ऊपर उठी हुई नाक

15-04-2026

ऊपर उठी हुई नाक

दीपक शर्मा (अंक: 295, अप्रैल द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

 

“मेरी ट्विट अपनी पूरी उड़ान नहीं भर रही। आवाज़ भी इस की बीच ही में रुक रही है . . .”

बेटा मुझे अपनी इलेक्ट्रॉनिक चिड़िया दिखा रहा है। जो अभी पिछले ही माह मैंने उसे उसके पाँचवें जन्मदिन पर ले कर दी है। जिसे चाभी भरने पर उसे अपने पूरे पंख फैला लेने होते हैं और दो बार ‘ट्विट टवैट’, ‘ट्विट टवैट’ बोलना होता है।

“इस की चाभी लाओ,” मैं बेटे की ओर हाथ बढ़ाता हूँ।

चाभी भरता हूँ और चौंक जाता हूँ।

‘ट्विट टवैट’ दोहराने की बजाए वह एक ही बार ‘टिट फ़ौर टैट’ चटचटा कर चुपा गई है।

इंद्रधनुषी पंख भी उसके आधे ही फैल कर रुक गए हैं।

बाक़ी आधे उसकी देहपिच्छ में सिमटे रहे हैं।

“देखें,” पास बैठी पत्नी उसे अपने हाथ में थाम लेती है।

उसकी अधखुली लाल चोंच पर, गहरी नीली आँखोंवाले उसके शीर्ष पर, पीली उसकी कलगी पर, भूरे उसके चारों पैरों पर, हरी उसकी छाती पर, बैंजनी उसके कान वाले हिस्से पर, नारंगी उसके पेट पर और आसमानी उसके पुछल्ले पर बारी-बारी से हाथ फेरती है और फिर उस में चाभी भरती है।

ट्विट इस बार भी अपनी उड़ान और चहक में ढिलाई दिखाती है।

‘ट्विट टवैट’ दोहराती नहीं, एक ही बार टरटराती है, “टिट फ़ौर टैट।”

“अरे,” पत्नी उछलती है, “यह तो डच्च भाषा का ‘डिट ऐन डैट’ बोल रही है . . .”

“डिट ऐन डैट?” बेटा अपनी माँ का मुँह ताकता है।

“मतलब, दिस फ़ौर दैट,” पत्नी हँस पड़ती है, “यह दो, वह लो। तुम भी बोलो, “डिट ऐन डैट’ . . .”

“डिट ऐन डैट,” बेटा यंत्रवत बोल देता है। अनिष्ठापूर्वक।

“देखें,” पत्नी को नया खेल सूझ लिया है।

वह बेटे के ट्विट में दोबारा चाभी भरती है, “इस बार यह शायद कोई और भाषा बोल उठे . . . ”

पत्नी इस पब्लिक स्कूल में डच्च और फ़्रासीसी भाषाओं की अध्यापिका है। जिसके परिसर में हमारा यह क्वार्टर है। छह वर्ष पूर्व हम दोनों ने इस स्कूल में लगभग एक साथ नौकरी शुरू की थी। और उत्तरवर्ती दो माह के अन्दर ही झट मँगनी पट विवाह रचा डाला था। आवासी सुविधा पाने हेतु। स्कूल के ये क्वार्टर केवल विवाहित जन ही के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं।

“इस बार तो यह फ़्रासीसी बोल रही है,” ट्विट की ‘टिट फ़ौर टैट’ पर पत्नी फिर उछल ली है, “डूअ टौहक ओह टौहक . . .”

“डूूअ टौहक ओह टौहक?” बेटा पूछता है।

“सो मच्च फ़ौर सो मच्च,” पत्नी अपने हाथ फैलाती है और समेटती है, “जितना दोगो, उतना पाओगे। बोलो ‘सो मच्च फ़ौर सो मच्च’ . . . ”

“सो मच्च फ़ौर सो मच्च,” बेटा मुस्कुराता है। उसे पत्नी के इस खेल में मज़ा आने लगा है।

“मुझे दो,” पत्नी के हाथ से बेटे की ट्विट मैं अपने हाथों में लौटा लाता हूँ।

बेटे का ध्यान अपने वश में रखना चाहता हूँ। उसकी मुस्कुराहट का अनन्य संचालन करना चाहता हूँ।

उसकी ट्विट में चाभी भरता हूँ और अपनी हथेली पर उसके पैर जमा देता हूँ।

ट्विट के पंख इस बार भी आधे खुल कर भिड़ गए हैं और इस बार भी वह तड़तड़ाती है, “टिट फ़ौर टैट
।”

“यह लातिनी भाषा बोल रही है,” मैं अकड़ लेता हूँ, “कविड प्रो को।”

इस स्कूल में मैं अंग्रेज़ी पढ़ाता हूँ और अंग्रेज़ी शब्दों एवं मुहावरों की उत्पत्ति अक्सर लातिनी शब्दों से जोड़ा करता हूँ। यथोचित सहसम्बद्धता के अनुरूप।

“कविड प्रो को, मतलब, एक चीज़ के बदले दूसरी चीज़। बोलो बेटे, बोलो। ‘कविड प्रो को’ . . .”

“कविड प्रो को,” हँस कर बेटा मेरी गोद में आ बैठता है, “कविड प्रो को . . .”

“अंग्रेज़ी में इस का एक और पर्याय भी है: ‘मैयरर फ़ौर मैययर’। माप के बदले माप। जिस माप में लो, उसी माप में दो,” पत्नी कहती है।

“शेक्सपियर का एक नाटक भी है, ‘मैययर फ़ौर मैययर’,” पत्नी को चिढ़ाने का अच्छा अवसर मुझे अनायास मिल रहा है और मैं कहता हूँ, “उस में एक एंजलो है और एक मैरियाना और एक सुन्दर प्रेम-गीत:

“टेक, ओ टेक यौर लिप्स अवे
दैट सो स्वीटली वर फ़ौरस्वौर्न
एंड आएज़: द ब्रेक औव डे
एंड लाइट्स दैट मिसलीड मौर्न” 

(ले जाओ, रे, ले जाओ उन होंठों को
जिन्हों ने मनभावनी मगर झूठी क़समें खायीं
और उन आँखों को: पौ फटने की पहली किरण 
जैैसी जो सुबह हो जाने का भ्रम देती है) . . . ”

शेक्सपियर के लगभग सभी मुख्य नाटक मुझे कंठस्थ हैं। कुछेक, इस पब्लिक स्कूल में आने से पहले के तीन वर्षों के दौरान देहली रंगमंच पर अपनी नाट्यकला के परीक्षण एवं प्रदर्शन के अंतर्गत। कुछेक, इस पब्लिक स्कूल में उन के सार्वजनिक मंचन के प्रभारी होने के कारण और कुछेक के यहाँ की विभिन्न कक्षाओं के पाठ्यक्रम में सम्मिलित होने के कारण।

“ब्रेक ऑफ़ दाए सौंग, (अपना गीत रोक लो),” अधीर हो कर पत्नी मुझे इस गीत के उत्तरवर्ती मैरियाना के शब्द दोहरा कर मुझे रोक देती है, “उस प्रॉब्लम प्ले (समस्यामूलक नाटक) का हमारे वर्तमान प्रसंग से है कोई मतलब? मैंने तो ‘मैययर फ़ौर मैययर’ का उल्लेख आप के ‘कविड प्रो को’ आप के समानार्थक प्रसंग में किया था। और उसी प्रसंग में मुझे एक फ़्रासिसी मुहावरा याद आ रहा है, “ए रौंलेंड फ़ौर ऐन औलिवर’ . . .”

मेरी गोद में बैैठा बेटा मेरी ओर देखकर मुस्कुराता है। उसकी मुस्कुराहट मुझे पत्नी के मुक़ाबले में उतर आने के लिए उकसाती है।

“फ़्रासिसी वे दो ऐसे योद्धा थे जो हर बात में समानता रखते थे . . .” बेटे की गाल थपथपा कर मैं शुरू हो लेता हूँ, “एक बार राइन के एक टापू में वे दोनों एक दूसरे से पाँच दिन तक तलवारबाज़ी करते रहे किन्तु कोई भी एक दूसरे को हरा नहीं पाया। तुम्हारे ममी-पापा की तरह। वे भी एक दूसरे को कहाँ हरा पाते हैं?”

“हम रौंलेंड और औलिवर कैसे हुए?” पत्नी फिर मंच के केंद्र में आ खड़ी होती है, “स्कूल के क्षेत्र में हम बेशक एक जैसी क्षमताएँ रखते हैं। एक समान तनख़्वाह पाते हैं। लेकिन घर के काम में आप मेरी बराबरी नहीं कर सकते। आप गैस नहीं जला सकते। सब्ज़ी नहीं काट सकते। आटा नहीं सान सकते। कपड़े नहीं धो सकते। उन पर लोहा नहीं कर सकते . . .”

“अब नया राग कौन अलाप रहा है?” एक क्रोधोन्माद मेरे अंदर उतर रहा है, “टेढ़े-मेढ़े कौन बह रहा है? प्रसंग से कौन भटक रहा है?”

नाटकीय अंदाज़ में पत्नी मेरी हथेली से बेटे की ट्विट उठाती है और उस में चाभी भर कर बेटे को बीच वाली मेज़ पर आने का निमंत्रण देती है, “देखें, मेज़ पर पहुँच कर तुम्हारी ट्विट क्या बोलती है?”

बेटा मेरी गोदी से उतर लेता है और अपनी माँ के पास जा खड़ा होता है।

“टिट फ़ौर टैट,” मेज़ से ट्विट चीखती है।

मेरा लहू अब उबल रहा है।

“टिप फ़ौर टैप,” पत्नी बेटे को एक हल्का टहोका देती है और हँसती है, “अब तुम मुझे धक्का दो। ‘टिप फ़ौर टैप’। मेरे झटके की जगह तुम्हारा झटका। बोलो, “टिप फ़ौर टैप’ . . . ”

“टिप फ़ौर टैप,” बेटा हँसता है और अपनी माँ की टाँगों से जा चिपकता है।

उत्साह से भर कर पत्नी बेटे को मेरी बग़ल में ला बिठाती है और अपनी आँखों की पुतलियाँ फैला कर अपने हाथ खोल कर बेटे के चेहरे पर ले आती है, “‘ऐन आए फ़ौर ऐन आए’। तुम मेरी आँख फोड़ोगे तो मैं तुम्हारी आँख फोड़ दूँगी। ‘अ टुथ फ़ौर अ टुथ’। तुम मुझे चबाओगे तो मैं तुम्हें चबा जाऊँगी . . . ”

अपना मुँह खोल कर पत्नी अपने दाँत निकालती है और चिंघाड़ती है।

उसकी चिंघाड़ में मैं एक ललकार सुन रहा हूँ। एक महाघोष: ‘मैं बलवती हूँ। तुम्हें बराबर की टक्कर दे सकती हूँ। तुम्हारे हर जोड़ का तोड़ रखती हूँ . . .’

मेरा लहू मेरे अंदर चिंगारियाँ छोड़ता है। ताबड़तोड़।

और मेरे हाथ उठ कर पत्नी के मुँह पर जा बरसते हैं।

ज़ोरदार और ज़बरदस्त।

“यह क्या है?” पत्नी चौंकती है। उसके मुँह से लहू टपकने लगा है।

“तुम्हारी नारेबाज़ी का जवाब। तुम्हारी बराबरी का हिसाब . . . ”

बेटा रोने लगा है।

पत्नी से उलझ रहे अपने हाथ मैं तत्काल रोक लेता हूँ और उन्हें बेटे की ओर ला बढ़ाता हूँ।

विपरीत निश्चय के साथ।

बेटे को अपनी बाँहों के घेरे में लाकर चुमकारता हूँ। पुचकारता हूँ।

“तुम रोओ नहीं, बच्चे। चलो, मेरे साथ चलो। तुम्हारी ट्विट की दुकान पर चलते हैं। वहाँ दुकानदार इस की मरम्मत कर देगा। और यह ठीक हो जाएगी। और अपना यह चरचराना छोड़ कर फिर से ‘ट्विट टवैट’, ‘ट्विट टवैट’ गाने लगेगी . . . ” 

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