दुलारा
दीपक शर्माप्री-नर्सरी का यह स्कूल इस वर्ष अपनी रजत-जयन्ती मनाने जा रहा है और हम ने ’निम्मो’ के नाम पर एक विशष पुरस्कार रखा है। सब से ज़्यादा चुस्त और कर्मठ बच्चे के लिए।
यह स्कूल हम पति-पत्नी एक साथ चलाते हैं। वह स्कूल के मैनेजर हैं और मैं प्रिंसीपल।
निम्मो को हमारे पास हमारा पुराना नौकर लाया था, “मेरी यह बेटी बेठौर हो गयी है। इसके घर वाले ने घर पर दूसरी बिठा ली है और इसे निकाल बाहर किया है। इसे आप आया रख लीजिए।”
अपनी पहली तनख़्वाह लेते समय वह हाथ जोड़ कर खड़ी रही, “हमारे मुन्ने को आप अपने स्कूल में पढ़ लेने दो। खेल लेने दो।”
“तुम जानती हो यहाँ एक बच्चे से हम कितनी फ़ीस लिया करते हैं?” मैं हँस पड़ी थी।
“जानते हैं। और इसीलिए हम आप का घरेलू काम करने को तैयार हैं। चौका-बरतन, झाड़-पोंछ, कपड़ा-सब देखेंगी।”
मैं मान गयी थी और उसके बेटे को अपने स्कूल में दाख़िला दे दिया था।
लेकिन जैसे ही उसके बेटे ने हमारे स्कूल के दो साल ख़त्म किए थे, उसकी दूसरी विनती तैयार हो ली थी, “हमारे बेटे का एडमिशन भैया लोग के स्कूल में करवा दीजिए। हम जानती हैं वहाँ के बच्चों के माता-पिता का अँग्रेज़ी जानना बहुत ज़रूरी होता है मगर आप लोग सिफ़ारिश कर देंगे तो उनसे न कहते नहीं बनेगा। फ़ीस मैं सब दे दूँगी। किताबें और वरदी आप लोग से माँग लूँगी। अपने बेटे को डॉक्टर बनाने की हमारी बड़ी तमन्ना है . . .”
उस समय तक निम्मो की उपयोगिता तथा कार्य-कुशलता हमारे दिलों में कुछ इस तरह से घर कर चुकी थी कि हमने उसकी यह विनती भी मान ली।
फिर दो-ढाई साल और बीते होंगे कि उसकी नयी माँग तैयार हो गयी।
“हमारे मुहल्ले का माहौल ठीक नहीं। लड़के को वहाँ पढ़ने में बड़ी मुश्किल हो रही है। सोचती हूँ आपके चिड़ियाखाने के एक कोने में हम दोनों भी पड़े रहेंगे . . .”
संयोग से उन दिनों हमारी कई चिड़ियाँ मर गयी थीं और दूसरे बाज़ार से जो दाना-दुनका हम उनके लिए लाया करते थे वह अब दिन प्रतिदिन महँगा पड़ता जा रहा था और हम नयी चिड़ियाँ पालने के लिए तैयार न थे।
वहाँ आते ही निम्मो ने अपना काम चौगुना बढ़ा लिया। वहीं पिछवाड़े रही ख़ाली ज़मीन के एक टुकड़े को बग़ीचे में बदल डाला। हमारे डोबरमैन, रौजर, की सेवा-टहल शुरू कर दी।
लेकिन वह तस्वीर का एक रुख़ था। दूसरी तरफ़ बेआरामी शुरू हो गयी थी।
उसके बेटे के कारण।
लड़का बहुत अजीब था। हमारे प्रति निम्मो जिस अनुपात से अपना दास-भाव जताया करती उसी अनुपात में लड़का अपनी बेरुख़ी। हमारे बाग़ीचे को ले कर, चिड़ियों को ले कर, रौजर को ले कर उसके अंदर कोई कौतूहल कोई उत्साह न था। हमारे बेटे रौजर के संग खेलते-कूदते मगर वह उनकी तरफ़ देखता भी नहीं। उनकी बात तो एक तरफ़ वह हम पति-पत्नी को भी देख कर अनदेखा कर देता। और तो और यदि हममें से कोई उसे आवाज़ भी देता तो वह उसे अनसुनी कर जाता गुमसुम बना रहता।
फिर लड़का जब और बड़ा हुआ तो चिड़ियाखाने की दिशा से ऊधम की आवाज़ें हम तक पहुँचने लगीं। कारण निम्मो ने बताया।
कस्बापुर का अँगरेज़ी स्कूल पाँचवीं तक ही था और इसी कारण हमने अपने दोनों बेटों को वहाँ पाँचवीं जमात ख़त्म होते ही बाहर के एक नामी पब्लिक स्कूल में भेज दिया था और अब निम्मो का बेटा भी बाहर पढ़ना चाह रहा था।
उसे रास्ता मेरे पति ने सुझाया, “सभी सरकारी प्रतियोगी छात्रवृत्तियों और नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था है। तुम छठी जमात से आवासी छात्रवृत्ति पा सकेते हो यदि तुम मेहनत से पढ़ाई करोगे . . .”
आगामी वर्ष उसकी आवासी छात्रवृत्ति उसे नैनीताल ले गयी। वहीं से उसने अपनी दसवीं जमात में राष्ट्रीय प्रतिभा प्रतियोगिता के अन्तर्गत एक नयी छात्रवृत्ति भी प्राप्त की और फिर अपनी बारहवीं पूरी करते करते सी पी सम टी की परीक्षा भी दे डाली। परीक्षा में वह सफल रहा और लखनऊ के के.जी.एम.यू. में प्रवेश पा गया और फिर सातवें वर्ष वहीं के एक सरकारी अस्पताल में डॉक्टर तैनात हो गया और निम्मो को रुपया भेजने लगा। इस बीच उसकी एक डॉक्टर सहयोगिनी ने उसमें रुचि दिखलायी और उसने अपना विवाह भी रचा लिया। उसके ससुर आईपीएस अधिकारी थे और आईजी के पद पर पहुँचते-पहुँचते अभी तक सात में से अपनी तीन ही बेटियों को पार लगा पाए थे। और अपना दामाद ढूँढ़ते समय लड़के का केवल भविष्य देखते थे, उसका अतीत नहीं।
निम्मो के भाग्य में उनकी चौथी बेटी आयी थी।
बेटे के विवाह की सूचना भी उसे विवाह समारोह के उपरान्त दी गयी थी और उसमें उसे सम्मिलित न करने का कारण बताया गया था: उसकी दोनों आँखों में उतर आया उसका मोतियाबिन्द। रुपए ज़रूर उसको माह पहले से ज़्यादा भेज दिए गए थे। कस्बापुर में उसका बेटा पहले भी बहुत कम आता था किन्तु विवाह के बाद तो एक बार भी न आया। निम्मो के आग्रह के बावजूद। कहता, ”मैं नहीं चाहता मेरी पत्नी या ससुराल में से कोई आपको आप के पुराने मुहल्ले में देखे . . .”
इधर एकाध साल से अपने मोतियाबिन्द के कारण निम्मो ने हमारा काम और चिड़ियाखाना छोड़ रखा था और वह अपने मायके वाले पुराने मुहल्ले में रहने लगी थी।
बहू से मिलने का अवसर निम्मो को मिला बेटे के विवाह के चौथे माह, जब अपनी भतीजी के साथ वह बेटे के सरकारी मकान पर अपने मोतियाबिन्द के ऑपरेशन करवाने के उद्देश्य से उनके पास गयी थी।
अगले ही दिन लौट आने के लिए। बहू बोली थी, “सरदी के मौसम में आँख अच्छी बनती है। तभी आइएगा . . .”
मेरे पास आ पर निम्मो ख़ूब रोई थी और मैं ने उसे दिलासा भी दिया था, “तुम्हारे मोतियाबिन्द का ऑपरेशन हम करवा देंगे। तुम्हें वहाँ जाने की कोई ज़रूरत नहीं। तुम्हारे बेटे को जब तुम्हारी ज़रूरत महसूस होगी वह अपने आप यहाँ आन प्रकट होगा . . .”
मैं नहीं जानती थी उसके चौथे ही दिन उसका आना अनिवार्य हो जाएगाः
निम्मो को मुखाग्नि देने!
निम्मो की मृत्यु का समाचार ले कर उसकी भाभी मेरे पास आयी थी। बताए थीः निम्मो जीजी सुस्त तो तभी से थी जब से बेटे के पास से लौटी थी। न खाने में मन। न बतियाने में मन। कल रात बोली, मुझे गरमी बहुत लग रही है, मेरी चारपाई छत पर डलवा दो। हम लोग सोचे, क्या हर्ज है, अगल-बगल लड़कियों को सुला दिया जाएगा। बीच रात कहीं जाएगी भी तो उन्हें साथ ले लेगी। लेकिन नहीं। रात में तीसरे पहर पानी पीने के लिए अकेली उठी है। सुराही से गिलास भी जरूर भरी है क्योंकि छत से गिलास के गिरने की आवाज पहले आई है और उसके धब-धब की बाद में . . .”
लड़का अकेला आया था। पानी के बग़ैर।
संध्या गहराते ही हमारे बँगले पर चला आया, “क्या मैं आज की रात आप के चिड़ियाखाने में गुज़ार सकता हूँ?”
“मगर क्यों?” मेरे पति चौंक लिए, ”वहाँ बहुत गरमी होगी। न वहाँ कोई एसी है। न कूलर। न बिस्तर। न चारपाई। आप एक सरकारी डॉक्टर हो किसी भी सरकारी गेस्ट हाउस में जगह पा सकते हो . . .”
“जब अम्मा मुझे वहाँ लायी थीं तब भी वहाँ न एसी था, न कूलर। न बिस्तर, न चारपाई,” वह रोओना हो चला।
”मगर तब तुम्हारी अम्मा तुम्हारे पास थी। भरी-पूरी अपनी मेहनत, अपनी लगन के साथ। तीखी साध लिए, तुम्हें आगे पढ़ाने की। डॉक्टर बनाने की!” मैं ने कहा।
”जो मेरे अन्दर ग़ुस्सा जमा करती रहती थी,” हमारे सम्मुख अपने को खुल कर सामने लाने का यह उसका पहला प्रयास था।
“श्रद्धा क्यों नहीं? कृतज्ञता क्यों नहीं? उमंग क्यों नहीं?” मेरे पति भी मेरे संग हैरान हुए।
“क्योंकि मेरी पढ़ाई को ले कर वह मेरे साथ बहुत सख़्ती करती थीं। मुझे पीट भी देती थीं। जो भी उन के हाथ में होता या बग़ल में, मुझ पर बरसाने लगती। झाड़ू हो बेलन हो, चप्पल हो, बग़ीचे ही से चुनी हुई कोई लकड़ी हो-कुछ भी—वह पिटाई तो मेरी हड्डियों में आज भी ज़िन्दा है . . .।”
“यह समय पुरानी उस पिटाई को रोने का नहीं,” मैं अकुलायी, “निम्मो के हौसले की दाद देने का है। निस्सहाय थी वह लेकिन लाचारी उसने कभी नहीं दिखायी। तुम्हारे लिए अच्छे स्कूल जुटाए नर साधन जुटाए। अपनी भूख-प्यास नींद-आराम सब न्योछावर कर दिया . . .”
“जभी तो आज रात मैं उस चिड़ियाखाने में गुज़ारना चाहता हूँ जिस की हवा में अम्मा ने मेरे साथ भी कई साँस खींचे और मेरे बग़ैर भी। वे साँस आज भी वहीं ठहरे मिलेंगे मुझे . . .” लड़का भावुक हो उठा।
“तुम्हारे सोने का प्रबन्ध वहाँ कर दिया जाएगा,” मैं ने कहा, “टेबल-फैन और बिस्तर भी लग जाएगा। मगर वहाँ जाना तो विचार भी करना निम्मो के जीवनकाल में तुम्हें उस चिड़ियाखाने का ध्यान क्यों नहीं आया?”
“सच कहूँ तो भोक्तावाद मेरी इस नयी दुनिया के सामने अम्मा की उपस्थिति मुझ में हीन-भाव उत्पन्न करती थी। मटमैली उनकी आकृति . . . बेढब उनके कपड़े . . . लोकाचार के प्रति उनकी अनभिज्ञता . . . सब मुझे बेचैन कर जाते थे . . .”
“ऐसा होता है,” मेरे पति बोले, “दिखावट की अपनी उस नयी दुनिया में बेहतर सामाजिक स्थिति पाने के बाद बहुत से युवक उस सीढ़ी को परे सरका दिया करते हैं जिस के सहारे वे ऊपर पहुँचे हैं।”
“जो दुर्भाग्यपूर्ण है,” मैं ने जोड़ा। लज्जित हो कर लड़के ने अपनी आँखें नीची कर लीं।
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