गेंदा रानी

15-07-2026

गेंदा रानी

दीपक शर्मा (अंक: 301, जुलाई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

ड्यूटी रजिस्टर में अपने हस्ताक्षर के साथ मैंने अपना अराइवल टाइम दर्ज किया: दो बजे।

मेरे नाम के आगे मेट्रन ने रिकवरी रूम लिख रखा था।

मैं वहीं पहुँच ली।

सिस्टर सुशीला की पहरेदारी में बैड नम्बर दो पर एक बच्ची बेसुध लेटी थी। रूम के बाक़ी दो बैड ख़ाली थे।

“कैसा ऑपरेशन था?” मैंने पूछा।

“स्पलिट ब्रेन सर्जरी! पेशंट के कौर्पस कोलौज़्म पर छुरी-कैंची चलायी गई है,” सुशीला हँसी।

“कौर्पस कोलौज़्म?” नौ साल की मेरी नौकरी में इस ऑपरेशन का पहला केस मेरे सामने आया था, “मिर्गी रही इसे? चार्ट देखें?”

“ज़रूर देखो। मैं तो चली,” सुशीला ने अपना पर्स और स्वैटर उठाया और ड्यूटी छोड़ने से मिली राहत के अंतर्गत दरवाज़े की ओर लपक ली।

चार्ट पर मैंने अपनी नज़र दौड़ाई।

डॉक्टर इंचार्ज: डॉक्टर सरोज बाला। 
पेशंट का नाम: कांता
आयु: तेरह वर्ष 
रोग: पैरौक्सिमल मैलफ़ंक्शन औव सेरिब्रल नर्व सैल्ज़
ऑपरेशन: सर्जिकल रिमूवल औव एपिलेपटो जीनिक ब्रेन टिश्यू

मैं जान गई मिर्गी की वजह से पेशंट की जिन नर्व सैल्ज़ में बिगाड़ रहा था, उन्हें हटा दिया गया है—उस कौर्पस कोलौज़्म से, जो दो हिस्सों में बँटे हमारे दिमाग़ को जोड़ने वाली उन पचास करोड़ नर्व फ़ाइबर्ज़ के जाल का नाम है।

पेशंट की नब्ज़ गिनने पर संख्या आयी: पचपन।

तापमान लिया तो थर्मामीटर का पारा सत्तानवे अंक पर जा रुका।

दोनों अंक मैंने चार्ट पर चढ़ा दिए और अपना जासूसी उपन्यास उसके बुक मार्क पर खोल लिया।

हत्या की पूर्वापरता और कारण का पता लगाने हेतु नायक के साथ मैं भी आगे बढ़ने लगी। पीछे जाने के लिए। वह समय औंधा रहा था। समकालिक अपने समय के पार विगत, पूर्वव्यापी पृष्ठभाग को पकड़ने हेतु।

“सिस्टर,” पेशंट पर एनेस्थीज़िया का प्रभाव समाप्त हो गया लगता था।

“बताओ,” मेरा उपन्यास चौंकाने वाली स्थिति में पहुँच चुका था। अपनी सुरागरसानी के अंतर्गत जिस पात्र को नायक ने दोषी ठहराया था, वह सर्वथा अकल्पित रहा था। नायक हँस रहा था, “काँटे छितराने वाले को अपने पाँव नंगे नहीं रखने चाहिए . . .”

“बेहोशी में मैं कुछ बोली क्या?”

झूमा-झूमी खेल रही पेशंट की आवाज़ लड़खड़ाई।

बीच-बीच में उसकी दिशा से कुछ ध्वनि तरंगें हवा में तैरती ज़रूर रही थीं लेकिन मैंने उन्हें पकड़ा न था।

“हाँ,” एक गुदगुदाहट मेरे शरीर में दौड़ ली और अपने उपन्यास से अपनी नज़र हटा कर मैंने उस पर जमा दी।

“क्या कहा था मैंने?”

“बहुत कुछ,” छूट रही अपनी हँसी मैंने अपने कंठ में दबा ली।

“अपने पिता के बारे में?”

“अभी लौट कर बताती हूँ,” कहानी गढ़ने से पहले उसके परिवारजन से मिलना ज़रूरी था।

मेरे क़दम अस्पताल के लाऊँज की ओर बढ़ लिए।

वहाँ कई लोग बैठे थे लेकिन मुझे देखते ही एक द्वय मेरी ओर बढ़ लिया।

ज़रूर उनकी निगाह लाऊँज से दिखाई दे रही रिकवरी रूम के दरवाज़े पर टिकी रही थी।

द्वय के पुरुष की आयु साठ और पैंसठ के बीच रही होगी और स्त्री की तीस और पैंतीस के बीच।

“मिर्गी वाली लड़क़ी क्या अभी तक बेहोश है?” पुरुष से पहले स्त्री मेरे समीप पहुँची। देर तक रोते रहने के कारण उस की आँखें सुर्ख़ लाल थीं।

“हाँ,” मैंने झूठ बोला, “अभी तो डॉक्टर लोग आप से कुछ पूछना चाह रहे हैं . . .”

“डॉ. सरोज बाला?” पुरुष ने पूछा।

पुरुष की गालें हू-ब-हू उसी जगह से पिचकी हुईं थीं जिधर से मेरे बाबूजी की।

जबड़ों के ऐन ऊपर।

क्या उसने भी अपनी दाढ़ें उखड़वा रखीं थीं? मेरे बाबूजी की तरह?

अपने बाबूजी को देखे-सुने मुझे लगभग डेढ़ वर्ष होने जा रहे थे। लेकिन खोखली उनकी गालों से निकली वह दुगदुगी अभी भी मेरे साथ बराबर बनी रहती, “हमारा-तुम्हारा रिश्ता उस रेल-मुंशी के रहते क़ायम नहीं रह सकता . . .”

“आप रिटायर हो चुके हैं?” मैंने पूछा। मेरे बाबूजी को रिटायर हुए इस नवंबर को पाँच साल हो जाएँगे।

“हाँ। लेकिन पहले यह बताइए लड़की का ऑपरेशन ठीक हो गया न? उसे होश कब तक आएगा? डॉक्टर सरोज बाला उसे देख चुकीं क्या?” पुरुष के स्वर में प्रबल चिंता का आवेश था।

“डॉ. सरोज बाला को आप कैसे जानते हैं?” मैंने पूछा। हमारे रेलवे अस्पताल की वह सबसे पुरानी डॉक्टर रहीं।

“वह मुझे बहुत मानती हैं। मेरा बहुत लिहाज़ करती हैं। उन्हीं के आश्वासन पर हम ने यह ऑपरेशन करवाया है।”

“आप रेलवे में काम करते थे?” मैंने पूछा। मेरे बाबूजी डाकघर में सौर्टर रहे। डाक को छाँटते और व्यवस्थित किया करते।

“हाँ, पार्सल विभाग में था। मेरी सभी बेटियाँ इसी रेलवे अस्पताल में पैदा हुईं थीं। डॉ. सरोज बाला के हाथों . . .”

“वह दूसरे डॉक्टर हैं जो पेशंट की माँ से मिलना चाहते हैं,” मैंने कहा।

“मैं हो आऊँ, बाबूजी?” स्त्री की व्यग्रता फड़फड़ायी।

“हाँ बेटी। क्यों नहीं?”

मेरे क़दम विपरीत दिशा में घूम लिए। स्त्री मेरी बग़ल में लाऊँज पार करने लगी।

“आप अपने पिता के साथ रहती हैं?” लाऊँज का रास्ता तय होते ही मैंने स्त्री को घेर लिया, “अपने पति के साथ नहीं?”

“मेरे पति एक दूसरी औरत के पास रहते हैं। मेरी बेटी की मिर्गी भी इसीलिए शुरू हुई। हर कोई उससे पूछता, ‘तेरे पिता तुझे अपने पास क्यों नहीं रखते?’ और जवाब में उसके हाथ-पैर थरथराने लगते। झटके खाने लगते। फिर वह बेहोश होने लगी। बेहोशी में बहुत बिलखती। बहुत चिल्लाती। शुरू में कुछ पलों के लिए। फिर बढ़ते-बढ़ते आधे-आधे घंटे तक अपने होश खोए रहती . . .”

“आप के पति दूसरी औरत क्यों रखे हैं?” मैं हँसी।

“बोलते हैं, मैं तुम्हारा ख़र्चा नहीं उठा सकता। लड़की का ख़र्चा नहीं उठा सकता। मुझे नौकरी वाली पत्नी चाहिए . . .”

“तो कौन मुश्किल है?” मैं फिर हँस दी, “आप नौकरी कर लो . . .”

“कौन सी नौकरी कर लूँ? सात बहनें रहीं हम। और सबसे बड़ी मैं। जिसे सबसे जल्दी ब्याह दिया गया। हमारे बाबूजी बेचारे किस-किस को कहाँ-कहाँ तक पढ़ाते? जब भी, जहाँ भी अपनी बिरादरी में उन्हें ब्याहने लायक़ कोई लड़का दिखाई दिया, पट से उन्होंने अगले नंबर की लड़की अपनी उससे ब्याह दी . . .”

मेरे बाबूजी हमें ब्याहने में सुस्त रहे। ख़ूब सुस्त। चुस्त रहे तो हमें स्कूल भेजने में। हमें पढ़ाने के मामले में। परिणाम, हम पाँचों की पाँचों बहनें अपने पैरों पर खड़ी हैं। ब्याह के बिना। सबसे बड़ी बाबूजी वाले डाकघर में लगी है। दूसरे नंबर की एक प्राइमरी स्कूल में टीचर है। तीसरे नंबर की, मैं, इधर अस्पताल में तैनात हूँ। चौथे नंबर की एक ब्यूटी पार्लर में काम करती है और पाँचवीं एक एयरलाइंस में बुकिंग क्लर्क है।

“आप को किससे ब्याहा?”

“रेलवे के एक डाक-मुंशी से।”

“उस दूसरी औरत के पास नौकरी है क्या?” मैं पाँच-सात में पड़ गई। अकस्मात्‌।

“वह एक नर्स है,” स्त्री की आवाज़ धीमी पड़ गई, “शायद इसी रेलवे अस्पताल में . . .”

“क्या नाम है?” एक कँपकँपाहट ने मुझे अपनी मूठ में ले लिया।

“गेंदा रानी। क्या आप उसे जानती हो?”

“आप यहीं रुको,” उसके साथ चलना मेरे लिए मुश्किल हो गया, “मैं अभी आप को बुलाती हूँ।”

“ठीक है,” वह तत्काल रुक गई।

♦ ♦

रिकवरी रूम में पेशंट पूरी तरह जाग चुकी थी।

“सिस्टर, प्लीज़ बताइए, मैं अपनी बेहोशी में क्या बोली थी?” मुझे सामने पाते ही वह अधीर हो उठी।

“अपनी बेहोशी में आप बोलती हो?” मैंने प्रकृतिस्थ होने की चेष्टा की।

“हाँ,” वह मुस्कुराई, “माँ मुझे मेरे हर दौरे के बाद बताया करती है। अपनी बेहोशी में मैं बहुत अनाप-शनाप बोल जाती हूँ . . .”

“गेंदा रानी कौन है?” मैंने अपने को दाँव पर रख दिया।

“वह एक बुुरी औरत है जिसे मेरे पिता पिछले डेढ़ साल से हमारे घर ला बिठाए हैं। मैंने गेंदा रानी के बारे में कुछ बोला क्या?”

“तुम्हारे पिता उसे आप लोग के घर पर क्यों ला बिठलाए हैं?” अपने गिर्द रस्सी मुझे कस कर ताननी रही।

“क्योंकि मेरे पिता को अपनी तनख़्वाह पूरी नहीं पड़ती। उन्हें उसकी तनख़्वाह भी चाहिए। अपनी फ़ुज़ूल-ख़र्ची के लिए . . .”

“वह फ़ुज़ूल-ख़र्च है?” एक विराम मेरे भीतर उतरने लगा। चक्करदार जिस चक्रदोले की पुलक मुुझे पिछले डेढ़ वर्षों से निरंतर झुलाती रही थी, वह मेरी तनख़्वाह से पेंग लेती रही? प्रेम से नहीं?

“बहुत फ़ुज़ूल-ख़र्च है। पहनने-ओढ़ने को उन्हें तरह-तरह के कपड़े चाहिएँं। खाने-पीने को भाँति-भाँति के पकवान। सजने-सजाने को क़िस्म-क़िस्म के लोशन-पाउडर . . .”

वह सच कह रही थी। अपने ही खाने, पहनावे और बाँकपन को ध्यान में रखकर मेरा वह डाक-मुंशी अपना दिन शुरू करता। अपना दिन ख़त्म करता। उसकी ठुमक और शौकीनी, उसकी ख़रीदारी और फब के लिए उमंग निश्चित रूप से उसके जेब-ख़र्च में अन्तर्विष्ट होनी असंभव थीं।

“घबराओ नहीं,” मैंने पेशंट की गाल थपथपाई, “सच्चाई जैसे ही गेंदा रानी की निगाह से गुज़रेगी, वह उसी दिन आप लोग का घर छोड़ देगी। उससे अलग हो जाएगी।”

♦ ♦

“कांता की बेहोशी टूट गई?” जभी डॉ. सरोज बाला अपने एक दल के साथ रिकवरी रूम में आन दाख़िल हुईं। पीछे-पीछे रहे पेशंट के नाना और माँ।

“जी, मैडम,” मैंने उन का स्वागत किया।

“ऑपरेशन ठीक हो गया न?” पेशंट के नाना अभी भी बहुत अधीर थे।

“बिल्कुल ठीक हुआ है,” डॉ. सरोज बाला मुस्कुरा दीं, “कांता पूरी तरह होश में है। इसे मिर्गी के दौरे अब उसे कभी दिक नहीं करेंगे . . .”

“आप की बहुत मेहरबानी डॉ. साहिबा,” पेशंट के नाना रोने लगे।

“हाँ,” मैंने पेशंट की माँ के कान में स्वीकारा, “मैं गेंदा रानी हूँ।”

“मैंने सब पता लगा लिया है,” वह मेरे कान में फुसफुसाई।

“लेकिन मैं अकेली रहती हूँ। आप के पति के साथ नहीं . . .”

वचन दे रही थी मैं? उन माँ-बेटी को?

वचन ले रही थी मैं? अपने आप से? आप्त वचन!

क्योंकि मुझे अपने बाबूजी को फिर से अपने पास बुलाना है!! 

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