उथल-पुथल
दीपक शर्मा
उस शनिवार सुधाकर जब दफ़्तर से लौटा, तो उत्साह से भरा था, “कल हमें पिकनिक पर जाना है। तुम सूखे आलू अच्छे बना लेती हो। वही लेते चलेंगे . . .”
“आलू? कितने लोग के लिए?” अरुणा लोगों से मिलने-जुलने से बहुत घबराती थी। उसके मन-मस्तिष्क का बवंडर उसे हर पल ऐसी उथल-पुथल में रखे रहता कि साधारण बातचीत करने में भी उसे प्रयास करना पड़ता।
“समझ लो, दस-पंद्रह लोग के लिए। आज विकास अधिकारी ने जब मुझे बताया वह कल मैनेजर मैैडम के परिवार के साथ पिकनिक पर जा रहा है तो मैंने भी झट से उस में सम्मिलित होने की इच्छा प्रकट कर दी। आख़िर मैं भी असिस्टेंट मैनेजर हूँ। विशिष्ट अधिकारियों में अपनी पहचान बढ़ाने का यह एक बढ़िया अवसर रहेगा। फिर अतुल भी अगले महीने से स्कूल जाने लगेगा। उसे भी तो अधिकारी-वर्ग के बच्चों से मेलजोल अभी से बढ़ा लेना चाहिए . . .”
“आलू मैं बना दूँगी,” अरुणा पति से कभी नहीं उलझती, “मगर कल मैं माँ से मिलने की सोच रही थी . . .”
“तुम्हारी मरणासन्न माँ के पास क्या धरा है,” सुधाकर ताव खा गया, “तुझे हज़ार बार बता चुका हूँ अब उस बाती में ज़्यादा तेल नहीं। कल तुम्हें पिकनिक पर चलना ही होगा . . .”
अपने परिवारजन के प्रति सुधाकर के अवांछनीय व्यवहार को अरुणा उसी सहजता से लेती जिस प्रकार वह सुधाकर की दूसरी अपाच्य व असंगत टिप्पणियों व गतिविधियों को स्वीकार करती थी।
“ठीक है। माँ के पास नहीं जाती।”
♦ ♦
बारह वर्ष पहले महत्वाकांक्षी सुधाकर ने अपने दफ़्तर में एक लो-ग्रेड क्लर्क की नौकरी शुरू की थी।
किन्तु आगामी प्रोन्नति के हर अवसर को वह अपने हाथ में पकड़ लेता रहा था। जब कभी भी उसके विभाग की स्तरीय परीक्षाएँ होतीं, उन सब में भाग लेने हेतु वह कड़ी मेहनत करता। और उत्तीर्ण हो जाता।
इस के अतिरिक्त अपने से वरिष्ठ अधिकारियों को अपनी उपयोगिता व सेवाओं के विविध प्रमाण देने के लिए उसकी तत्परता भी उसके काम आती और हर बार वह अपने लिए पहले से ऊँची कुर्सी जुटाने में सफल हो जाता।
इधर उसे सफलता मिलती तो उधर वह घर-बाहर के लिए नए साधन जमा करने में लग जाता। साइकिल छोड़ कर यदि एक वर्ष स्कूटी लेता तो कुछ वर्ष बाद स्कूटर। फ़्रिज के बाद, टीवी तो उसके बाद नया सोफ़ा सेेट। परिणाम, घर में हमेशा आर्थिक तंगी का वातावरण बना रहता।
जो वेतन अरुणा अपनी बुटीक वाली से पाती, वह महीने की दूसरी ही तारीख़ में चिनगे का चोग़ा दिखाई पड़ता और पलक झपकते लोप हो जाता। कर्ज़ की कोई न कोई किश्त हमेशा मुँह बाए अरुणा को ताकती रहती। जब कभी अरुणा माल-इसबाब को इकट्ठा करने की सुधाकर की इस लोभ प्रकृति का विरोध करना चाहती उसके सिर पर लटक रही तलवार खींच ली जाती और युद्ध छिड़ने-सी स्थिति घिर आती।
ऐसे में जीवन ने जिस झंझा-पथ पर अरुणा को ला खड़ा किया था, उस झंझावात की गलाघोंटू पकड़ उसका दम हरदम उखाड़े रखती। उसका शरीर झुरझुराते हुए। उसकी साँस गले में अटक-अटक जाती और वह सुधाकर के किसी भी कहे को बेकहा न कर पाती।
अरुणा के लिए अनजान लोगों के साथ किसी जनसमूह में भाग लेने का वह पहला अवसर था। अभी तक जिन किन्हीं विभिन्न जनसमूहों में उसकी सहभागिता रही थी, वे सभी उसके अपने परिवार व ससुराल तक ही सीमित रहे थे।
♦ ♦
पिकनिक पर अपने पति व दो बच्चों के साथ आईं मैनेजर मैडम व विकास अधिकारी की नव-विवाहिता की ठसक व चमक ने एक ओर यदि उसे अपने अति साधारण होने का आभास दिया तो दूसरी ओर उसके मन में उन सभी के प्रति आकर्षण का भी उदय हुआ।
सभी जन को अरुणा के सूखे आलू बहुत पसंद आए थे। मैनेजर मैडम पूरी व मटर पनीर के साथ गुलाब जामुन लाई रहीं थीं और विकास अधिकारी की पत्नी दही-बड़े।
सभी ने भरपेट खाया था। बच्चे जब झूला झूलने चले गए तो इधर बड़ों ने हँसी-मज़ाक शुरू कर दिया।
“मेरे पास एक मज़ेदार सवाल है,” नटखट अंदाज़ लिए विकास अधिकारी ने जभी अपना एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया, “मगर शर्त यह है सभी लोग को पूरी ईमानदारी से इस का उत्तर देना होगा।”
“सवाल क्या है?” मैनेजर मैडम के पति व उपस्थित दूसरे जन के साथ अरुणा भी उत्सुक हो ली।
“अरुणा, तुम अतुल के पास जाओ,” सुधाकर को अरुणा की उतावली तनिक न भायी।
“यदि कोई परी आप के पास आकर पूछे, मैं आप को तीन ऐसे घंटे देती हूँ जिनमें आप अपने मन की किसी भी जगह पर पहुँच सकते हैं, किसी से भी भेंट कर सकते हैं, तो आप क्या करेंगे?” विकास अधिकारी ने अपना सवाल खोला।
“मैं तो अपने मनपसंद उपन्यासकार की नई रचना उस परी से माँगना चाहूँगा,” मैनेजर मैडम के पति स्वयं भी लेखक थे और पढ़ने के बेहद शौक़ीन।
तदंतर नवविवाहिता चहकी, “मैं तो अपने तीन घंटे सव्यसाची मुखर्जी के शो-रूम में बिताना चाहूँगी। उसका डिज़ाइन किया गया लहँगा ख़रीद सकने की मेरी पुरानी साध है . . .”
“तुम अतुल के पास जा क्यों नहीं रही? कहीं किसी ने उसे झूले से नीचे गिरा दिया तो?” सुधाकर अरुणा पर खीझा। वह नहीं चाहता था अरुणा का मन भी किसी ख़रीदारी के लिए ललचा आए। यों भी अरुणा की निजी ख़रीदारी निम्नतम ही रहा करती।
“तुम्हारी पत्नी अतुल के पास बिल्कुल नहीं जाएगी,” बग़ल में बैठी, मैनेजर मैडम ने आधी उठ चुकी अरुणा की बाँह थाम ली और सुधाकर से बोली, “तुम भी विचित्र हो, सुधाकर। जो उसे यहाँ से उठाना चाहते हो। तुम्हारा बेटा हमारे सामने वाले झूले तक ही तो गया है। फिर हमारे दोनों बेटे भी उसके साथ हैं। चिंता की कोई बात ही नहीं . . .”
“सौरी मैडम,” सुधाकर झेंप गया, “लेकिन मुझे झूले पर झूल रहे अपने अतुल की चिंता है तो। घर से बाहर हम उसे बहुत कम कहीं ले कर जाते हैं . . .”
“ओह! मगर बच्चे को बाहर घुमाना बहुत ज़रूरी है, माए बौए। ख़ैर,” मैनेजर मैडम के पति सुधाकर की झेंप से भारी हो आए वातावरण को हल्का करने हेतु उसी से पूछ लिए, “तुम बताओ तुम परी से क्या माँगोगे?”
“सर,” अपनी झेंप भूल कर सुधाकर व्यग्र हो उठा, “आप पूछ ही रहे हैं तो बता देता हूँ, मैं उस परी से ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के अगले प्रोग्राम में मुुझे ‘हौट सीट’ दिलाने और फिर वहाँ आने वाले प्रश्न और उनके सही उत्तर मुझे लिखवा देने को बोलूँगा। पिछले आठ वर्षों से मैं उसमें भाग लेने के लिए तैयारी कर रहा हूँ और मेरी तीव्र इच्छा है मैं करोड़पति बनूँ तो लोग यही सोचें, वे करोड़ मैंने अपनी क्षमता के बल पर जीते हैं . . .”
“यह तो कमाल की माँग है,” मैनेजर मैडम के पति उमंग भरे स्वर के साथ फिर विकास अधिकारी की ओर मुड़ लिए, “और तुम बताओ जिस समय तुम्हारी नवविवाहिता अपने तीन घंटे वहाँ लहँगे देख रही होगी, तुुम परी से क्या करवाना चाहोगे?”
“मैं परी के साथ मुख्य मंत्रालय के वित्त सचिव के साथ रहना चाहूँगा, सर,” विकास अधिकारी बोला, “अपने संस्थान के लिए तैयार किया गया अपना अनुदान लेखन उन से पास करवा कर ही लौटना चाहूँगा . . .”
“बहुत महत्वाकांक्षी हो,” मैनेजर मैडम के पति ने अपने होंठों से सीटी बजाई।
“जी। हूँ। बहुत महत्वाकांक्षी हूँ। लेकिन मेरी पहुँच बहुत सीमित है। ख़ैर, अब आप बताइए, मैडम। आप क्या करना चाहेंगी? जिस समय ‘सर’ हाथ आए अपना वह नया उपन्यास पढ़ रहे होंगे।”
“किसी पर्वत शृंखला के नितांत एकांत को अपने भीतर भर लेना चाहूँगी ताकि शेष दिनों की चक्रवाती भगदड़ के बीच उसकी स्मृति मुझे स्थिर रख सके . . .”
इधर लोगों का ध्यान मैनेजर मैडम की अभिलाषा सुनने में बँटा, उधर सुधाकर ने अरुणा को अपनी टकटकी में बाँध कर उसे वहाँ से हटने का आदेश दे डाला। वह नहीं चाहता था अरुणा परी के पास जाए।
जभी अरुणा चीख़ी और फूट-फूट कर रोने लगी। वह चीख़ क्या थी मानो सदियों पुराना कोई पहाड़ अपनी ही नींव से उखड़ कर गिर रहा हो जिसकी गर्जना मीलों दूर तक सुनी जा सकती थी। दुख और क्रोध का एक विस्फोटक मिश्रण। और रुलाई उसकी ऐसी भीषण थी मानो आसमान फटा हो, पाताल-भेदी ऐसी गूँज के साथ कि सामने वाले की रूह कँपा दे। वह गूँज जो बरसों के उस सन्नाटे की थी, उन शिकायतों की थी जो उसके अंदर दफ़न रही थीं। उस बाँध के दरकने की थी जो किसी कंक्रीट से नहीं, बल्कि ‘चुप्पी’ की ईंटों से व ‘भीरुता’ के सीमेंट से बना था।
“वास्तव में मेरी पत्नी की माँ सख़्त बीमार है,” जमघट के ठिठके चेहरों को देख कर सुधाकर सकपका गया, “दो महीने पहले तेज़ रक्तचाप के कारण उनकी बोलने की शक्ति जाती रही है और उन के शरीर का दायाँ भाग भी अब काम नहीं करता और अब अपने बिस्तर पर लेटी वह अपने अंतिम साँस गिन रही हैं . . .”
“यदि पृथ्वी पर न्याय होता तो हमें धैर्य की क्या आवश्यकता रहती?” मैनेजर मैडम ने अरुणा की पीठ घेर ली, “तुम्हें धीरज नहीं छोड़ना चाहिए।”
“अरुणा को अपने माता-पिता के सुख-दुख में शरीक होने की पूरी छूट है,” सुधाकर ने अरुणा को फिर उस झंझावात के हवाले करना चाहा जो वह निरंतर उस पर हावी रखता रहा था, “बल्कि मैं तो स्वयं भी उनका बहुत ख़्याल रखता हूँ। लिहाज़ रखता हूँ। उसी कारण बिना किसी दहेज़ के अरुणा को स्वीकार किए हूँ और . . .”
“तुम्हारी बातें और व्यवहार मुझे अत्यन्त आपत्तिजनक मालूम देते हैं,” मैनेजर मैैडम ने सुधाकर को घूरा, “तुम्हारी पत्नी ने मुझे बताया वह नौकरी करती है। तो क्या उसकी कमाई को तुम अपने घर की नींव नहीं मानते? उसकी कमाई तुम्हारे आर्थिक साधनों में एक मज़बूत स्रोत नहीं?”
“जी . . . जी . . .,” मैनेजर मैडम द्वारा कोने में ढकेला गया सुधाकर हड़बड़ा गया।
“क्यों? लड़की? क्यों?” विलाप कर रही अरुणा को मैनेजर मैैडम के पति लताड़ने लगे, “जानती नहीं क्या? अपने जीवन के प्रति सजग रहना, सचेत रहना तो तुम्हारा अपने प्रति और समाज के प्रति परम कर्त्तव्य बनता है . . .”
“तुम अवसाद को परे धकेल दो,” मैनेजर मैडम ने अरुणा को अपने अंक में समेट लिया, “तुम सुधाकर से भय क्यों खाती हो? जिस निर्धन देश में हम रहते हैं उस देश में हमारा आर्थिक रूप से स्वतंत्र तथा सबल होना ही हमारी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एक मज़बूत शस्त्र है . . .”
अरुणा ने वे शब्द सुने।
फूलों की महक उसके नथुनों ने अपने भीतर भरी।
नरम घास ने उसके पाँवों को सहलाया और एक तेज़ वात-प्रवाह ने उत्पाती उसके अंदर चल रहे झंझावात को औंधा दिया।
उसकी रुलाई बंद हो गई।
उसमें आत्मविश्वास का एक नया झरना फूट चला।
पहली बार उस ने सुधाकर की ओर निर्भीक दृष्टि से देखा और अकस्मात् उसे लगा कि आतंक का जो झंझावात उसे घेरे रहता था, वह झंझावात अब सुधाकर की ओर तेज़ी से सरकने लगा था और वह स्वयं उस से मुक्त हो चली थी।
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