ज्वार
दीपक शर्मा
“ज़बरदस्ती है कोई?” बाथरूम से तृप्ति के बड़बड़ाने की आवाज़ आई।
सुनी मैंने अनसुनी रहने दी।
“ज़बरदस्ती है कोई?” उसकी आवाज़ तेज़ हो ली।
“ज़बरदस्ती भी कैसी? घोर, घनघोर ज़बरदस्ती।”
“चुप हो जा . . . ” अपने बिस्तर से उठकर मैं बाथरूम में चला गया।
बाथरूम की दीवार के दूसरी तरफ़ बेटे और बहू का कमरा था।
“ज़बरदस्ती इतनी ठीक नहीं है . . . ठीक नहीं है . . . ” उत्तेजना में तृप्ति अक़्सर अपने वाक्यों के अंतिम अंश दोहराने लगती, “बात आपकी मैं नहीं मानती . . . नहीं मानती मैं . . . नहीं मानूँगी मैं . . . ”
“पापा!” बेटे ने दरवाज़े पर दस्तक दी। उसका आदेश रहता कि रात में हम लोग अपने कमरे के दरवाज़े की सिटकिनी चढ़ाकर सोया करें। ताक-झाँक करने का बहू को शौक़ था, इसलिए।
“मिट्टी ख़राब करना तूने छोड़ा नहीं।”
हमारे विवाह के सत्ताईस वर्षों में एक भी दिन के चौबीस घंटे ऐसे न रहे थे जिसमें तृप्ति को दो-एक बार मिचली न हुई हो या फिर एक-दो बार वह रोई-चिल्लाई न हो। उसी सौतेली माँ के अनुसार, छठी जमात में उसकी पढ़ाई छुड़ा देने का कारण भी यही रहा था। बचपन ही से उसका रोगग्रस्त बने रहने का हठधर्म।
“ज़बरदस्ती इतना ठीक नहीं है।” तृप्ति चिल्लाई, “ठीक नहीं है . . .”
“पापा!” बेटे ने दरवाज़े पर दोबारा दस्तक दी।
मैंने सिटकिनी खोल दी।
“क्या बात है माँ?” बेटा बिस्तर पर तृप्ति की बग़ल में जा बैठा।
“मैं यहाँ नहीं रहना चाहती,” तृप्ति रोने लगी। “नहीं रहना चाहती। रेलवे में जगह नहीं मिलती, न सही। तू मेरा पार्सल बना दे। ऊपर मेरा पुराना पता लिख दे। डाक वाले मुझे अपने आप उधर पहुँचा देंगे . . . उधर पहुँचा देंगे . . . ”
“वह पुराना मकान हमने बेच डाला है माँ!” तृप्ति को शांत करने की चेष्टा बेटे ने जारी रखी।
“ज़बरदस्ती?” तृप्ति अपनी लहर में हिलकोरे लेती रही। “वहाँ मेरी माँ के हाथ के कढ़े शॉल हैं, मेज़पोश हैं, पलंगपोश हैं . . . उन्हें धूप दिखलानी है . . . धूप दिखलानी है . . . हवा खिलानी है . . . ”
“वह सारा सामान हम यहाँ ले आए हैं माँ!” बेटे ने तृप्ति की पीठ घेर ली।
“ज़बरदस्ती?” रोना भूलकर तृप्ति चिल्लाने लगी। “उधर मेरे पास अकेली सोने-बैठने को एक पूरी मियानी है . . . अपनी मियानी है . . . ”
उधर हमारे कस्बापुर के मकानों में नीची छत वाली एक ऐसी कोठरी ज़रूर रखी जाती है जो मकान के मध्य भाग के किसी एक कमरे की छत के दरमियान रहती है, जिसमें गृहिणियाँ अपने निजी, क़ीमती असबाब के साथ-साथ तात्कालिक काम में न लाया जाने वाला सामान भी टिकाए रखती हैं—जैसे फ़ालतू गद्दे या रजाइयाँ। ज़रूरत से ज़्यादा बना अचार या मुरब्बा, केवल ख़ास मेहमानों के लिए सुरक्षित रखा गया मेवा या मद्य-पेय।
“तुम्हारा सारा सामान यहीं है, माँ!” बेटे ने अपनी आवाज़ धीमी कर ली, बहुत धीमी। जब भी ग़ुस्सा उस पर हावी होता, वह अपनी आवाज़ इसी तरह धीमी कर लेता, “तुम बताओ, तुम्हें अपने सामान में से क्या चाहिए?”
“जबरदस्ती? कहाँ? मुझे तो यहाँ कुछ भी नज़र नहीं आता। अपना कुछ भी नज़र नहीं आता। हर चीज़ यहाँ बेगानी ही बेगानी है . . . बेगानी ही बेगानी है।”
“इधर इस परछत्ती में रखा है।” बाथरूम की छत पर बनाई गई छाजन के पल्ले इधर कमरे की दीवार में खुलते थे।
“जबरदस्ती? इसे तू परछत्ती कहता है?” तृप्ति भड़क उठी। “दो बित्ता जगह नहीं इसमें और मेरा सामान तो इतना ढेर था, ऐसी तीन जगहों में भी पूरा न पड़ता . . . ऐसी तीन जगहों में भी पूरा न पड़ता . . . पूरा न पड़ता . . . ”
“ऑल दिस वूलगैदरिंग इज़ गोइंग टू डेथ (इधर-उधर की इतनी बात मेरी बरदाश्त से बाहर है),” बहू हमारे पास चली आई।
बेटा और बहू आपस में ऐसी ख़ास अंग्रेज़ी ही इस्तेमाल में लाते। शुरू में मैं कुछ भी समझ न पाता था। फिर मैंने अमेरिकी स्लैंग की एक डिक्शनरी ख़रीद डाली थी और सब समझने लगा था।
“जबरदस्ती? कौन है यह? इधर क्या कर रही है? इधर इसे किसने बुलाया? किसने बुलाया? इधर इसे किसने भेजा? किसने भेजा?”
बहू तृप्ति के सामने बहुत कम पड़ती थी। हीला उसके पास तैयार था ही। “मैं हिंदी नहीं जानती और मम्मी अंग्रेज़ी नहीं जानतीं।” हालाँकि बेटा मुझे कई बार चेता चुका था, ’माँ से कहिए, इसके सामने सँभलकर बात किया करें। यह हिंदी पूरी समझती है।’
“डिड शी गेट आउट ऑफ़ बेड द रौंग साइड? (यह कैसी तुनुकमिज़ाजी है?) शी डज़ नॉट हैव ऑल हर स्विचेज ऑन (इनका दिमाग़ इनके वश में नहीं),” बहू ने अपनी नाक सिकोड़ी।
“यह बोली कौन-सी बोल रही है? शब्द अंग्रेज़ी के और उनके जोड़ ऐसे अटपटे? सुनते ही जिन्हें दिमाग़ घूम जाता है? दिल डूबने लगता है? हमसे छिपाने वाली इतनी बातें इसके पास जमा रहीं तो यह इधर आई ही क्यों? क्यों आई इधर? मुझे बावली बनाने के वास्ते . . . बावली बनाने के वास्ते?” तृप्ति फिर चिल्लाई।
“शी इज़ ऑल पिसस एंड विंड (ये बहुत फ़ालतू बोल रही हैं),” बहू ने बेटे को एक बनावटी मुस्कराहट दी, “शी गिव्ज़ मी ग्रीफ़ (ये मुझे कष्ट पहुँचा रही है)।”
“जबरदस्ती?” तृप्ति चिल्लाई। “तू इसे यहाँ से भगाता क्यों नहीं? भगाता क्यों नहीं?”
“लेट्स गिव हर द ऐयर एंड गेट बैक (हम इन्हें छोड़ देते हैं और उधर लौट लेते हैं),” बेटे ने बहू का हाथ थाम लिया और उसे हमारे कमरे से बाहर ले आया।
“क्या बोले वे?” तृप्ति मेरी दिशा में मुड़ ली, “क्या बोले वे?”
“तू क्या-क्या बोली? तुझे अपना पता है? सबके सोने का समय है। रात का ग्यारह बज रहा है और तू अपना राग अलाप रही है। सबकी नींद ख़राब कर रही है . . . ” तृप्ति की अल्लम-गल्लम पर मैं विराम लगाना चाहता था।
इकलौती संतान को साधन-संपन्न बनाने में सफल रहे थुरहथे पिता बुढ़ापे में शायद ज़्यादा कष्ट पाते हैं। बेशक कस्बापुर का अपना मकान बेचने के पक्ष में जो तर्क बेटे ने मुझे दिए थे, सभी उस समय मुझे युक्ति-युक्त लगे थे, निष्कपट लगे थे, समरूप लगे थे। उनकी प्रचंडता, पहुँच और दीर्घसूत्रता तो पिछले महीने यहाँ मुंबई में आने के बाद मिल रहे अकल्पित कष्टों ही ने उजागर की थी, विशेषकर रात के समय। दिन में मैं बाज़ार करने के बहाने निकल भी लेता, लेकिन रात में क्या करता, कहाँ जाता?
“आप थोड़ा पानी पी लो, माँ!” बेटा कमरे में लौट आया।
उसके हाथ में एक गिलास था। आधा भरा।
“जबरदस्ती?” तृप्ति फिर चिल्लाने लगी। “यह पानी कहाँ है? यह तो कोई दवा है . . . ” पानी पारदर्शी न था। सफ़ेद था।
लेकिन अपनी जिज्ञासा मैंने दबा ली।
“पानी है माँ, यह पानी ही है!”
“जबरदस्ती? यह पानी है?” तृप्ति ने मेरी ओर देखा।
संकट की स्थिति में अपनी आशंका वह मेरे सुपुर्द कर देती। रोष के समय भी।
“यह पानी है?” मैंने बेटे से पूछा।
“पानी ही तो है।” बेटे ने मेरी दिशा में अपनी आँख मिचकाई, “पानी ही तो . . . ”
“फिर पिलाते क्यों नहीं?” बेटे के षड्यंत्र में मैं सम्मिलित हो लिया।
बेटे ने अपनी बाईं भुजा से तृप्ति का सिर अपनी कमान में ले लिया और दाएँ हाथ से पानी का वह घोल उसके गले में उतार दिया।
“आप अब सो जाओ माँ!” बेटा बिस्तर से उठ बैठा।
“जबरदस्ती?” तृप्ति की आवाज़ थोड़ी लड़खड़ाई। “मेरा सामान मुझे दिखलाओगे नहीं?”
“सुबह दिखलाऊँगा,” बेटे ने अपने क़दम कमरे के दरवाज़े की ओर बढ़ा लिए।
“पानी में क्या मिला था?” मैंने उसका पीछा किया।
“नींद की गोली,” वह मेरे कान में फुसफुसाया और पार निकल गया।
दरवाज़े की सिटकिनी मैंने चढ़ा दी और बिस्तर पर लौट आया।
तृप्ति सो चुकी थी। एक हलकी कँपकँपी से जब-तब काँपती हुई।
रात के किसी एक पहर एक सरसराहट मेरे कानों से आ टकराई और मेरी नींद टूट गई।
मेरी निगाह तृप्ति पर पड़ी और वहीं ठहर गई।
सरसराहट उस पर सवार थी . . . वही उसके अंदर उतर रही थी . . . उसकी आँख की पुतलियों से खेलती हुई . . .
उसकी नाक के दोनों नथुनों से उसकी साँस एक साथ खींचती हुई . . .
बाहर, बाहर, बाहर . . .
तालबद्ध, निर्विध्न, एक समान।
उसकी कँपकँपी उसके अंदर से उठ रही थी, जैसे कोई हिचकी या छींक: बाध्यकर मगर लयहीन। यह सरसराहट अलग थी। बाहर से, ऊपर से तृप्ति को पराभूत किए जा रही थी।
मैं डर गया और तत्काल बेटे को बुला लाया।
अनजानी उस सरसराहट की थाप अपनी ठोंक निपटा चुकी थी।
कमरे में अब सन्नाटा था: पूर्ण, समापक सन्नाटा।
तृप्ति का सिर तिरछा झुका था और चेहरा ऊपर की ओर उठा था: उपद्रवी और अशांत।
यह उसका स्थायी भाव था। हालाँकि सन् छियत्तर में मेरी माँ ने जब उसे मेरे लिए चुना था तो बस एक ही बात पर ध्यान दिया था कि—‘लड़की के मुँह में ज़बान नहीं है।’ उस समय मैं चौंतीस वर्ष का था और वह अठारह की। सन् साठ में हुए मेरे पिता के आकस्मिक निधन ने वर्षों तक तेरा विवाह स्थगित रखे रखा था। एक तरफ़ पाँच छोटी बहनों की ज़िम्मेदारी लादकर और दूसरी तरफ़ उनके स्कूल की फ़ीस-क्लर्की। यह अलग बात है, दोनों को निभाने के साथ-साथ ही मैंने सन् उनसठ में इंटरमीडिएट पार की थी। सन् तिहत्तर में बी.ए. और सन् पचहत्तर में अंग्रेज़ी में एम.ए.। और जब तक पाँचवीं बहन ब्याही गई थी, मैंने अपने पिता वाली फ़ीस-क्लर्की छोड़कर उसी स्कूल में अध्यापकी शुरू कर दी थी, जहाँ से अभी पिछले ही साल मैंने सेवानिवृत्ति पाई थी।
“माँ!” बेटे ने तृप्ति का माथा छुआ और अपना हाथ खींच लिया, “आप देखिए, पापा।”
“तृप्ति . . .!” मैंने उसका कंधा हिलाया।
“शैल आइ ओल्सो गिव हर द वन्स ओवर (क्या मैं भी इन्हें जाँच-परख लूँ?)?” बहू बेटे के पीछे-पीछे चली आई थी।
हम दोनों वहाँ से हट गए थे और ड्राइंगरूम में चले आए।
“नींद की कितनी गोली दीं?” मैंने पूछा।
“उस समय मैं उन्हें चुप कराना चाहता था। मुझे डर था, अपने ज्वार में वे कुछ ऐसा-वैसा न उगल दें . . . ”
“ऐसा-वैसा क्या?” मैंने बेटे को ललकारा, “क्या उलग देगी?”
“आप उन्हें अपने पास सोने नहीं देते। सोने के लिए बाथरूम में भेज देते हैं . . . ”
“वहाँ सोने की ज़िद उसकी अपनी ज़िद थी। कहती—’इधर एयरकंडीशनर में सोऊँगी तो मुझे ज़ुकाम हो जाएगा। बुख़ार हो जाएगा। जोड़ों में दर्द शुरू हो जाएगा। उधर बाथरूम में एक खुली खिड़की है, वहाँ मुझे ताज़ी हवा मिलेगी . . . ’ हमारे शयनकक्ष में जो एकल खिड़की रही, वह उसके एयरकंडीशनर ने घेरी रही।”
“आप जो भी कहें, आप उन्हें उधर सोने से रोक सकते थे,” बेटे ने मुझे उलाहना दिया, “आपकी बात वे कैसे टाल देतीं?”
“क्यों? तू नहीं जानता, कैसी बग़ावती और अक्खड़ रही वह?”
“आपने ज़्यादा कहा भी तो नहीं?”
“क्या मतलब है तेरा?” मैं उबल पड़ा, “तू सोचता है कि इधर उसे लाकर तूने बड़ा भला किया उसका? घर-बेघर कर दिया उसे? ठौर-कुठौर बिठला दिया। विदेशी, बेरहम बहू उसकी छाती पर चढ़ा दी और . . . ”
“बेरहमी दिखलाने के लिए विदेशी होना ज़रूरी नहीं।” बेटा मुक़ाबले पर खुले-खुले उतर आया, “उसे पुराने घर की मियानी ही की बात क्यों की उन्होंने? बाक़ी कमरों का नाम क्यों नहीं लिया? क्योंकि मियानी ही पूरे घर में उनकी अपनी थी, बाक़ी सभी जगह आपने घेर रखी थी . . . ”
चकित मैं बेटे का मुँह ताकने लगा। उसके चेहरे की ठवन मुझसे देखे न बनी।
हमारे सम्बन्ध के अनुशासन के प्रति इतनी अश्रद्धा!
मानो वह घोषणा थी—’पापा, आपका शासन ख़त्म हुआ और आपकी ताक़त तितर-बितर।’
मानने के लिए मेरे पास क्या मन्नत बची रही अब?
माँगने के लिए क्या आश्वासन?
इस फ़्लैट का आजीवन आश्रम?
और फिर अपने देहांत पर उसके हाथों अपना दाह-संस्कार?
“ईवन इफ़ यू कॉल द डॉक्टर यू विल गेट द वुडन स्पून (आप डॉक्टर को बुलाओगे भी तो आपकी मात होगी),” बहू ड्राइंगरूम में आ गई।
“रैप अप!” बेटा टेलीफोन की ओर बढ़ लिया, “मैं डॉक्टर बुला रहा हूँ।”
डॉक्टर ने हमारे संदेह की पुष्टि की तो बहू मेरी बग़ल में आ बैठी, “गुड, ही डाइड हियर विद अस अराउंड टु हेल्प यू (अच्छा हुआ, वे यहाँ मरीं, जहाँ हमारी सहायता आपको उपलब्ध हैं)।”
मेरे साथ वह सामान्य अंग्रेज़ी ही बोलती।
“येस!” इतना ही कहा मैंने।
बेटे ने चेहरा अपने हाथों से ढँक लिया और रोने लगा।
“चिल्ल-आउट हनी!” बहू मेरी बग़ल से उठकर बेटे की बग़ल में जा बैठी, “शी वाज़ अ बैड क्लेम, एनी वे (वे रुग्णा तो थीं ही)।”
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माता पिता की उपेक्षा और स्वार्थ की पराकाष्ठा। जबर्दस्त संप्रेषण!
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