमूना थी: चिक्कन गोरी त्वचा, घने लंबे बालों और विशाल, चमकदार आखों वाली उस लड़की के हाथ, पैर और होंठ सब टेढ़े थे। न वह ठीक से चल पाती थी। न ठीक से बोल पाती थी। और न ही अपने हाथ में कोई चीज़ ठीक से पकड़ पाती थी। ऐसे में उषा ही मकान की मालिकिन बनी बैठी थी।
अपने किराएदार, उषा हमेशा अपने दफ़्तर ही के जूनियर सदस्यों में से चुना करती थी, ताकि किराए का भुगतान उसे समय पर मिलता रहे।
मुझे अपना किराएदार बनाने पर उसे कोई आपत्ति नहीं रही थी। हाँ, उस ने एक शर्त ज़रूर मेरे सामने रखी थी, मुझे अगले तीन माह के अन्दर शादी ज़रूर करनी पड़ेगी क्योंकि अभी तक उसके वे कमरे केवल विवाहित जोड़ों ही को दिए गए थे, अविवाहित लड़कों को नहीं।
मैंने ‘हाँ’ में अपना सिर हिला ज़रूर दिया था किन्तु मैं जानता था वह असंभव था। उनतीस वर्ष की अपनी उस उम्र में मैं न केवल सम्पत्तिविहीन ही था बल्कि लड़कियों के मामले में अनुभवविहीन भी। तिस पर मेरी शादी की फ़िक्र करने वाला कोई नहीं था। माँ का देहांत बहुत पहले हो चुका था और पिता अपने दिन का दो-तिहाई भाग अपनी क्लर्की में बिताया करते और एक-तिहाई भाग अपने नए चार बेटे-बेटियों और उनकी माँ से उलझने में। और अपनी दसवीं कक्षा के बाद की अपनी पूरी पढ़ाई भी मैंने छिटपुट नौकरियों के बूते ही पर की थी। अपनी सौतेली माँ की इस घोषणा के तहत, तुम्हारा ख़र्चा अब हम से न उठेगा।
उषा के मकान में मेरे निवास के दूसरे सप्ताह की एक संध्या थी जब मेरे कमरे का दरवाज़ा ज़ोर से भड़भड़ाया गया। उस समय मैं बाज़ार से मँगवाए गए टिफ़िन में से अस्वादिष्ट व नीरस भोजन अनिच्छा से चबा रहा था। हड़बड़ा कर मैंने वह टिफ़िन बंद कर दिया और जूठे हाथों से दरवाज़ा जा खोला था।
“क्या हुआ, मैडम?” बाहर उषा खड़ी थी। बड़ी घबराई हुई।
मकान पर भी मैं उसे ‘मैडम’ ही बुलाया करता। दफ़्तर वाली औपचारिकता बनाए रखने हेतु। पिता के बाद के उन सोलह वर्षों में क्रमशः उषा अपने विभाग के श्रेणीकरण व क्रम-निर्धारण के कई सोपान चढ़ चुकी थी और पदक्रम में मुझसे बहुत आगे थी।
“अम्मा ग़ुसलख़ाना में गिर पड़ी हैं और उठ नहीं पा रहीं। उन्हें उठाने में मुझे तुम्हारी मदद चाहिए . . .”
“जी, मैडम . . .”
उधर ग़ुस्लख़ाने में अम्मा की हूक के संग उषा की बहन, छुटकी, हिचकियाँ ले रही थी।
उषा और मैं अम्मा को उठाने के लिए एक साथ झुके थे। अम्मा के मोटापे और स्थूलता के आयतन व परिमाण का आभास मुझे तब हुआ जब मेरी साँस फूलने लगी।
“पड़ोस के नर्सिंग होम से वैन अभी पहुँच रही है। उधर तुम्हें मेरे साथ चलना पड़ेगा। छुटकी यहीं रहेगी . . .”
“जी, मैडम . . .”
नर्सिंग होम की एक्सरे रिपोर्ट से मालूम हुआ अम्मा के बाएँ कूल्हे की हड्डी दरक गई थी। उपचार के अंतर्गत आंशिक हिप रिप्लेसमेंट हो जाने के उपरांत अब उनका शय्याग्रस्त बने रहना अनिवार्य हो गया।
तदनंतर, सात कमरों वाले उषा के उस मकान के कई बंद दरवाज़े मेरे लिए खोल दिए गए।
सबसे पहले खुलने वाला वह दरवाज़ा था जो हमारी साझी दीवार के दाएँ-बाएँ पड़ता था और जिस पर पिछले सोलह वर्षों से लगातार एक ताला पड़ा रहा था।
और उसका ताला इसलिए खोला गया था क्योंकि उसे घेर रही खाने की मेज़, कुर्सियों और बर्तनों की आलमारी का स्थान अब अम्मा की शय्या को दिया जाना था। ताकि अपनी शय्या से वह मुझे जब भी पुकारें, मैं उनकी ओर लपक सकूँ। अपनी सेवा-टहल उन्हें उपलब्ध कराने।
जिस की भागीदारी मैंने स्वेच्छा से प्रस्तावित की थी। अपने लोभ से प्रेरित हो कर। जिस के लिए बेशक बना-बनाया तैयार वह सुस्वादु भोजन भी उत्तरदायी रहा था जो अम्मा के आग्रह पर उनकी रसोई से तीनों समय मुझे परोसा व पहुँचाया जाने लगा था। किन्तु उस लोभ को ठोस आधार दिया था छुटकी ने। उसकी उत्सुकता ने। और अम्मा की प्रतीति ने।
तभी एक ओर जहाँ चपल व अनवस्थ छुटकी के चित्त का लाभ उठाकर उसके प्रेम-व्यवहार को मैं अपने काम-बाण से प्रेम-विहार में बदल देने में सफल हो गया था वहीं दूसरी ओर अम्मा की सेवा-शुश्रूषा में यथासाध्य अपना पूरा उद्योग देकर मैं उषा के मन में भी अपनी उपयोगिता की गहरी छाप जमाने लगा था।
♦ ♦
परिणाम, अपनी टिकान के तीसरे माह का किराया जैसे ही मैंने उषा के हाथ में रखना चाहा, उसने मुझे अम्मा के कमरे की ओर प्रवर्तित कर दिया।
“यह रुपया तुम अपने पास रखो,” मेरा हाथ पकड़ कर वह बोलीं, “और उषा से ब्याह कर कर लो . . .”
उषा का ऊँचा पद, तिस पर दफ़्तर में उसका अपने सहकर्मियों व अनुचरों के संग कार्यन्याय के अनुसार उपयुक्त व्यवहार और फिर यह बड़ा पुश्तैनी मकान जिसे उसके दादा ने अच्छे समय में बनवाया था—ऐसे में मेरे लोभ की बाँहें लंबी क्यों न हो लेतीं?
“आप ने मैडम से पूछ लिया?”
“जानती हूँ वह तुम से आठ-नौ साल बड़ी है। मनमाने ढंग से रहती है। लेकिन फिर भी देख लेना, वह तुम्हारे लिए अच्छी पत्नी साबित होगी।”
“लेकिन मैडम मुझ जैसे जूनियर से ब्याह करने के लिए मान जाएगी क्या?” उस प्रस्ताव को मैंने सुदृढ़ कर लेना चाहा।
“उसे मनाने का ज़िम्मा मेरा रहेगा,” अम्मा हँस पड़ी।
अगले ही दिन पड़ोस के पंडित जी हमारे विवाह का मुहूर्त तय करने के लिए अम्मा के कमरे में बुला लिए गए।
उन्होंने आगामी सप्ताह का रविवार निश्चित कर दिया।
दबी ज़ुबान से अम्मा ने एक बार ज़रूर मुझे अपने परिवारजन को निमंत्रण देने का सुझाव दिया, किन्तु उषा ने टाल दिया, “नहीं, कोई ज़रूरत नहीं।”
और मैंने उषा की ‘नहीं’ में अपनी ‘नहीं’ जोड़ दी।
उषा ने मुझे अपने दफ़्तर में भी इस विवाह का उल्लेख करने के लिए मना कर दिया, “अम्मा की बीमारी के चलते हम अपने विवाह को केवल धर्मविधि तक ही सीमित रखेंगे।”
वह धर्मविधि भी उस समय मुझे किसी राज्यभिषेक से कम नहीं मालूम दे रही थी। कहा सुना था मैंने, हर दूल्हा एक राजा होता है? और मैं राजा बनने जा रहा था। दफ़्तर में न सही, मगर घर में तो अब उषा का स्थान मुझे मिलने वाला था।
♦ ♦
हमारे विवाह की वह पूर्व-संध्या थी जब उषा मेरे कमरे में सहसा चली आई। अपने आचरण के विपरीत।
गंभीर मुद्रा लिए। अपने कठोरतम स्वर में मुझे आदेश देने, “कल तुम्हारा विवाह छुटकी से होगा। मुझसे नहीं।”
“क्यों?” मैं सकपकाया था।
“छुटकी गर्भवती है और उसकी संतान का वैध होना बहुत ज़रूरी है।”
“क्या . . . या . . . या?” मुझे काठ मार गया था।
“उससे विवाह नहीं करोगे तो तुम्हें बलात्कारी घोषित कर के जेल भिजवा दिया जाएगा।”
उषा ने अपना निर्णय कह सुनाया था।
♦ ♦
टूट रहे मेरे दम में दम लाया मेरे पहले बेटे का जन्म।
जो मेरी आशंका के विपरीत छुटकी की भाँति प्रकृति की अवमानी का नहीं, प्रकृति की दक्षता का उदाहरण था: पूर्णतः स्वस्थ व हृष्ट-पुष्ट।
उषा ही ने छुटकी की प्रसूति की पूरी ज़िम्मेदारी निभाई। उसे कस्बापुर के सर्वोत्तम चिकित्सक व स्वास्थ्यकर सेवाएँ उपलब्ध करवा कर।
छुटकी की अगली दो प्रसूतियाँ भी उसी उत्साह व तत्परता से उषा ने निष्पादित कीं और प्रकृति ने भी अपनी दक्षता दुहरा दी।
दुहराव यदि लापता रहा तो मेरे प्रति उषा के बरताव में।
छुटकी और मेरे विवाह को छह वर्ष हो चले हैं किन्तु हमारे विवाह की पूर्वसंध्या के बाद ही से उषा ने न कभी मेरी ओर सीधे देखा है और न कभी मुझ से सीधे मुँह बात की है।
हाँ, पूर्णाधिकार से मेरे लिए उसके आदेश ज़रूर जारी होते रहते हैं।
दफ़्तर में भी और घर में भी।
बल्कि पूर्णाधिकार का तो वह अम्मा, छुटकी और मेरे तीनों बेटों के संग भी उपभोग करती है। अम्मा और छुटकी को अपनी सरपरस्ती की आड़ दे कर और मेरे बेटों को कभी आमोद-प्रमोद द्वारा तो कभी क्रीड़ा-कौतुक द्वारा तो कभी दुलार-फटकार द्वारा।
हम सभी को अपने खूँटे से बँधे रखने हेतु।
अपनी प्रजा बनाए रखने के निमित्त।
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