इन गुड फ़ेथ
दीपक शर्मा
सन् उन्नीस सौ उनसठ के उस दिन किशोर अपने पैतृक गाँव से लौटा था। जहाँ वह दसवीं की अपनी परीक्षा के बाद हुई लंबी छुट्टियों में कुछ दिन के लिए गया रहा था।
“वहाँ मुझे वह मिली थीं,” घर में घुसते ही उसने माँ को जा घेरा।
अपने दफ़्तर के लिए तैयार हो रहे प्रमिला के हाथ रुक लिए।
बिना पूछे ‘कौन?’ वह जान गई कि बेटा कांता की बात कर रहा था।
“तुम से कुछ कहा उन्होंने?”
“कहा, अपनी माँ से कहना वह मेरी गुनाहगार है। मेरे साथ उसने भली नहीं की। मेरे हक़ छीने बैठी है . . . ”
वह डर जो सन् छप्पन में जगदीश के नाम आए सम्मन को देख कर प्रमिला के दिल को धड़का गया था, अब किसी भूकंप की भाँति उसे कँपकँपा गया।
“उन्होंने यह भी कहा,” किशोर आगे बोला, “क़ानूनी तौर पर पापा की पत्नी वह हैं, आप नहीं। वह चाहें तो नए क़ानून के हवाले से अब भी वह पापा के संग रहने का अपना हक़ माँग सकती हैं। उन्हें अपने बाबा के सुपुर्द करके पापा उन की ज़िम्मेदारी से बरी नहीं हो सकते।”
“यह तुम अपने पापा को बताना। मुझे दफ़्तर के लिए अभी निकलना होगा,” प्रमिला को मालूम था मामला गुत्थी पर गुत्थी लिए था। जिसे सुलझाना उस के वश के बाहर था।
उसी दोपहर जब जगदीश अपने कॉलेज से घर लौटा, किशोर उस के पास पहुँच लिया, “वहाँ मुझे वह भी मिली थीं . . .”
“कौन?” सहज भाव से जगदीश ने पूछा।
“कांता चाची। . . .।”
“वहाँ रहेगी तो तुम्हें मिलेगी ही। इस में क्या बड़ी बात है?”
“बड़ी बात है,” किशोर उद्दंड हो लिया, “बहुत बड़ी बात है। उन्होंने कहा, उनके रहते आपका माँ से शादी करना ग़लत था। ग़ैर-क़ानूनी था।”
“प्रमिला से मैंने गुड फ़ेथ में शादी की थी . . . ”
“गुड फ़ेथ?”
“हाँ। गुड फ़ेथ। उन दिनों मैं सार्त्र से बहुत प्रभावित था और उसकी व्याख्या के अनुसार हमारे लिए अपने प्रति ईमानदार होना सब से ज़्यादा ज़रूरी है। मैंने प्रमिला के प्रति अपनी निष्ठा को सामाजिक रूप से स्वीकृति देने के लिए उससे शादी की थी . . . ”
“लेकिन कांता चाची के रहते . . . ”
“उस के रहते?” जगदीश ताव खा गया, “जिसे मैं बीसियों साल से मिला तक नहीं था। मैं नौ साल का था और वह ग्यारह की जब बाबा ने हमें ब्याह दिया था। वह शादी बाबा ने अपने पिछड़ेपन के अधीन मुझ पर थोपी थी। मेरा उस शादी से कोई लेना-देना नहीं रहा था . . . ”
“लेेना-देना कैैसे नहीं था?” किशोर मुक़ाबले पर उतर आया, “बाबा के फ़ैसले को सम्मान देना आपका कर्त्तव्य नहीं बनता था क्या?”
“मेरा पहला कर्त्तव्य अपने हित के प्रति बनता था। बाबा का फ़ैसला मेरे हित में नहीं था। अहित में था। उसे मानने पर मेरा भविष्य चमक न पाता। मुुझे एक रसहीन ज़िंदगी की ओर धकेल देता। वह मेरे मेल की नहीं थी। एक दम देहाती। अनगढ़ और गँवार। काला अक्षर भैंस बराबर। इधर मेेरे संपर्क में प्रमिला थी। पढ़ी-लिखी और नौकरीशुदा . . . ”
“आप के बालपन के विवाह का माँ को पता नहीं रहा क्या?”
“पता था। बिल्कुल पता था। मगर वह जानती थी मैंने उस औरत को कभी नहीं स्वीकारा था। ऐसे में मेरे संग ब्याह करने पर प्रमिला को क्या आपत्ति रहती? सन् तिरपन के उन दिनों कई लोग अपने बेमेल विवाह को पिछेल कर दूसरी शादी कर रहे थे। हिंदू मैरिज एक्ट अभी आया नहीं था . . . ”
“अगर वह न भी आया होता, तब भी मानवीयता के चलते माँ को आपसे शादी नहीं करनी चाहिए थी। जब तक आप कांता चाची से तलाक़ नहीं लेते . . . ”
“उन दिनों तलाक़ का चलन नहीं था। और फिर प्रमिला को शादी के लिए मैंने मनाया था। मैं जानता था वह मेरे लिए बेहतर रहेगी . . . ”
“तो आप अब तलाक़ ले लीजिए। माँ से आपकी शादी क़ानूनी बन जाएगी . . . ”
“नहीं बनेगी। नहीं बन सकती। इस समय अगर कांता से तलाक़ माँगता हूँ तो प्रमिला से मेरी शादी क़ानूनी रूप से अमान्य हो जाएगी। ‘नल ऐंड वौअड’। ऐसे में उसकी वैधता पर प्रश्नचिह्न लग गया तो उसकी सरकारी नौकरी जाती रहेगी . . . ”
“तो क्या तब मैं भी आपका वैध बेटा नहीं माना जाऊँगा?” किशोर रुआँसा हो चला।
“ऐसा कभी नहीं होगा, ” जगदीश ने किशोर को अपने अंक में भर लिया, “बाबा हम दोनों से बहुत प्यार करते हैं। उन्हें हमारे अच्छे-बुरे का बहुत ध्यान रहता है। वह हमारी मुश्किल समझते हैं। जभी तो कांता के मायके वालों ने जब हिंदु मैरिज एक्ट के सन् छप्पन में लागू होने पर मुझ पर केस बनाया था तो बाबा ने उन लोग को रुपए वग़ैरह दे दिला कर केस बंद करवा दिया था और कांता को उधर अपने पास गाँव लिवा ले गए थे . . . ”
“कांता चाची अगर फिर से आप को कचहरी ले गईं तो?”
“बाबा उन्हें फिर सँभाल लेंगे। तुम चिंता न करो। तुम अपनी पढ़ाई के बारे में सोचो। अगले दो साल में जितनी मेहनत करोगे, आई. आई. टी. में तुुम्हारे दाख़िला पाने की सम्भावना मज़बूत होगी . . . ”
♦ ♦
प्रमिला उस दिन दफ़्तर से लौटी तो अवसर मिलते ही जगदीश के साथ संध्या-भ्रमण के लिए निकल ली।
ऐसा अक्सर होता। जब भी प्रमिला के सामने कोई समस्या खड़ी होती वह जगदीश के साथ अकेले ही में बात करना पसंद करती। किशोर के सामने नहीं।
“किशोर बहुत परेशान हो कर लौटा है,” प्रमिला ने बात शुरू की, “कांता ने उसे क़ानूनी-ग़ैर-क़ानूनी और सही और ग़लत की ऐसी पट्टी पढ़ाई है कि उसके चक्कर में वह हम दोनों को कांता की नज़र से आँकने लगा है। हमें अपराधी मान बैठा है।”
“कांता को उस के साथ ऐसी बात नहीं बोलनी चाहिए थी . . . ”
“मुझे एक चिंता और भी है। कांता ने उसे यह भी कहा वह कभी भी एक पत्नी के अधिकार क़ानूनन माँग सकती है। कभी भी . . . ”
“बाबा उसे ऐसा कभी नहीं करने देंगे . . . ”
“ईश्वर न करे बाबा को कुछ हो मगर जीवन का क्या भरोसा? आज हैं। कल नहीं। और बाबा के न रहने पर बड़े भाई साहब ही कांता को कचहरी दोबारा जाने के लिए तैयार कर दें तो?”
“वह ऐसा कभी नहीं करेंगे। हमारा रिश्ता राम और लक्ष्मण सरीखा है . . . ”
“फिर भी मेरी मानें तो अपना यह मकान और गाँव वाली अपनी ज़मीन किशोर के नाम अभी करवा दें . . . ”
“तुम कहो तो वह सब तुम्हारे नाम कर दूँ?” जगदीश ने प्रमिला की पीठ घेर ली।
“वह न मैं कभी चाहूँगी, न कभी कहूँगी। मेेरे पास अपना काफ़ी है। बैंक में मेेरे पिता के दिए एफ़.डी. हैं। मेरा अपना प्रोविडेंट फ़ंड है . . . ”
“जानता हूँ तुम्हारे पास धन की कमी नहीं . . .”
“इतना कुछ ज़्यादा भी नहीं। फिर भी मैं सोचती हूँ मुुझ अकेली के नाम जो भी मेरे पूंजीनिवेश मेरे बैंक में और मेरे दफ़्तर के कागज़ों में दर्ज हैं उन सब में अपने नॉमिनी के तौर पर मैं किशोर का नाम लिखवा दूँ . . . ”
“मेरे नाम को काट कर?” जगदीश आहत हुआ।
“हाँ। आप के नाम की सम्पत्ति में कांता कब किसी भी अदालती दस्तावेज़ द्वारा अपना साझा बाँध ले, कोई भरोसा नहीं। इसीलिए तो मैंने आप से कहा था आप किशोर के नाम . . . ”
“वह मेरा मामला है। मैं उसे सुलझा लूँगा,” जगदीश खीझ गया और उसने अपने हाथ प्रमिला की पीठ से अलग कर लिए।
♦ ♦
पति-पत्नी घर लौटे तो अन्य दिनों की भाँति उनके गेट खोलने पर किशोर बाहर न आया।
अपने माता-पिता को ले कर किशोर में पहले जैसी उमंग न रही थी।
प्रमिला भी पहले जैसी प्रमिला न रहने वाली थी।
उस का प्रमाण आगामी दिनों ने पुष्ट कर दिया।
घर से बाहर जाते समय किशोर अब बताता नहीं कब लौटेगा। जब शाम गहराने लगती तो जगदीश को अपने साइकिल पर उसे कभी उसके एक दोस्त के घर तो कभी किसी दूसरे दोस्त के घर खोजने निकलना पड़ता। कई बार जब वहाँ नहीं मिलता तो किसी तीसरे दोस्त के साथ कभी वह किसी सिनेमाहाल में मिलता तो कभी किसी लॉन के बैंच पर पसरा हुआ।
पिता की फटकार पर, माँ के रोष पर तनिक कान न धरता।
कांता चाची के प्रति पिता की संवेदनहीनता यदि अक्षम्य थी तो माँ की मूढ़ता दयनीय।
उधर प्रमिला की चेतना में कांता आन बसी थी। परंपरा के उस अटल वज़न से जगदीश बेशक भाग निकला था किन्तु भयावय एक अमूर्त शक्ति के रूप में अदृश्य कांंता की उपस्थिति घर के भीतर, घर के बाहर प्रमिला को डराए रखती। क़ानूनी अपने शस्त्र से कचहरी के किसी वकील की फ़ाइल द्वारा प्रमिला को निशस्त्र करती हुई। प्रमिला का घर-संसार और उसकी नौकरी उससे छीनती हुई।
डर की अनसुलझी वह अराजकता अब दफ़्तर के उसके काम में बाधा डालती। ज़रूरी सरकारी परिपत्रों व नीतिगत अपडेट्स के विवरणों को अनदेखा हो लेने देती। पदोन्नति के संभावित उस के अवसरों को हाथ से निकल लेने देती। ‘हेड डेस्क’ द्वारा जवाबदेही माँगने पर सफ़ाई देने के समय उसकी बोलती छीन लेती।
घर में भी प्रमिला जो काम लेती, ढीले-ढाले ढंग से निपटाती। बेेमन। कपड़ों में साबुन रह जाता। इस्त्री में क़ीज़ छूट जाती। दही जमाना भूल जाती। जिस पति को वह अब तक एक आदर्श प्रेमी के रूप में देखती रही थी, वह अब एक व्यावहारिक व्यक्ति प्रतीत होने लगा था। जिस ने उस के मूल अस्तित्व से अधिक उसकी सजीव उपयोगिता का मोल लगाया था।
उसे लगता उस का अपना मानुष-जन्म व्यर्थ रीत रहा था।
उसकी बेध्यानी पर जगदीश यदि उसे ध्यान दिलाता तो वह उसीको किसी दूसरी बात पर सवाल-जवाब में उलझा देती।
फिर वह चुप कर जाता और छूटा हुआ अपना उपन्यास हाथ में ले लेता। दार्शनिक भाव से। बिना किसी अपराध-बोध के। उसे विश्वास था जटिल से जटिल स्थिति भी देेर-सवेर अपना हल खोज लिया करती।
हल निकला भी तो प्रमिला के प्राण के मोल।
दिन-ब-दिन बढ़ रहे भयातुर उस के इस आत्म-तोड़फोड़ ने शीघ्र ही उस के रक्तचाप पर धावा बोल दिया। अपनी उच्चतम सीमा को पार करते हुए।
जिस की जानकारी उस के सहयोगियों को स्थानीय अस्पताल के उस एमरजेंसी डॉक्टर से मिली जहाँ वे उसे लिवा ले गए थे जब वह काम करते-करते वहाँ अकस्मात् अचेत हो गई थी। उच्च रक्तचाप के लक्षण व संकट का उन दिनों साधारणजन की भाँति प्रमिला को भी संज्ञान न रहा था।
सैंकड़ों बार उस का सिर फटने-फटने को होता रहा था। साँस उखड़-उखड़ जाती रही थी। दिल की धड़कन उग्र से उग्रतर होती रही थी। किन्तु प्रमिला अपने दफ़्तर व घर के काम जैसे-तैसे निपटाती रही थी। उन सभी संकेतों को नज़रअंदाज़ करती हुई। उन्हें अपने मानसिक द्विभाजन से जोड़ती हुई।
ख़बर मिलने पर जब जगदीश व किशोर अस्पताल पहुँचे तो प्रमिला उन्हें अर्द्ध-चेतनावस्था में मिली।
किशोर उसकी पहचान में पहले आया। हाथ उठा कर प्रमिला ने उसे अपने पास बुलाना चाहा मगर अपना हाथ उससे उठाए न बना।
“ममी, आप को क्या हुआ?” किशोर रोने लगा।
“हौसला रखना,” प्रमिला फुसफुसाई।
“इन्हें ठीक होने में कितना समय लगेगा?” जगदीश ने अपनी उपस्थिति दर्ज की।
“समय लगेगा अभी,” नर्स ने जगदीश को अर्थपूर्ण ढंग से देखा।
“प्रमिला,” जगदीश घबरा गया, “इधर देखो।”
उसे देख कर प्रमिला बड़बड़ाई, “नाॅमिनी मेरा किशोर। आप भी उस के नाम . . . ”
मृत्यु ने उस का वाक्य पूरा न होने दिया।
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