बंद इंजन
दीपक शर्मा
क्या मैं मृत्युलोक में हूँ? स्वर्ग आ पहुँचा हूँ?
धरती और आकाश के बाहर! तारामंडल से भी ऊपर!!
जहाँ दुर्भाग्य का कोई झटका नहीं . . .
कुर्की का निपटारा नहीं . . .
‘ही दैट डाएज़, पेज़ औल डेट्स . . .’
लिखा था शेक्सपियर ने ‘द टेम्पैस्ट’ में?
जो मर जाता है, वह सभी ऋण चुका जाता है . . .
“आपकी अपील मंज़ूर हो गई है,” मेरे वकील ने मुझे फ़ोन किया था, “सरकार ने आपको दिवालिया क़रार कर दिया है।”
अपने लेनदारों के नोटिस के जवाब में मैंने कचहरी में ऋण भुगतान के विलंबन की अपील दर्ज कराई थी।
“अब कारख़ाने जाने की मुझे कोई ज़रूरत नहीं?” मैंने पूछा था।
“कोई ज़रूरत नहीं। अभी दो-एक दिन घर में आराम कीजिए,” वकील ने कहा था, “पास-पड़ोस में यह ख़बर उतर लेने दीजिए . . .”
“ठीक है,” मैं मान गया था।
♦ ♦
मेरा कारोबार डूबा था। उसे बचाने के लिए मैंने जो नई भट्ठियाँ ख़रीदी थीं, वे भी स्टील से ज़्यादा स्टील स्क्रैप ही जमा कर पाईं थीं।
सारे उधार, सारे कर्ज़े सभी घाटे के सौदे साबित हुए थे।
सभी जमा मनफ़ी में बदलते गए थे और सभी ज़रबें तक़सीमों में।
बेशक पहली तक़सीम बड़े भाई ने की थी। पाँच साल पहले। हमारे पिता की मृत्यु पर। हमारे पुश्तैनी कारख़ाने के उन्होंने दो हिस्से कर दिए थे। पलटनी भट्ठी वाला ख़ुद ले लिया था और बेसेमर कन्वर्टर वाला हिस्सा मेरे नाम कर दिया था। उस समय मेरी बड़ी बेटी ग्यारह साल की थी और छोटी नौ की, जबकि उनके तीनों बेटे जवान हो चुके थे। कुंदन बाइस साल का था। किशोर बीस का। और रंजीत अठारह का। तीनों ही ने भैय्या के मार्गदर्शन तले अपनी पलटनी भट्ठी के गढ़े लोहे से कारोबार बहुत आगे बढ़ा लिया था। उनके बने इंजन बोल्ट ऊँचा दाम और ऊँचा नाम हासिल करने में सफल हो रहे थे।
♦ ♦
“आप कारख़ाने के लिए तैयार नहीं हो रहे?” बड़ी बेटी हैरान थी। सुबह के ग्यारह बजे मैं बैठक में क्यों बैठा था?
“नहीं . . .”
“फिर सोफ़े वाले से कैसे बात करेंगे?” उस पर एक ही धुन सवार थी। घर का पुराना सोफ़ा बदल दिया जाना चाहिए।
“बात हो जाएगी . . .”
“कैसे हो जाएगी?” वह भड़क ली थी, “कब हो जाएगी? आपको जब सोफ़ा बदलना ही नहीं है तो रोज़ मुझे क्यों बहकाते रहते हैं? एक बार बता दीजिए, मुझे सोफ़ा नहीं बदलना है, नहीं बदलना है . . .”
“सोफ़ा तो मैं बदलवा ही दूँगा,” कहते-कहते मुझे अपने दिल की पहली और दूसरी धड़कन के बीच खटपट और सरसराहट सुनाई दी थी।
उसे नज़रअंदाज़ करते हुए फिर भी मैंने बड़की को समझाने की चेष्टा की थी, “लेकिन तुम दुनियादारी में क्यों धँसना चाहती हो? अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है?”
“मेरी उम्र सत्तरह साल है और मैं जानती हूँ मेरी सहेलियाँ जब इस पुराने सोफ़े पर बैठेंगी तो मेरा मज़ाक उड़ाएँगी . . .”
“वे यहाँ क्यों बैठेंगी? तुम उन्हें यहाँ बुलाती ही क्यों हो?”
“वाह!” उसने हाथ नचाए थे,
“हमारे ग्रुप की सभी छह की छह लड़कियाँ मुझे अपने-अपने घर बारी-बारी से बुला चुकी हैं और अब मेरी बारी आई है तो मैं उन्हें बुलाऊँ नहीं? वे क्या सोचेंगी? क्या कहेंगी? हमारे पास से पीत्ज़ा खा गई? बर्गर खा गई? चाट खा गई? आइसक्रीम खा गई? हलवा खा गई? और अपनी बारी आने पर नथिंग? नथिंग? नथिंग एट औल?”
“तुम उन्हें किसी रेस्त्रां ले जाना,” मेरे दिल की खटपट और सरसराहट फिर आन टपकी थी, “घर लाना ही नहीं . . .”
“लेकिन वहाँ तो बहुत रुपया लग जाएगा,” बड़की उत्साह से भर उठी थी।
“तीन सौ रुपए से ज़्यादा?”
“तीन सौ रुपया होता ही क्या है?”
बड़की भक्क से हँस पड़ी थी, “रेस्त्रां जाएँगे तो सौ रुपया पर हेड भी कम पड़ेगा . . .”
“छह सौ चाहिए क्या?”
“छह नहीं। सात,” छोटी बेटी भी हमारे पास लपक ली थी। पिछले वर्ष हुई अपनी माँ की मृत्यु के बाद से दोनों बेटियाँ मुझ से भिगोए निवालों की अपेक्षा रखने लगीं थीं।
“ठीक है,” मेरे दिल में खटखट और सरसराहट की झड़ी लग गई, “मैं अपना पर्स खोलता हूँ। जितने रुपए उसमें होंगे, सभी आप दोनों के . . .”
संयोग रहा था जो पर्स में उस समय सात सौ रुपए निकल आए थे। छुट्टे बीस-तीस रुपए और थोड़ी रेज़गारी के इलावा।
“यू आर अ डार्लिंग,” झूूम कर बड़की ने मेरी गाल चूम ली थी और छोटी मेरे अंक से आ चिपटी थी।
“आज ही रेस्त्रां चले जाएँ? पपा?” छोटी पूछे थी, “लंच के लिए?”
“बेशक . . .”
“थैंक यू, पपा . . .”
“चाओ चाओ, पपा . . .”
उनके जाते ही मुझे पत्नी का ध्यान हो आया था। रुपए ऐंठने के लिए वह भी इन्हीं लड़कियों की तरह पहले मुझे ग़ुस्सा दिखाया करती थी, फिर लाड़-प्यार। पत्नी से मेरा रिश्ता गहरा नहीं रहा था। सतही था। बेटियों के प्रति साँझे चाव को छोड़कर हमारे बीच कुछ भी साझा न रहा था। मेरे कारोबार की मुश्किलों से उसे कोई सरोकार न रहा था। उसकी फ़िल्म, उसकी टीवी, उसकी किटी पार्टी, उसकी शौपिंग सब वह जारी रखती रही थी। बस, उसके आख़िरी दिनों ही में वे उसके साथ न चलीं। एक रात उसे तेज़ बुख़ार आया था और तीसरे दिन वह चल बसी थी। ब्रेेन फ़ीवर के तहत। उसकी कमी, उसकी आवश्यकता मैंने अपने लिए नहीं, लड़कियों ही के संदर्भ में ज़्यादा अनुभव की थी।
♦ ♦
“तुम घर पर हो?” भैय्या का फ़ोन दोपहर साढ़े बारह बजे आया था।
“हाँ . . .”
“अच्छा किया जो इधर नहीं आए। तुम्हारे कारीगर उत्पात मचाए हैं। बेसिर-पैर की उड़ा भी रहे हैं, कारख़ाना बंद होने जा रहा है . . .”
अपने कारोबार के लिए भैय्या की मदद मैंने कभी नहीं ली थी। क्रोधवश। ईर्ष्यावश। किसी भी फ़लाने से कर्ज़ पकड़ लेता रहा था। किसी भी ढिमके से उधार ले लेता रहा था। लेकिन भैय्या के सामने कभी नहीं बोला था, मुझे घाटा हो रहा था। रुपया मुझे कम पड़ रहा था।
“बंद नहीं, नीलाम . . .”
“क्या मतलब?”
“एक्सटेंशन एग्रीमेंट, विस्तारण के समझौते के अनुसार मुझ दिवालिए की सभी चीज़ें नीलाम होगी। कंप्लीट लिक्विडेशन, समूचा परिसमापन। बँगला। गाड़ियाँ। कारख़ाना सब नीलाम होगा . . .”
“तुम क्या कह रहे हो?”
“सच कह रहा हूँ,” मैं फट पड़ा था, “और आप ज़रूर आइएगा नीलामी पर। बोली लगाने . . .”
तभी मेरे दिल की खटखट और सरसराहट एक सख़्त, प्रचंड पीड़ा में बदल ली थी। पीड़ा मेरी छाती को चीर कर मेरी पीठ पर, मेरी गर्दन पर, मेरे जबड़ों पर, मेरी बाँहों पर सरक आई थी।
पसीने से तर-ब-तर मैं वहीं सोफ़े पर ढह लिया था।
लड़कियाँ अभी अपने लंच से लौटी नहीं थीं।
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