काज-प्रयोजन
दीपक शर्मा
यह उन दिनों की बात है जब मोबाइल फोन प्रयोग में नहीं आए थे। सन् उन्नीस सौ अठासी की।
“मैं कस्बापुर से बोल रहा हूँ,” टेलिफोन के दूसरे सिरे से आवाज़ आई, “आप के साथ वाले घर में एक महेंद्रनाथ रहते हैं। उन का फोन ख़राब लगता है। उनके लिए एक बुरी ख़बर है।”
“हाँ, हाँ, कहिए,” महेंद्र के घर पर जब कोई पार्टी होती है तो वह अपने फोन को चोंगे से अलग कर देता है, “मैं उनकी पड़ोसिन बोल रही हूँ, मधु त्रिपाठी।”
“मैं उनकी पत्नी का भाई हूँ। माँ गुज़र गई हैं। कांता को जल्दी ही कस्बापुर पहुँच जाना चाहिए। सुबह अंत्येष्टि है।”
“कृपया मेरी सहानुभूति स्वीकार करें,” मैंने कहा, “कांता से मैं अभी बात करती हूँ।”
अगले ही पल मैं अगले दरवाज़े पर जा पहुँची।
“नैपकिन्ज़ लगा कर केय अभी नहाने गई है,” महेंद्र अपने खाने के कमरे का निरीक्षण कर रहा था, “आप के ग्लासेस मुझे बहुत पसंद आए, मै'म। सोचता हूँ, इस बार . . .”
“आप के लिए एक शोक-सूचना थी। केय की माँ नहीं रहीं।”
कांता का उल्लेख हम सभी ‘केय’ नाम ही से किया करते। महेंद्र का अनुकरण करते हुए। उसके अनुसार ‘कांता’ नाम एक क़स्बे निवासी होने का प्रमाण देता है, जब कि ‘केय’ नाम आधुनिक होने का।
“इधर नहीं,” महेंद्र तत्काल बाहर वाले बरामदे में लपक लिया, “केय विचलित हो गई तो मेरी पार्टी जोखिम में पड़ जाएगी। मेरे मेहमानों का मज़ा किरकिरा हो जाएगा। ले-दे कर तीन-चार घंटों का ही तो अंतर पड़ेगा। जैसे ही मेहमान जाएँगे आप केय को बतला दीजिएगा। मगर यह न कहिएगा कि मैं पहले जान चुका था।”
“सोच लो,” आए.ए.एस. में मैं महेंद्र से दो साल पहले आई थी।
“मेरा आप से निवेदन है, मै’म,” महेंद्र कारुणिक हो चला, “आप इस सूचना को अभी दबा ही लीजिए। तिवारी मेरे बौस हैं और पहली बार मेरी पार्टी में आ रहे हैं। उन्हें मैं ख़ुशनुमा माहौल देना चाहता हूँ . . .”
♦ ♦
अपनी जो मोरपंखी साड़ी मैंने पार्टी के लिए इस्त्री कर रखी थी, उसे महेंद्र के घर से लौटने पर मैंने वापस अपनी आलमारी में रख दी।
बाहर निकाली काले मोर लिए सफ़ेद हैंडलूम साड़ी।
“तुम्हें देख कर अच्छा लग रहा है,” तैयार हो कर महेंद्र के घर की ओर अपने क़दम मैंने बढ़ाए ही थे कि अपनी पत्नी के साथ तिवारी मुझे वहीं जाते हुए मिला।
“मुझे भी, सर,” मैंने कहा। सर्विस में वह मुझ से एक साल सीनियर है।
“यह केय है, मेरी पत्नी, सर,” तिवारी से महेंद्र ने वहाँ पहले से बैठे मेहमानों का औपचारिक परिचय करवाया, “मेरे बैचमेट गिरीश टंडन और उनकी पत्नी आभा, मेरी बैचमेट इंदु और उसके इन्कम-टैक्स कमिश्नर पति, विनोद और यह मेरे बौस मिस्टर तिवारी और उनकी मै’म।”
“आप क्या लेंगे, सर,” महेंद्र ने तिवारी से पूछा, “औरंज जूस या ऐपल जूस?”
“तुम लोग क्या ले रहे हो?” तिवारी की गर्दन ने एक लहरदार बल भरा।
“हम औरंज ले रहे हैं, सर,” टंडन ने खीसें निपोरीं।
“नींबू सोडा मिलेगा?” तिवारी ने अपनी रोबीली आवाज़ में पूछा।
“क्यों नहीं, सर?” महेंद्र तत्क्षण खाने वाले कमरे में चला गया।
“और आप के लिए, मैम?” कांता ने मिसेज़ तिवारी के संग सत्कारिणी की भूमिका ग्रहण की।
“मैं ऐपल ले लूँगी,” मिसेज़ तिवारी को भी अपने को दूसरों से ऊपर रखने का अच्छा अभ्यास रहा।
“मैं अभी लाती हूँ,” कांता उठ खड़ी हुई।
“मूर्ख ने ड्रिंक्स का इंतज़ाम नहीं किया,” महेंद्र और कांता को एकसाथ अनुपस्थित देख कर तिवारी ने टंडन की ओर आँख मिचकाई।
“ना,” टंडन भी कनखियाया, “नो स्कौच्च, नो बियर, नौट ईवन वाइन . . .”
“यह बताओ, आभा,” तिवारी टंडन की पत्नी की ओर मुड़ा, “यह केय क्या एंग्लोइंडियन है?”
“एंग्लोइंडियन क्या उस जैसी अंग्रेज़ी बोलते हैं?” टंडन की पत्नी ने हँसी छोड़ी।
“आभा, ठीक बात बोलो,” टंडन ने पत्नी को त्यौरी दिखाई, “जैसी तुम्हारी अंग्रेज़ी, वैसी केय की अंग्रेज़ी।”
“नाम तो उस का कांता है,” टंडन की पत्नी तनिक न झेंपी—अपनी अंग्रेज़ी पर वह ख़ूब भरोसा रखती थी—“मगर नहीं। यह महेंद्र महाशय अँग्रेज़ों की नक़ल करेंगे।”
“लीजिए, सर,” महेंद्र तभी तिवारी के लिए नींबू सोडे के साथ बैठक में लौट आया।
“कुछ खाने के लिए भी लीजिए,” पीछे-पीछे खाने का सामान व ऐपल जूस लिए कांता का नौकर उसके साथ बैठक में दाख़िल हुआ।
चिकन और पनीर के टिक्कों को कांता ने टुथपिक की सहायता से छोटे निवालों में बदल दिया था।
“यह तो सरासर अन्याय है, केय,” टंडन ने कांता के साथ चुहल की, “हम यहाँ पूरे पंद्रह मिनट बैठे रहे मगर तुम ने ये टिक्के हमारे सामने नहीं रखे . . .”
“आएँगे, आप के पास भी आएँगे,” कांता ने अपने गालों के गड्ढे उजागर किए।
“कल सचिव स्तर की एक बैठक में मुझे चीफ़ मिले थे,” तिवारी ने अपनी वरिष्ठता की धाक जमाई, “दिल्ली से वापस आने वाले लोगों को एडजस्ट करने की बात हो रही है। कुछ बदलियाँ अब और होंगी . . .”
“मुझे मत खिसकाइएगा, सर,” महेंद्र ने चिरौरी की, “मैं यहाँ ख़ूब ख़ुश हूँ . . .”
“आप कब तक दिल्ली जाएँगे, सर?” टंडन ने पूछा।
“अभी मेरा कूलिंग आव पीरियड चल रहा है,” तिवारी लखनऊ आने से पहले पाँच साल टोक्यो में लगा चुका था, “पाँच साल पूरे होने में अभी डेढ़ साल बाक़ी है . . .”
“मैं ख़ुद दिल्ली जाना चाहती हूँ, सर,” इंदु ने कहा, “विनोद को भी वहाँ ज़्यादा सहूलियत रहेगी।”
“आप यह और लीजिए,” कांता ने चिकन टिक्के की प्लेट तीसरी बार तिवारी के सामने रखी।
“सौरी फ़ौर टौकिंग शौपिंग,” तिवारी ने इंदु की ओर उपेक्षा दिखाई, “मूर्खतावश इन टिक्कों का मज़ा लेने की बजाय दफ़्तर इधर ले आए हैं। भई, ये तो बहुत ही उम्दा बने हैं। इस बार हमने कोई पार्टी रखी तो महेंद्र के नौकर को अपने यहाँ बुलवाना पड़ेगा।”
“ज़रूर, सर, ज़रूर,” महेंद्र उल्लसित हुआ, “केय ने उसे बहुत अच्छा सिखा रखा है।”
“हमारे यहाँ सिखाने वाली को ख़ुद बहुत सीखने की ज़रूरत है,” तिवारी पत्नी को काटने दौड़ा।
“हाँ, इन्हें यही शिकायत उधर टोक्यो में भी रही,” मिसेज़ तिवारी ने अपनी सफ़ाई पेश की, “चूँकि मांसाहारी चीज़ों से मुझे सख़्त परहेज़ है। उधर टोक्यो में भी जब हम पार्टी देते थे तो मांसाहारी सारा सामान बाहर ही से मँगाया जाता था और बाहर ही बाँट दिया जाता था। मजाल जो एक भी मांसाहारी चीज़ मेरी रसोई में दाख़िल हो . . .”
“हाँ, इसलिए क्यों कि मेरी पत्नी अपनी जाति-हित के सामने पति की रुचि को क्षुद्र मानती है . . .”
“नहीं, सर,” महेंद्र ने कहा, “आप हमें बताइएगा, सर। जब भी चाहिए हों, आप को चिकन टिक्का हम अपनी रसोई में बनवा कर आप को भिजवा दिया करेंगे . . .”
“आप ने नौकर भेजने की बात कही थी, सर,” महेंद्र को मात देने के इरादे से टंडन ने तिवारी का ध्यान अपनी ओर लाना चाहा, “तो नौकर का एक क़िस्सा याद आ गया। एक नौसिखिए नौकर को पहली बार एक बड़े भोज पर खाना परोसने का अवसर मिला। अपनी पूरी ज़िंदगी में उसने ऐसी स्त्रियाँ नहीं देखी थीं, सर से पाँव तक चिकनी और चमकीली। स्त्रियाँ खातीं कम और आपस में फुसफुसातीं ज़्यादा। उनके निकट जाकर उसने उनकी फुसफुसाहटें अपनी श्रवण-सीमा में लाने की कई चेष्टाएँ कीं, मगर वह हर बार असफल रहा। अपनी जिज्ञासा दबानी जब उसके लिए असंभव हो गई तो वह एक बूढ़े नौकर के पास पहुँच लिया, ‘ये महिलाएँ हमसे क्या छिपाना चाहती हैं? इनके पास जब भी हम में से कोई पहुँचता है तो ये फ़ौरन बोलना बंद कर देती हैं। किसके बारे में यह इतना छिपाव बरत रहीं हैं?’ अब बूझिए, सर, उस बूढ़े अनुभवी नौकर ने उस नौसिखिए से जवाब में क्या कहा, ‘हमारी, मूर्ख, हमारी!’”
सभी के साथ कांता ने भी टंडन की हँसी का पीछा किया।
मगर मैंने नहीं।
“अचरज है, सर, घोर अचरज,” महेंद्र ने अपनी हँसी सब से पहले वापस ली, “हमारी पत्नियाँ नीरस इन नौकरों में कैसे अपने लिए दिलचस्पी का सामान खोज निकालतीं हैं?”
“एक बात और समझने की है,” तिवारी ने अपनी अक्लमंदी बघारी, “सभी पत्नियाँ निष्ठुरता की सीमा तक अपने नौकरों के साथ बेलिहाज़ी क्यों बरतती हैं . . .”
“लेकिन कमाल देखिए,” मिसेज़ तिवारी ने ताना कसा, “सभी पति अपने नौकरों व दूसरों की पत्निओं के साथ बेजोड़ उदारता दिखाते हैं . . .”
“खाना कब लगवा रहे हो, महेंद्र?” मैंने पूछा।
मैं बुरी तरह थक रही थी।
“हाँ भई, खाना लगवा दो, केय,” तिवारी ने कांता की ओर देखा, “अब और नींबू सोडा नहीं . . .”
“मैं अभी सूप भिजवाती हूँ,” कांता तुरंत अन्दर चली गई।
♦ ♦
“दावत बिछी है,” खाने के कमरे में क़दम रखते ही तिवारी ने ज़ोर से सीटी बजाई।
मेज़ वाक़ई अच्छी बिछी थी।
बाएँ कोने पर बारह खंडों में तराशी गई तीन मुर्गियों के संग-संग दो समूची मछलियाँ सजी थीं। दाएँ कोने में रखे थे पनीर कोफ़्ते, काबुली चने और भरवां परवल।
मेज़ के बीचों-बीच मेयोनीज़ सौस में उछाली गई नानाविध सब्ज़ियाँ सलाद का काम दे रहीं थीं: पहाड़ी मिर्च, फ़्रैचबीन, गाजर और काहू की पत्ती।
सलाद के एक तरफ़ लगे थे मटर वाले बासमती चावल और दूसरी तरफ़ दही-बड़े।
“लीजिए,” कांता ने सब से पहले तिवारी को नैपकिन के साथ प्लेट थमाई।
“शुरू कीजिए, सर,” महेंद्र ने मुर्ग़ी की तश्तरी की ओर संकेत किया।
“अपनी पार्टी के लिए अब मैं केय पर आश्रित रहूँगा,” तिवारी ने महेंद्र की पीठ पर एक हल्का धौल जमाया, “तुम सुन रही हो न, केय? खाने के मामले में तुम ने मुझे आज क़ायल कर दिया . . .”
“मैं कैसे मान लूँ आप मेरा मन रखने के लिए ऐसा नहीं कह रहे?” कांता खिलखिलाई, “खाकर दिखाइए तो मानूँ।”
“पत्नी हो तो ऐसी,” तिवारी ने अपनी पत्नी को खिझाया, “ख़ुश करने के लिए तत्पर . . .”
“हम स्त्रियाँ बैठक में क्यों नहीं बैठ लेतीं?” मिसेज़ तिवारी ने मेरी ओर देखा।
“क्यों नहीं?” मैंने हामी भरी।
मांसाहारी भोजन की मैं ख़ासी शौक़ीन हूँ किन्तु उस दिन अपनी प्लेट में मैं एक चम्मच चावल के अतिरिक्त कुछ और न ले पायी।
मिसेज़ तिवारी ने भी दिखाने भर को अपनी प्लेट में एक दही-बड़ा लिया और मेरे साथ बैठक में चली आई।
खाने के साथ पूरा न्याय किया टंडन की पत्नी और इंदु ने।
हमारे साथ बैठक में शामिल हुईं, तो दोनों की प्लेटें अपनी अधिकतम समाई तक भरी रहीं।
“मैं बहुत दिनों से सोचती रही हूँ, मैम,” इंदु मेरे समीप बैठ गई, “आप से मिलूँगी। मगर दफ़्तर की क़वायद कमबख़्त ऐसी है कि . . .”
“हमारी क़वायद क्या कम है?” टंडन की पत्नी ने मिसेज़ तिवारी को अपने पक्ष में रखना चाहा, “पहले घर चमकाओ। तब अपने को सँवारो। फिर किट्टी में जाओ या अपने घर पर किट्टी को जमाओ। इस के बाद खाना खाते ही फल-सब्ज़ी ख़रीदने मार्किट जाओ। मार्किट से आकर फिर अपने को नए सिरे से सजाओ और पति का इंतज़ार करो। पति के आने पर किसी जोड़े को मिलने जाओ या किसी जोड़े को अपने घर बुलाओ।”
“पूरी लीजिए,” पूरी भरी एक बड़ी प्लेट ले कर कांता बैठक में चली आई।
“तुम भी खाओ, केय,” टंडन की पत्नी ने एक साथ दो पूरियाँ अपनी प्लेट में रख लीं।
“हाँ, केय,” इंदु ने एक पूरी उठायी।
“आप लीजिए,” कांता मिसेज़ तिवारी के पास दोबारा गई।
“धन्यवाद,” मिसेज़ तिवारी ने कहा, “मैं खा चुकी हूँ।”
“मैं भी खा चुकी हूँ,” मैंने कहा, “मगर तुम अब खाना शुरू करो न!”
“मैं बाद में खाऊँगी,” कांता मुस्कुराई और बाहर चली गई।
“वह महेंद्र तो अव्वल दर्जे का ख़ुशामदी टट्टू है ही,” टंडन की पत्नी ने मिसेज़ तिवारी के कान भरे, “और रही उसकी पत्नी। उसे तो ख़ुशामद विरासत में मिली है। उस का बाप पी.सी.एस. था। महेंद्र का मातहत था। मगर ख़ुशामद के ज़ोर पर महेंद्र को दामाद ले उड़ा . . .”
“महेंद्र कौन तीसमार खां है?” इंदु ज़ोर से हँसी, “उधर अकादमी में इसने एक नहीं, दो नहीं, तीन-तीन लड़कियों के सामने अपने विवाह का प्रस्ताव रखा था, लेकिन एक के बाद एक सभी ने उसे ठुकरा दिया।”
“उन तीन में एक कहीं तुम्हीं तो नहीं थीं?” टंडन की पत्नी ने इंदु को छेड़ा।
“नहीं। मैं विनोद के साथ थी। हमारी शादी मेरे आए.ए.एस. में आने से पहले हो चुकी थी . . .”
“ओह!” मिसेज़ तिवारी ने आह भरी।
“मीठा लीजिए,” मिसेज़ तिवारी और मेरे लिए कांता अनानास का सूफ़ले दो जगह परोस कर ले आई।
“मैं इतना न खा पाऊँगी,” मैंने अपनी अनिच्छा प्रकट की।
“न अच्छा लगे तो प्लेट में छोड़ दीजिएगा,” कांता हँसी और दूसरे मेहमानों के पास फ़ौरन लौट गई।
सूफ़ले इतना नर्म था कि मुँह में रखते ही हलक़ में उतरने लगा।
सूफ़ले की अपनी प्लेट ख़त्म करते समय मैं कुछ पलों के लिए भूल सी गई कांता को एक शोक-सूचना देने का ज़िम्मा मेरा था।
“अनिन्द्य! एकदम अनिन्द्य!!” पान चबा रहे तिवारी ने अन्ततोगत्वा महेंद्र से विदा ली, “बढ़िया, बहुत बढ़िया!”
“धन्यवाद, सर, बहुत-सा धन्यवाद,” तिवारी के आदर में महेंद्र झुक लिया।
“धन्यवाद, मैम,” कांता ने मिसेज़ तिवारी को विदा दी, “आप के आने पर हमें बहुत ख़ुशी हुई।”
“मिलेंगे फिर। जल्दी मिलेंगे,” तिवारी ने महेंद्र की पीठ थपथपाई और अपनी गाड़ी में बैठ लिया। मिसेज़ तिवारी ने भी गाड़ी में अपनी जगह ग्रहण की।
“हम भी चलेंगे, पार्टनर,” तिवारी के ड्राइवर ने जैसे ही अपनी गाड़ी बढ़ाई, टंडन ने महेंद्र से हाथ मिलाकर कहा, “आज की शाम बहुत सफल रही, बहुत अच्छी रही।”
“हमें भी बहुत अच्छा लगा,” कांता ने अपना उत्साह मंद न पड़ने दिया।
“धन्यवाद! आपके साथ बहुत अच्छा समय बीता,” इंदु के पति ने भी महेंद्र की ओर अपना हाथ बढ़ाया। और इंदु के साथ अपनी गाड़ी में सवार हो लिया।
♦ ♦
उनके ओझल होते ही महेंद्र मेरी ओर देख कर खिसियाहट भरे स्वर में बोला, “आप के क़ीमती ग्लासेस की मुझे बहुत चिंता है। बरतनों को सेट में ख़रीदना सच में झंझट मोल लेना है। कमबख़्त एक भी टूट जाए तो सारा सेट ख़राब हो जाता है . . .”
“पार्टी के बाद क़ीमती बरतन मैं भी हमेशा धो-पोंछ कर अपनी आलमारी में टिकाती हूँ,” पार्टी के लिए उधार दिए गए अपने ग्लासेस की ओर हाथ बढ़ाते हुए मैंने कांता के सामने अपनी सेवाएँ प्रस्तुत कीं, “आज ये बरतन तुम्हारे साथ मैं भी धो-पोंछ दूँ?”
“आप परेशान न हों,” कांता डोल गई, “मैं एक भी बरतन टूटने न दूँगी। आप के ग्लासेस तो और भी सँभल कर धोऊँगी . . . ”
“अपने ग्लासेस की मुझे क़तई चिंता नहीं,” मैंने कांता को अपने अंक में ले लिया, “तुम्हारे हिस्से आई आज की तुम्हारी थकान की चिंता है . . .”
“मैं जानती हूँ। मेरी थकान से ज़्यादा आपको किस बात की मुझे बताने की ज़्यादा चिंता है। मगर मैं जानती हूँ। सब जानती हूँ। नहाने के लिए जाने से पहले से जानती हूँ . . .”
“मैं कैसे बताऊँ? मुझे कितना बुरा लग रहा है?” मैंने उसे सान्त्वना देने चाही, “इन बरतनों का ज़िम्मा आज के लिए मुझे दे दो, प्लीज़।”
“नहीं, धन्यवाद,” कांता ने अपने आप को शीघ्र ही सँभाल लिया, “मेहमानों की ज़िम्मेदारी आसानी से निभा ले गई हूँ। बरतनों का काम भी सहज में निपटा लूँगी। अपनी मैरेथन दौड़ बीच में नहीं छोड़ूँगी . . .”
फटे कलेजे के साथ फिर मैं उसी पल अपने घर लौट ली।
♦ ♦
अपने कमरे में पहुँचते ही मैंने अपने विश्वकोश में से मैरेथन वाला प्रसंग देखा:
मैरेथन लंबी दूरी की एक सड़क दौड़ है जिस की ऐतिहासिक एक पॄष्ठभूमि भी है।
चार सौ नब्बे ईसा पूर्व की एक तपती दोपहर में पंद्रह हज़ार फ़ारसी आक्रमणकारियों को दस हज़ार यूनानी सिपाहियों ने अपने मैरेथन नगर में जब पराजित किया, तो इस भव्य विजय की घोषणा मैरेथन से एथेंस तक पहुँचायी फ़ीडिपीडीज़ ने। दौड़ कर। कहते हैं, मैरेथन से पच्चीस मील से ज़्यादा की दूरी पर स्थित एथेंस पहुँचने से एक घंटा पहले ही म्रियमाण फ़ीडिपीडीज़ मृत्यु को प्राप्त हो चुका था। किन्तु वह तब भी दौड़ता रहा था। मृतावस्था में दौड़ता रहा था।
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