मुर्दा दिल

01-01-2026

मुर्दा दिल

दीपक शर्मा (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

इंदिरा की बीमारी का नाम हमें बाद में पता चला था। 

एक्यूट लिम्फ़ोसाएटिक ल्यूकीमिया। 

लेकिन उस के तीसरे गर्भपात के दिन ही से माँ और मैं अपने घर-द्वार के लिए एक नवेली चाहने लगे थे। 

बीमारी का नाम उद्घाटित होते ही माँ की सलाह पर मैंने एक नामी अख़बार में अपने लिए एक वैवाहिक विज्ञापन भी दे दिया था:

“अट्ठाइस-वर्षीय संतान-विहीन विधुर के लिए एक कामकाजी सुंदरी चाहिए। पच्चीस से नीचे। लखनऊ-वासिनी को वरीयता।”  

इंदिरा की मृत्यु के पश्चात माँ को मैं अपने साथ लखनऊ ले जाने का इरादा रखता था। कस्बापुर में माँ अब केवल इंदिरा ही के कारण पड़ी थी। पहले उसकी टीचरी के कारण और फिर अब उसकी बीमारी के कारण। वरना पिछले वर्ष से मैं लखनऊ के एक निजी स्कूल में पढ़ा रहा था। जहाँ कस्बापुर के अपने और इंदिरा से साझे रहे पुराने स्कूल की तुलना में मुझे डेवढ़ी तनख़्वाह मिल रही थी। 

हाँ, यह ज़रूर था कि कस्बापुर में मेरा आना-जाना बराबर लगा रहता। सप्ताह के बीच में एक से ज़्यादा आने वाली छुट्टी पर या फिर सप्ताह के अंत में आने वाली आधी और एक छुट्टी में कस्बापुर जाना मेरे लिए अनिवार्य रहता। 

♦ ♦

“कैसी हो?” उस शनिवार भी मैं कस्बापुर गया रहा था। और घर में क़दम रखते ही इंदिरा के पास पहुँच लिया था। 

अढ़ाई कमरों के उस मकान में जून के उन दिनों इंदिरा को हम ने उसकी पसंद का पिछला कमरा दे रखा था। जिस की दोनों खिड़कियाँ उस के आग्रह पर आठों पहर खुली रहतीं। 

“यह देखना,” अपने तकिए के नीचे से उस ने एक पुराना अख़बार मेेरी ओर बढ़ाया, “मेरी कमज़ोरी जा नहीं रही। शायद यहाँ का इलाज मुझे फल जाए . . .” 

बरतन चौका करने वाली हमारी महरिन का पति घर-ब-घर अख़बार लगाने का काम भी हाथ में लिए था। अपने पढ़ने के लिए इंदिरा उस से पुराने अख़बार अक्सर मँगा लिया करती। 

अख़बार के उस पृष्ठ पर एक कैंसर सोसाइटी कैंसर के उपचार का दावा कर रही थी। 

जीवन के प्रति इंदिरा की ढिठाई और ललक मेरे लिए गहरे अचरज का विषय थी। अपनी बीमारी के उस संकटपूर्ण व अंतिम चरण में भी इंदिरा महरिन की सहायता ले कर अपने दाँत रोज़ साफ़ करती थी। अपने कपड़े रोज़ बदलती थी। तेज़ी से लुप्त हो रहे अपने बाल रोज़ बनाती थी। अपने लिए अलग से फल और दूध रोज़ मँगवाती थी। 

अपनी झक के लिए पिछले दो महीनों से अपनी उस रोग-शय्या पर परिरुद्ध इंदिरा मुझ से हर महीने के दूसरे शनिवार के शनिवार दो हज़ार रुपए लेती रही थी जिसका हिसाब मैंने उससे कभी नहीं माँगा था। माँ को यक़ीन था उन दो हज़ार में से पाँच सौ रुपया वह महरिन को आँख मूँद कर पकड़ा दिया करती थी। उसकी तयशुदा तनख़्वाह के इलावा। 

“लखनऊ पहुँचते ही मैं इन लोगों को पत्र भेजूँगा,” अख़बार समेट कर मैंने इंदिरा को लौटा दिया। 

“मेरे इलाज के लिए मेरा प्रोविडेंट फ़ंड काम आ सकता है,” इंदिरा ने कहा। 

इंदिरा की अस्वस्थता का हवाला देकर मैंने उसकी टीचरी से उसे त्यागपत्र दिलवा दिया था। और उसकी भविष्य-निधि की समग्र व सामयिक रक़म भी निकलवा ली थी: छब्बीस हज़ार तीन सौ तैंतीस रुपए। 

“वही अकेेली रक़म क्यों?” मैं झेंप गया, “तुम्हारे इलाज के लिए जितनी भी रक़म चाहिए होगी, किसी भी तरह मैं उपाय निकाल लूँगा।” 

हालाँकि तीन महीने पहले मिली उस रक़म को अलग से स्थिर रखने की बजाए मैंने उसे अपने और इंदिरा के साझे खाते में डाल दिया था। और तभी से जहाँ कहीं भी जो कुछ भी ख़र्च होता रहा था मैंने वही खाता हिलाया था। 

“मैं जानती हूँ,” इंदिरा की आँखों में आँसू उतर आए, “आप मेरे हितैषी हैं . . .” 

♦ ♦

“कोई और चिट्ठी आई क्या?” अवसर मिलते ही माँ ने मुझे घेर लिया। 

माँ को भी मेरे समान नवेेली की जल्दी थी। 

“आई तो है,” मैं मुस्कराया, “उधर लखनऊ में नौकरी करती है। ग्यारह हज़ार माहवार पाती है। साथ ही उस ने अपनी फोटो भी भेजी है।” 

“फोटो दिखाओ,” माँ उत्सुक हो आई। 

फोटो मेरी जेब ही में थी। झट से मैंने उसे जेब से निकाला और माँ के हाथ में धर दी। 

“सुंदर है,” माँ हँसी, “सर्वांग सुंदरी . . .” 

“मगर है तलाक़शुदा। और फिर शादी की उसे जल्दी भी है। चार साल के अपने बेटे को वह जल्दी से जल्दी एक पिता देना चाहती है . . .” 

“कोई हर्ज नहीं,” माँ ने कहा, “बल्कि अपनी दूसरी शादी सफल बनाए रखने के लिए वह कोई कसर नहीं छोड़ेगी . . .” 

इंदिरा के संग माँ का अनुभव विशेष सुखद न रहा था। न उस ने कभी माँ के चरण ही स्पर्श किए थे। न माँ के कहने पर कोई व्रत या उपवास ही रखा था। न ही कभी माँ की निजी मूर्तियों की पूजा-अर्चना की थी। 

वास्तव में नौकरी में अपने से दो वर्ष ज्येष्ठ और आयु में अपने बराबर की इंदिरा से अपनी शादी के लिए मैं कस्बापुर के हमारे उस साझे स्कूल के नव-नियुक्त प्रधानाध्यापक को श्रेय देता हूँ। जिसने इंदिरा के प्रति जब निरंकुश उच्छृंखलता प्रदर्शित की थी तो इंदिरा का उत्तरकारी संयम व गांभीर्य मुझे भा गया था। तीन वर्ष पूर्व। फिर उस के संग शादी रचाने में मैंने तनिक समय न गँवाया था। बिना जाने कि उसका स्वास्थ्य उसके साथ ज़्यादा नहीं चलने वाला। 

“लेकिन इंदिरा?” मेरी बेआरामी मेरी ज़ुबान पर चली आई, “उस से कैसे छुटकारा पाया जाए?” 

“मेरे पास एक तरकीब है,” अपना चेहरा माँ ने मेरे कान के साथ ला सटाया, “किसी ताल-तलैया से तुम मुझे ज़हरीले बलूत के पौधे की डंडी या फिर बिच्छू पौधे की पत्ती छाँटकर कर ला दे। और ध्यान रहे उन की डंडी पर हमेशा तीन ही पत्ती उगा करती है। न ज़्यादा, न कम। हमारे काम को कारगर बनाने में उनका मीठा ज़हर कामदार होगा . . .” 

“देखता हूँ,” एक कँपकँपी मुझे सिर से पाँव तक सिहरा गई। 

♦ ♦

अगली सुबह मेरी नींद देर से टूटी। ग्यारह बजे। 

कस्बापुर आकर मैं देर तक सोया करता। अविरत। जब से इंदिरा की बीमारी हम पर प्रकट हुई थी, मैं अलग कमरे में सोने लगा था। 

जगते ही मैं सीधे माँ के पास गया। रसोई में वह मेरी पसंद का हलवा बना रही थीं। 

“उसे कुछ दिया क्या?” पिछली शाम तीन पत्ती वाली दो डंडियाँ लाने में मैं सफल रहा था। विषधानी। 

“तुम्हारे जाने के बाद शुरू करूँगी। अभी नहीं। किसी को शक क्यों हो?” 

♦ ♦

इंदिरा के पास मैं प्रकृतिस्थ होने के उपरांत ही गया। 

“कल रात मैंने एक अजीब सपना देखा,” इंदिरा की बीमारी के साथ उस के सपनों की विचित्रता में भी वृद्धि हुई थी। उस के सपनों में सब से ज़्यादा संख्या रेल यात्राओं की रहती जिन में छुटपुट रेलयात्री उसे रेल पाखानों में जाने से रोकते और वह मलत्याग अथवा वमन खुलेआम करने पर मजबूर रहती। 

“तुम और तुम्हारे ऊल-जलूल सपने,” मैं हँसने लगा। 

“सपना बहुत लंबा और सजीव था,” अपनी बातूनी आवाज़ में इंदिरा शुरू हो ली, “सुभाष से तलाक़ ले चुकी मेरी वह भाभी हमारे पुराने बिस्तर पर लेटी है और उस का बेटा तुम्हें पापा कह रहा है . . .” 

“तुम्हारा भतीजा?” मैं चौंका। 

तस्वीर वाली वह लड़की कहीं इंदिरा की वही भाभी तो नहीं? 

अपने परिवारजन के बारे में इंदिरा मेरे संग बहुत कम बात करती रही थी और वह भी कभी-कभार। मौक़ा आने पर। ज़्यादा से ज़्यादा यदि किसी के बारे में कुछ बताती भी रही तो अपनी मृतक माँ के बारे में जिसकी मृत्यु इंदिरा वाले ब्लड कैंसर से हुई थी। लगभग दस वर्ष पूर्व। जब इंदिरा बीस वर्ष की थी और अपनी बी.ए. की तैयारी कर रही थी। अन्य परिवार जन के बारे भी मैं बस यही जानता था, गठिया-ग्रस्त उसके पिता एक सरकारी स्कूल अध्यापक रहे थे और अपनी सेवा-निवृत्ति के बाद अब अपने बड़े भाई व उसके परिवार के साथ बस्तीपुर में अपने पैतृक निवास पर रहते थे। बस्तीपुर से बाहर कानपुर-वासी उसका बड़ा भाई, अशोक, कपड़ों की दुकान करता था और छोटा, सुभाष, इलाहाबाद के एक रेस्टोरेंट में सुपरवाइज़र था। इंदिरा की वह छोटी भाभी मेरी लिए नितांत अजनबी थी। भाइयों के पास इंदिरा का आना-जाना न के बराबर रहा था। 

“हाँ, मेरा वह भतीजा मेरी उस भाभी ने सुभाष को लौटाया ही नहीं। तलाक़ के लिए उस ने यही एक शर्त रखी थी सुभाष को उस बेटे पर अपने वैध अधिकार त्यागने होंगे। और सुभाष मान गया था . . .” 

“मगर तलाक़ ज़रूरी था क्या?” 

“हाँ। सुभाष का मन उससे रमा नहीं। वह बहुत चंचल थी और सुभाष गंभीर स्वभाव का है . . .” 

मुझे ध्यान आया गंभीर तो मैं भी हूँ। चंचल स्त्रियाँ मुझे भी ख़ासी नापसंद हैं। विशेषकर पत्नी के रूप में। 

“उसकी उम्र अब कितनी होनी चाहिए?” 

“किस की?” 

“तुम्हारे भतीजे की?” 

“यही कोई चार साल। दुध-मुँहा बच्चा था बेचारा जब उस घर-फोड़ ने सुभाष से अपना मुँह मोड़ लिया था। प्रसूति के बहाने मायके गई और फिर बस लौटी ही नहीं . . .” 

“वह ख़ुद देखने में कैसी थी?” मैं थर्रा उठा। कहीं वह बारीक़ माथे, नुकीली ठुड्डी और ऊँचे गाल लिए मेरी जेब की तस्वीर वाली निकल आई तो? 

“मुझे उस का चेहरा तो ठीक से याद नहीं लेकिन उस का ध्यान आते ही दंतार जैसे उसके दाँत मेरे सामने आ खड़े होते हैं। अपने दाँतों तले अपने होंठ दबाने की उसे बुरी आदत थी . . .”

 तस्वीर वाली लड़की के दाँत उस तस्वीर में न थे।

हड़बड़ा कर मैंने अपनी जेब से वह तस्वीर निकाली और इंदिरा के सम्मुख प्रकट कर दी, “देखो। इसे देखो। क्या वह यही तो नहीं?” 

“यह चेहरा लंबूतरा है,” इंदिरा ने अपनी आँखें तस्वीर में गड़ा दीं, “नहीं, उस का चेहरा कुछ अलग रहा। मगर यह कौन है? यह तस्वीर आप के पास कैसे आई? कहाँ से आई?” 

“मेरे एक मित्र ने मुझे दी है,” मेरी थरथराहट तेज़ हो ली। उलझाई हुई इंदिरा किस उलझन से कमतर रही? बाल की खाल उतारना कोई उस से सीखता! 

“आप के मित्र ने?” 

“हाँ . . .” 

“मगर क्यों?” 

उपयुक्त उत्तर मैं अभी खोज ही रहा था कि इंदिरा अधीर हो उठी। 

“आप क्या शादी करेंगे? दोबारा?” पिछली शाम हुई हम माँ-बेटे की बातचीत उस के कान पकड़ चुके थे क्या? 

“तुम्हारे जीते जी?” अकस्मात्‌ ही मैं फिसल गया। 

इंदिरा रोने लगी। बेतहाशा। 

“माँ,” मैं चिल्लाया, “देखो। इधर आओ . . .” 

माँ के सामने इंदिरा सदैव संयत रहा करती। कभी आँसू न गिराती। 

“क्या हुआ?” माँ तत्काल चली आई। 

“मैं बस्तीपुर जाऊँगी,” इंदिरा के आँसू थम गए, “मेरे लिए टैक्सी कर दीजिए . . .बिल्कुल अभी . . .” 

“तुम कहीं नहीं जाओगी,” मैंने उस के कंधे पर अपना हाथ जा टिकाया। 

“बाँट में आप मेरा प्रोविडेंट फ़ंड रख लीजिए . . .समूचे का समूचा . . .मगर मैं इधर न मरूँगी . . .बेगानों, बेरहमों के बीच . . .” 

“अगर इसकी यही मर्ज़ी है तो यही सही,” माँ ने मेरी बाँह पर चिकोटी काटी, “बस्स। अब इससे बहसा-बहसी तो हम करेंगे नहीं . ..” 

टैक्सी पर कस्बापुर से बस्तीपुर की दूरी साढ़े पाँच घंटे की थी। 

“पिछली सीट मुझे चाहिए,” टैक्सी देखते ही इंदिरा ने घोषणा की, “मुझे वहाँ लेटना है . . .” 

“जो तुम चाहो,” मैं अगली सीट पर बैठ लिया। 

 सभी घंटे घनघोर चुप्पी के संग बीते। 

बस्तीपुर हम उसी शाम के छह बजे पहुँच गए। 

टैक्सी का भाड़ा चुकाते ही मैंने अपनी वापसी यात्रा घोषित कर दी, “कस्बापुर रेलगाड़ी से लौटना मेरे लिए सही बैठेगा . . .” 

स्तब्ध मुद्रा लिए इंदिरा के पिता व ताऊ व उनके परिवार ही में से किसी एक ने भी न हमें कुछ पूछा, न ही कुछ कहा। 

इंदिरा ने ज़रूर मेरी दिशा में अपना सिर हल्के से हिलाया। 

सूखी आँखों के साथ। 

♦ ♦

इंदिरा की मृत्यु आगामी माह के दूसरे शनिवार के दिन हुई। 

अपनी दूसरी शादी मैंने उसकी मृत्यु के डेढ़ माह उपरांत की। 

तस्वीर वाली उस तलाक़शुदा लड़की से नहीं। 

फीकी, सीठी एक वंशवती कुमारी साध्वी से। उसकी तनख़्वाह ज़रूर मुझ से आधी थी मगर माँ के प्रति उसकी आज्ञाकारिता बहुविध व बहुगुण रही। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कहानी
रचना समीक्षा
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में