ऊँची छलाँग 

15-07-2026

ऊँची छलाँग 

दीपक शर्मा (अंक: 301, जुलाई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

जब एक बड़े शहर के जाने-माने अस्पताल में मेरी नियुक्ति हुई तो मैं फूली न समायी।

ख्याति-प्राप्त डॉ. मिश्रा हमारे मनोविकृति-विज्ञान विभाग के अध्यक्ष थे। देश-विदेश की कई महत्त्वपूर्ण चिकित्सा-पत्रिकाओं तथा संस्थाओं से वह सम्बद्ध थे और उनके सम्पर्क मेरी पुस्तक ‘सोशल क्लांबिंग’ अथवा ‘सामाजिक आरोहण’ की सामग्री एकत्रित करने में मेरी सहायता की अच्छी सम्भावना रखते थे।

परन्तु उस अस्पताल में जब मेरी भेंट शशि दी से एक रोगिणी के रूप में हुई तो मैं स्तब्ध रह गई।

माथे पर चढ़ी भौंहै लिए विस्फारित नेत्रों वाला क्लांत, पीला तथा स्थूल चेहरा क्या उन्हीं शशि दी का था जो आज से सात साल पहले अनूठा सौंदर्य व जीवंतता छलकाया करता था? लबालब?

उनके चेहरे पर व्याप्त इस संत्रास व बोझिलता के लिए कहीं हमारे विभाग की प्रगाढ़ चिकित्सा-पद्धति ही तो उत्तरदायी नहीं थी?

“शशि दी?” आश्चर्य मिश्रित अपने क्षोभ को मैंने दबाना चाहा, “मैं कुसुम . . .”

“हाँ,” वह उत्तेजित हो उठीं, “तुम तो जानती हो मेरा परिवार दरिद्र नहीं था?”

“आप क्या कह रही है?” मैं हक्की-बक्की रह गई, “शैक्षिक क्षेत्र में आपके परिवार की साख तो हमारे पूरे कस्बापुर में मशहूर है . . .”

“डॉ. मिश्रा, आज बिजली लगाने में इतनी देर क्यों हो रही है?” तभी राजा-सरीखे एक सज्जन हमारे कमरे में चले आए।

“सब कुछ तैयार है,” डॉ. मिश्रा विनीत स्वर में अपनी सफ़ाई देने लगे, “मेरी नई सहायिका, कुसुम जोशी, आप की पत्नी के शहर की निकल आयीं तो मैंने उन्हें गपशप कर लेने दी . . .”

“कुसुम जानती है मेरी माँ सरकारी इंटर कॉलेज की प्रिंसीपल है,” शशि दी के हाथ-पैर उनकी उत्तेजना के कारण व्यवस्थित नहीं रह पा रहे थे, “और मेरे बाबूजी ने अर्थशास्त्र में ऐसा शोध-ग्रंथ लिख रखा है जिसे . . .”

“बड़े दुर्भाग्य की बात है मेरी पत्नी का रोग घटने की बजाए बढ़ता ही जा रहा है,” राजा-सरीखे सज्जन के चेहरे पर घोर चिंता घिर आई, “अपने माता-पिता और अपनी बातें कभी ख़त्म नहीं होने देती। कभी-कभी तो मुझे आशंका होने लगती है मेरी उद्विग्नता जल्दी ही निराशा का रूप धारण कर लेगी . . .”

“नहीं, आप ऐसा न सोचिए,” डॉ. मिश्रा अपना भेद-सूचक स्वर प्रयोग में ले आए, “यदि प्रघात अपना चमत्कार न दिखा पाए तो हम कोई नई राह खोज निकालेंगे। कुछ दिन अपने यहाँ इनडोर पेशंट बना कर सुधार ले आएँगे . . .”

“तुम मुझे बचा लो, कुसुम,” शशि दी विह्वल हो कर काँपने लगीं, “तुम भी डॉक्टर हो। तुम भली-भाँति जानती हो बिजली लगाने से मानसिक रोग . . .”

“आप दूसरे कमरे में चली जाइए,” राजा-सरीखे सज्जन ने शशि दी का बाक़ी वाक्य मुझे सुनने न दिया।

“हाँ, तुम अभी लाइब्रेरी में बैठो,” डॉ. मिश्रा ने उन सज्जन का अर्थ-गर्भित संकेत तुरंत पकड़ लिया और न चाहते हुए भी मुझे उस कमरे से बाहर जाना पड़ा। 

अगले दिन जैसे ही मैंने अपने विभाग में पग धरा, डॉ. मिश्रा ने मुझे अपने कमरे में बुलवा भेजा और आदेश दिया, “तुम्हें अभी आलोक प्रसाद के यहाँ जाना होगा। उन्होंने तुम्हारे लिए अपनी गाड़ी भिजवाई है ताकि बिना किसी हो-हल्ले के तुम उनकी पत्नी, शशि, को यहाँ लिवा लाओ। वह उसे हमारे अस्पताल में दाख़िल कराना चाहते हैं। तुम्हें वह जानती है और तुम्हारे संग सहज ही चली आएगी . . .”

“क्या उनका केस इतनी गंभीर प्रकृति का है?” मैं चौंकी।

“इस पर बाद में बात करेंगे,” डॉ. मिश्रा मुझे टाल गए, “शिज़ोफ़्रेनिया इतना जटिल विषय है कि वह जल्दबाज़ी में निपटाया नहीं जा सकता।”

“जी, सर,” मैंने तुरंत जाने की तत्परता प्रकट कर दी, “उनकी गाड़ी कौन सी है?”

“मेरा चपरासी तुम्हें गाड़ी तक पहुँचा देगा।” 

(2) 

परी-कथाओं में जैसे विवाह हुआ करते हैं, लगभग सात वर्ष पहले शशि दी का विवाह भी वैसा ही हुआ था। सरकारी अतिथि-गृह शशि दी के घर के सामने पड़ता था और उन्हीं दिनों राजकुमार-सरीखा एक नवयुवक अपने एक मित्र के साथ वहाँ ठहरा हुआ था। जब भी वह अपने कमरे की खिड़की खोलता उसे शशि दी दिखाई दे जातीं। और फिर वह उन्हें ब्याह कर अपने घर ले गया।

डॉक्टरी की अपनी पढ़ाई के लिए कस्बापुर छोड़ने तक शशि दी के विवाहित जीवन के बारे मैं इस से आगे कुछ न जानती थी और उन्हें उनकी वर्तमान स्थिति में देखना मेरे लिए किसी झटके से कम न था। 

गाड़ी एक बहुत बड़े बँगले के आगे रुकी।

ड्राइवर के रुकते ही बाहर खड़े चौकीदार ने आगे बढ़ कर लोहे का फ़ाटक खोला।

बाग़ीचे और लौन के दोनों मालियों के हाथ पल भर को रुके और फिर कार्यरत हो गए।

चौकीदार ने सलाम के साथ मुझे बरामदे में रखी कुर्सियाँ दिखाईं और लोप हो गया।

अगले ही क्षण उनमें से एक पर बैठने का मुझे निमंत्रण मिला। निमंत्रण देने वाली एक अधेड़ महिला थी। उनके बाल स्याह काले थे। उनकी साड़ी क़ीमती टस्सर की थी और कानों में डाल रखे बड़े आकार के उनके हीरे ख़ालिस मालूम देते थे।

“आलोक ने कल बताया,” वह एक साथ उत्तेजित व व्यग्र लग रही थी, “तुम शशि के क़स्बे की हो।”

“हमारे शहर का पूरा नाम कस्बापुर है,” मैंने उनकी भूल सुधारी।

“शशि को अभी पता नहीं चलना चाहिए कि तुम उसे लिवाने आयी हो,” उन्होंने मेरी आपत्ति पर तनिक कान न धरा, “वह बहुत जल्दी चिल्लाने लगती है। साधारण परिवारों से आई औरतें चीखतीं बहुत हैं। स्त्री-सुलभ संकोच व शालीनता से उन्हें परहेज़ रहता है।”

“इन्हें वहाँ बैठक में क्यों नहीं बिठाया?” तभी एक वृद्ध सज्जन बरामदे में चले आए। उनके बाल भी स्याह काले थे। उन्होंने अपनी सभी उँगलियों में अँगूठियाँ पहन रखीं थी। जिनके नग उनकी विभिन्न आशंकाओं को प्रकट कर रहे थे।

“आप शोरूम जा रहे थे। क्या हुआ?” अधेड़ महिला पति पर झल्लायी।

“शोरूम में क्या आग लग गई है जो मेरा वहाँ तत्काल पहुँचना ज़रूरी है?” उनके स्वर का चुलबुलापन मुझे गुदगुदा गया।

“कल नलिनी हमारे शोरूम पर गई थी। कह रही थी डिस्काउंट सेल के बावजूद भी ख़ास बिक्री नहीं हो पा रही,” अधेड़ महिला ने कारोबार की बात चला कर पति के आमोद-प्रमोद की चेष्टाएँ धराशाई करनी चाहीं।

“बेबी, तुम डॉक्टर नहीं हो सकती,” वृद्ध सज्जन ने मगर दुगुने उल्लसित स्वर के साथ मेरी ओर देखा, “तुम तो बिल्कुल बच्ची हो। आलोक ने कल बताया शशि के अस्पताल में काम करने तुम अभी हाल ही में आयी हो . . .”

“आपको सुबह से कितनी बार बोल चुकी हूँ आपका शोरूम में उपस्थित रहना बहुत ज़रूरी है। अब आप वहाँ जा क्यों नहीं रहे?” अधेड़ महिला के स्वर की कटुता व हठधर्मिता ने उनके विवाहित जीवन के पूरे इतिहास को मेरे सामने उधेड़ कर रख दिया। वह अवश्य ही अधिक सम्पन्न परिवार से थी जो बात-बात पर पति को लताड़ती रहतीं थीं। शायद वह नहीं जानती थीं पति को नीचा दिखाने के उनके विभिन्न प्रयास ही पति के हठीलेपन को बढ़ावा देते थे। अपने पुरुषत्व तथा अहम-भाव को अक्षुण्ण बनाए रखने का यही रास्ता उनके पति को जंचा होगा क्योंकि उसीके द्वारा वह पत्नी को निरंतर ठेस पहुँचाते रहने में सफल हो सकते थे।

“चलो, अन्दर बैठेंगे,” वृद्ध सज्जन ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे गोलाकार एक बड़े कमरे में ले आए।

राजसी ठाठ लिए बेहद सुरुचिपूर्ण उस कमरे के एक बड़े सोफ़े पर मुझे बैठ जाने का संकेत देकर वृद्ध सज्जन ने पूछा, “तुम क्या लोगी? शर्बत या किसी फल का रस?”

“पुत्तीलाल को मैंने चाय बनाने के लिए कह रखा है,” अधेड़ महिला भी हमारे साथ अन्दर आ चुकी थी, “आप बेफ़िक्र हो कर शोरूम हो आइए।”

“तुम ने फ़ैसला लिया तुम क्या लोगी?” वृद्ध सज्जन ने पत्नी की बात अनसुनी कर दी, “फ़ालसे का शर्बत या सेब का रस?”

“आप यहाँ क्या कर रहे हैं,” अधेड़ महिला का स्वर फिर तन गया, “शोरूम तक हो क्यों नहीं आते?”

“यह मेरे कस्बापुर की है,” तभी शशि दी वहाँ आ पहुँची, “यह जानती है कस्बापुर में मेरी माँ की कितनी इज़्ज़त है, मेरे बाबूजी को लोग कितना मानते हैं . . .”

“यह लड़की हमारे अनुकूल न थी,” अधेड़ महिला मेरे कान में फुसफुसाई, “भूल से बेचारी ऊँची छलाँग लगा बैठी। इस के माँ-बाप ने सोचा होगा, जमाई इकलौता वारिस है, सब के बारे-न्यारे हो जाएँगे . . .”

“क्यों इस बच्ची को चाय के लिए तैयार कर रही हो?” वृद्ध सज्जन ने पत्नी को चिढ़ाना जारी रखा, “तुम असमंजस में क्यों पड़ती हो, बेबी? तकल्लुफ़ छोड़ती क्यों नहीं? यदि मेरी पत्नी ने तुम्हें बर्फ़ के नुक़्सान बता कर डरा दिया है तो गर्म कॉफ़ी ही पी लो . . .”

“क्या तुम्हें याद है वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में मैं हमेशा प्रथम पुरस्कार पाया करती थी?” शशि दी की आँखों में उन्माद फैलने लगा, “टेबल-टेनिस में कितने ही कप जीत रखे थे मैंने? इंटर की फ़ेयरवेल पार्टी में स्वप्न-सुंदरी मुझी को चुना गया था? और गर्ल-गाइडिंग में बेस्ट गर्ल गाइड का सर्टिफ़िकेट मुझे मुख्यमंत्री ने अपने हाथों से दिया था?”

“आपको भैया जी अन्दर बुला रहे हैं,” तभी एक नौकर अधेड़ महिला के पास आ खड़ा हुआ।

“आप भी चलिए,” अधेड़ महिला ने पति को अर्थपूर्ण ढंग से देखा।

“फिर मिलेंगे,” वृद्ध सज्जन मेरी ओर देख कर मुस्कराए और पत्नी के साथ कमरे से बाहर चले गए।

“तुम आज दिन भर मेरे साथ यहीं रहना,” शशि दी मेरे पास खिसक आयीं, “आज शाम कोई ख़ास मेहमान आ रहे हैं। मेरी सास को अपने बेटे का दूसरा ब्याह रचाने की बहुत जल्दी है। सच तो यह है कि ये लोग मुझे पागल क़रार करने की योजना बनाए बैठे हैं ताकि इसी आधार पर इनके इकलौते को तलाक़ मिल जाए। मुझे खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, सजने-सँवरने का कोई अधिकार नहीं क्योंकि मेरे पिता इनके लिए भारी-भरकम दहेज़ नहीं जुटा पाए।

“जब तक मेरी सेवा-सुश्रुषा ने आलोक की रईस नानी को जीवित रखा, मेरे शील, संकोच, त्याग और सेवा-भाव को तूल मिलता रहा। परन्तु उसके ओझल होते ही मेरी प्रासंगिकता ख़त्म हो गई। अब सास मुझसे दुःसह दुर्व्यवहार करती है। ससुर आपत्तिजनक बोली-ठोली छोड़ते हैं। पति जघन्य अवहेलना करते हैं। बेटे बदतमीज़ी से बात करते हैं। नौकर-चाकर गुस्ताख़ी दिखाते हैं। इस पर मैं तिलमिलाती हूँ तो मुझे बावली क़रार दे कर बिजली लगवा दी जाती है . . .”

“आप कुछ दिनों के लिए कस्बापुर क्यों नहीं चली जातीं?” मैंने पूछा।

“माता-पिता का प्यार और स्वीकार मुझे इस पीड़ा से मुक्ति तो दिला सकता है परन्तु मेरे अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकता। मेरे बेटों को मेरे निकट नहीं ला सकता। और मैं यह भी जानती हूँ मैं यहाँ से एक दिन के लिए भी हट गई तो फिर इस घर के दरवाज़े मुझे बंद मिलेंगे . . .”

“आप चिंता न करें,” शशि दी की वेदना का आप्लावन मुझे अस्थिर कर गया, “मैं अपने विभागाध्यक्ष को वास्तविकता से अवगत कराऊँगी। जल्दी ही आपके अधिकार पुनः स्थापित हो जाएँगे और सुख आपकी झोली में फिर से आन गिरेगा . . .”

“सच?” शशि दी हँसी तो उनके गालों के गड्ढे गहरा उठे। उनकी आखों का उद्वेग चमक में बदल लिया और उनका रोम-रोम उत्कंठा से पुलकने लगा।

“मैं शोरूम तक जा रहा हूँ,” तभी राजा-सरीखे सज्जन कमरे में चले आए, “जाने से पहले तुम्हारी सहेली को अस्पताल तक छोड़ सकता हूँ। चाहो तो तुम भी संग चल सकती हो। कुछ घंटे अपनी सहेली के साथ बिता सकती हो।”

“कुसुम शाम तक यहीं रहेगी,” शशि दी पूर्णतया आश्वस्त तथा प्रसन्न बनी रहीं।

“क्या तुम्हारी सहेली भूल गई डॉ. मिश्रा की आज्ञा के बिना यदि वह दिन भर यहाँ रह गई तो उसे अहितकर टिप्पणी के साथ तुरंत बरख़ास्त भी किया जा सकता है?” राजा-सरीखे सज्जन ने मुझे धमकी दी।

“शायद हमारा यहाँ से जाना ही बेहतर रहेगा,” मैं तुरंत उठ खड़ी हुई। मैं अपनी नौकरी को जोखिम में नहीं डाल सकती थी। 

 (3) 

जब डॉ. मिश्रा ने शशि दी को अस्पताल में भर्ती करने की सभी औपचारिकताएँ पूरी कर लीं तो वेटिंग रूम में बैठी शशि दी को मेरे साथ अन्दर उनके कमरे में बुलाया गया।

“मेरा सहयोग आपको सदैव उपलब्ध रहेगा,” डॉ. मिश्रा राजा-सरीखे सज्जन से वहाँ गोपनीय स्वर में बात करते मिले।

“इनकी देखभाल का ज़िम्मा आप पर छोड़ कर मैं भार-मुक्त हुआ,” राजा-सरीखे सज्जन ने डॉ. मिश्रा को एक प्रशस्त मुस्कान दी।

फिर मेरी ओर मुड़कर मुझ से बोले, “क्षमा करिए, आज मैं आप का स्वागत करने में असमर्थ रहा। जब से मेरी पत्नी अस्वस्थ रहने लगीं है मैं बुरी तरह चूक जाता हूँ। आप तो समझदार डॉक्टर हैं। समझती हैं जिस किसीका पारिवारिक जीवन छिन्न-भिन्न रहेगा, वह विक्षिप्त तो हो ही जाएगा।”

“तुम इन्हें सँभालो,” डॉ. मिश्रा मेरी ओर देखे, “मैं इन्हें बाहर तक छोड़ने जा रहा हूँ . . .”

“मेरे पति मुझे यहाँ छोड़कर नहीं जा सकते। मैं यहाँ नहीं रहूँगी,” शशि दी उग्र हो आयीं, “मैं कोई टिड्डी-मकड़ी नहीं जिसे रौंद कर तुम अपनी राह चल दोगे। कोई आलू-बैंगन नहीं जिसे तुम चबा डालोगे। कोई नींबू-संतरा नहीं जिसे तुम चूस कर फेंक सकोगे। कोई मुर्ग़ी-हिरणी नहीं जिस का मांस तुम नोच कर भून दोगे। मैं मनुष्य जाति का मुख्यांश हूँ। मुख्याधार हूँ। श्रद्धेय नारी हूँ . . .”

“आपकी सहेली के लिए कुछ दिन यहाँ रहना बहुत ज़रूरी है,” राजा-सरीखे सज्जन अपनी प्रफुल्लता छिपाने में असफल रहे, “मुझे अब जाना होगा।”

“सर,” मैंने डॉ. मिश्रा को रोकना चाहा।

“मैं अभी आया,” डॉ. मिश्रा ने मुझे ढाढ़स बँधाया, “तुम घबराना नहीं।”

“जी, सर,” मैंने सिर हिला दिया। वह मेरे विभागाध्यक्ष थे। उनका विरोध करना मेरे लिए असंभव था।

“तुम अच्छी लड़की नहीं हो,” शशि दी मुझ पर बरस पड़ी, “तुम एक ज़िम्मेदार डॉक्टर भी नहीं। तुम बहरी हो। तभी तो अपनी आत्मा की आवाज़ सुन नहीं पाती। तुम अंधी हो। तभी तो अन्याय तुम्हें दिखाई नहीं देता। तुम गूँगी हो। तभी तो न्याय के पक्ष में अपनी आवाज़ बुलंद नहीं कर सकती। तुम पत्थर दिल हो। तभी तो मेरा दुख तुम्हें सालता नहीं . . .”

मैं पत्थर दिल नहीं थी फिर भी मेरे रोंगटे खड़े न हुए . . .

मैं गूँगी नहीं थी, फिर भी अवाक्‌ बनी रही . . .

मैं अंधी नहीं थी फिर भी शशि दी के आसुओं ने मेरी निष्क्रियता नहीं तोड़ी . . .

मैं बहरी नहीं थी, फिर भी निश्चल साँस लेती रही . . .

मुझे काठ मार गया था। 

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