जापान का यूरोपीय व्यापारियों से सम्बन्ध और ईसाई मिशनरियों का देश निकाला
डॉ. उषा रानी बंसल
संदर्भ
जापान इतिहास में देवताओं के देश के नाम से प्रसिद्ध है। उसे ‘लैंड ऑफ़ राइज़िंग सन’ भी माना जाता है। (Land of rising Sun) इस जापान में यूरोपीय कब और कैसे पहुँचे? जब वह जापान पहुँचे तो जापान की आंतरिक स्थिति कैसी थी? ऐसी क्या बात हुई कि जापान ने ईसाई मिशनरियों को जापान से बाहर निकाल दिया। प्रस्तुत लेख में इन्हीं बिंदुओं का विश्लेषण किया गया है।
यूरोपीय व्यापारियों के आने के समय जापान की स्थिति
पंद्रहवीं, सोलहवीं शताब्दी में विश्व के देशों के व्यापारिक सम्बन्धों में नया मोड़ आया। 1400 के दशक में, जापान आंतरिक संघर्ष में फँसा हुआ था। इस संघर्ष कोई अंत नहीं दिखाई देता था। आशिकागा शोगुन (फौजी सरदार), जो नाममात्र के लिए देश पर राज करते थे, इतने कमज़ोर हो गये थे कि वे अपने जागीरदारों को आपस में लड़ने से रोकने में अक्षम थे। समुद्री लुटेरों के गिरोह भी बहुत शक्तिशाली हो गये थे। राजा उन को भी दंडित करने में असमर्थ था। उस समय समुद्र तट पर रहने वाले ताक़तवर समुराई ख़ुद को ‘दाइम्यो’ (महान स्वामी) कहने लगे थे। उन्होंने ने छोटे-छोटे राज्य बना लिए थे। इन इलाक़ों में वह स्वतंत्र, स्वयंभू राजा बन गये। उन्होंने अपने-अपने इलाक़े में नये क़ानून लागू किए। वह अपने इलाक़े में आने वालों से कर वसूलने लगे। उन्होंने अपनी सेना में ऐसे योद्धाओं को भर्ती किया जो सिर्फ़ उनके प्रति वफ़ादार थे, न कि शोगुन या सम्राट के प्रति। ऐसी अराजकता से भरे दौर से तीन ताक़तवर समुराइयों ने एक के बाद एक जापान को इन तथाकथित सरदारों को, शोगुन (सम्राट) की आधीनता मानने के लिए बाध्य किया। ये समुराई जापान के इतिहास में “तीन एकीकरणकर्ता” के नाम से प्रसिद्ध हो गये। सबसे पहला समुराई ओढ़ नोबुनागा ने 1560 के दशक में जापान को अपने शासन के तहत एकजुट करना शुरू किया। उनके बाद टोयोटोमी हिदेयोशी और टोकुगावा इयासू ने बागडोर सँभाली। इन लोगों ने लगातार हो रही हिंसा को ख़त्म किया, जापान को एक मज़बूत केंद्रीय सरकार के तहत एकजुट किया, और अपने देश का पश्चिमी देशों के साथ सम्बन्धों को परिभाषित किया।
पुर्तगालियों और अन्य यूरोपीय देशों का जापान में प्रवेश तथा निष्कासन
1543 में, पुर्तगाली जहाज़ जापान पहुँचे। यह उस रास्ते का अंतिम logically पड़ाव था, जो उन्हें अफ़्रीका के तट के चारों ओर से होते हुए, पूरब की ओर हिंद महासागर से गुज़रकर प्रशांत महासागर तक ले आया था। वे व्यापार करने के लिए निकले थे। वे संसार में रोमन कैथोलिकों की संख्या में वृद्धि करना चाहते थे। ऐसा वह पहले भी एशिया के अन्य हिस्सों में कर चुके थे। पुर्तगालियों के तुरंत बाद 1549 में स्पेनिश लोग आए, और पुर्तगालियों तथा स्पेनिश लोगों के ठीक पीछे-पीछे डच और अंग्रेज़ भी आ पहुँचे। हालाँकि, ये आख़िरी दो राष्ट्र धर्म फैलाने में कम और मुनाफ़ा कमाने में ज़्यादा दिलचस्पी रखते थे।
स्पेनिश और पुर्तगाली अपने साथ जेसुइट पादरी भी ले कर आये थे। 1556 में गैस्पर विलेला नामक पादरी पुर्तगालियों के साथ जापान पहुँचा। उसे जापानी भाषा आती थी। जिसने उसे जापानियों से सीधे सम्पर्क स्थापित करने में बहुत सहायता की। 1556 में कुछ अन्य पादरी भी पुर्तगालियों के साथ जापान पहुँच गये। इन पादरियों ने जापान पहुँच कर जापानी भाषा सीख ली। जापानी सीखने का लाभ यह हुआ कि वह जापानियों से सीधे बात कर सकते थे। इस तरह उन्हें धर्म परिवर्तन करने के लिए प्रेरित कर सकते थे। इस का परिणाम यह हुआ कि उन्होंने 1600 ई. तक, 100,000 से ज़्यादा जापानियों को रोमन कैथोलिक बना लिया। जापान में चर्च, गिरजाघर भी खड़े कर लिए। इन जापानी गिरजा-घरों चर्च में आधे से अधिक जापानी जेसुइट पादरियों को नियुक्त किया। ये पादरी अपने जापानी भाई-बंधुओं को ईसाई बनाने का काम करने लगे। जापान के क्यूशू के दक्षिणी द्वीप पर स्थित नागासाकी में इस तरह उन्होंने 10 चर्च खड़े कर लिए। इनमें अधिकांश पादरी जापानी ईसाई थे। इस तरह नागासाकी में धर्मांतरित ईसाइयों की संख्या बहुत अधिक हो गई। हालाँकि ज़्यादातर समुराई रोमन कैथोलिक बनना नहीं चाहते थे। लेकिन वह उन बंदूकों को प्राप्त करने के लिए लालायित थे जो यूरोपीय लोगों के पास थीं। ईसाई बने बहुत से दाइम्यो ने उनसे बंदूक प्राप्त करने के लिए मिशनरियों का समर्थन करना किया था। उनका उद्देश्य हथियार और बारूद प्राप्त कर उसका युद्ध में प्रयोग कर के अपने प्रतिद्वंद्वी समुराई को पराजित करना था।
इन बंदूकों के प्रयोग ने जापानी युद्ध-कला को बहुत प्रभावित किया। इसके लिए उन्होंने यूरोपीय युद्ध तकनीक भी सीखी और उसे अपनी लड़ाई में इस्तेमाल भी किया। अब वह यूरोपीय लोगों की तरह, एक साथ एक के बाद एक धड़ाधड़ गोलियाँ दागने लगे। इस तरह निरंतर बरसने वाली गोलियों की बौछार के सामने, पारंपरिक जापानी हथियारों से लैस विरोधियों का ठहरना कठिन हो गया। उन्हें हराना आसान हो गया। ओडा नोबुनागा ने लड़ाई की इसी नई तकनीक का प्रयोग किया था। 1575 में, नागाशिनो की लड़ाई में, उनके जागीरदार तोकुगावा इयासू ने यूरोपीय बंदूकों से लैस समुराई सैनिकों की टुकड़ियों का इस्तेमाल करके ताकेदा क़बीले के योद्धाओं को हराया। 1582 तक ओडा ने जापान के मुख्य द्वीप होंशू के केंद्रीय हिस्से को एकीकृत कर लिया। इस हिस्से में सम्राट की राजधानी क्योटो के आस-पास का इलाक़ा भी शामिल था। ओडा की मृत्यु के बाद, उनके एक जागीरदार, टोयोटोमी हिदेयोशी ने ओडा के हत्यारे की सेना को हराकर उनकी जगह ले ली। 1590 तक, हिदेयोशी ने जापान के सभी दाइम्यो (सामंतों) को हरा दिया था और उन्हें सम्राट के प्रति वफ़ादार होने का ऐलान करने को कहा। उन्होंने ग़ैर-समुराई लोगों से हथियार छीन लिए और किसानों को अपनी ज़मीन छोड़ने या सैनिक बनने से मना कर दिया। साथ ही, उन्होंने समुराई लोगों को युद्ध के अलावा कोई और पेशा अपनाने से भी रोक दिया।
हिदेयोशी पुर्तगालियों की कार्रवाई से सशंकित था। एक कट्टर बौद्ध होने के नाते, उसे ईसाइयों द्वारा गाय और घोड़ों का मांस खाना पसंद नहीं था। साथ ही, कुछ ज़्यादा ही जोश वाले धर्मांतरित लोगों द्वारा बौद्ध मंदिरों और पूजा की चीज़ों को तोड़े जाने की घटनाओं से वे बहुत दुखी था। इन घटनाओं में पादरी गैस्पर विलेला ने भी हिस्सा लिया था। अतः 1587 में, हिदेयोशी ने ईसाई मिशनरियों को जापान छोड़ने का आदेश दिया। इस आदेश को पूरी तरह लागू तो नहीं किया गया, लेकिन घबराए हुए जेसुइट्स ने ईसाई दाइम्यो से शोगुन पर हमला करने की सलाह दी और उनकी हर सम्भव मदद करने को कहा, जिस पर दाइम्यो ने मना कर दिया। 1590 में, जापान में मौजूद जेसुइट्स ने जापान छोड़ने के स्थान पर जापान के मामलों में दख़ल न देने का निर्णय किया। फिर भी वे गुपचुप तरीक़े से ईसाई दाइम्यो को पैसे देते रहे।
हिदेयोशी के ग़ुस्से से बचने का कोई भी तरीक़ा पूरी तरह कामयाब नहीं रहा। 1596 में, सैन फेलिप नाम का एक स्पेनिश जहाज़, जो फिलीपींस से मैक्सिको जा रहा था, प्रशांत महासागर में आए तूफ़ान में फँस गया और जापान के शिकोकू द्वीप पर उराडो बंदरगाह के पास एक रेत के टीले से टकराकर टूट गया। वहाँ के स्थानीय दाइम्यो ने जापानी क़ानून के अनुसार जहाज़ का सारा माल ज़ब्त कर लिया। जब जहाज़ के कप्तान ने इसका विरोध किया, तो दाइम्यो ने उसे सलाह दी कि उसकी मदद केवल शोगुन के अधिकारी ही कर सकते थे। उसने उन्हें माशिता नागामोरी से संपर्क करने की सलाह दी। उनकी परामर्श पर स्पेनिश कप्तान ने नागामोरी से मिलने के लिए दो व्यक्तियों को राजधानी क्योटो भेजा।
वहाँ उन्होंने अमेरिका में फैले स्पेनिश साम्राज्य का एक नक़्शा दिखाया और समझाया कि कैसे वहाँ के मूल निवासियों को ईसाई बना कर उन्होंने उस विशाल इलाक़े पर कब्ज़ा कर लिया। नागामोरी ने यह जानकारी हिदेयोशी को दी, उसे आशा थी कि इस तरह शायद उसे जहाज़ के माल को हथियाने का बहाना मिल जाएगा। हिदेयोशी धर्मपरिवर्तन की राजनैतिक चालबाज़ी को तुरंत समझ गया। वह डर गया। उसे लगा कि स्पेनिश लोग जापान पर कब्ज़ा करना चाहते थे और इसमें वे जापानी ईसाइयों की सहायता लेने की योजना बना रहे थे। हिदेयोशी ने उन ईसाई प्रचारकों को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया, जो 1587 में जारी किए गए उनके आदेश का पालन नहीं करते हुए, हुए जापान में ही रुके हुए थे। हालाँकि, जेसुइट लोगों ने 1587 के बाद से अपने धर्म-प्रचार के कामों को जान-बूझकर सरकार की नज़र बचाकर लुके-छुके रूप में करने लगे थे। और ज़्यादातर लोग उन्हें नज़रअंदाज़ भी कर रहे थे। हिदेयोशी ने उन्हें गिरफ़्तार करने का आदेश दिया। उन्होंने छब्बीस ईसाइयों को गिरफ़्तार किया, जिसमें ज़्यादातर जापानी थे। उन्होंने तेईस फ्रांसिस्कन संप्रदाय के ईसाइयों को भी गिरफ़्तार कर लिया। फरवरी 1597 में, उन सभी को नागासाकी में सूली पर चढ़ा दिया गया। वे ‘जापान के छब्बीस शहीद’ के नाम से मशहूर हुए।
शोगुन राजा टोयोटोमी ने ईसाइयों के निष्कासन के लिए एक आज्ञापत्र जारी कर दिया। इसे इतिहास में प्रथम व अन्तिम मिशनरियों के निष्कासन की राजाज्ञा माना जाता है। इसकी मुख्य धारायें थीं:
1. जापान देवताओं का देश है, लेकिन इसे ईसाई देशों से झूठी शिक्षाएँ मिल रही हैं। इसे अब और बरदाश्त नहीं किया जा सकता।
2. [मिशनरी] प्रांतों और ज़िलों में लोगों के पास जाकर उन्हें अपना अनुयायी बनाते हैं, और उन्हें मंदिरों और देवालयों को नष्ट करने को बाध्य करते हैं। यह एक ऐसी घोर अपमानजनक हरकत है जिसके बारे में पहले कभी सुना भी नहीं गया। जब किसी जागीरदार को कोई प्रांत, ज़िला, गाँव या किसी अन्य रूप में जागीर मिलती है, तो उसे इसे एक ऐसी संपत्ति मानना चाहिए जो उसे अस्थायी आधार पर सौंपी गई है। उसे इस देश के क़ानूनों का पालन करना चाहिए और उनके उद्देश्य के अनुसार चलना चाहिए। हालाँकि, कुछ जागीरदार ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से [अपनी जागीर का कुछ हिस्सा चर्च को सौंप देते हैं]। यह एक दंडनीय अपराध है।
3. पादरी [कैथोलिक पुजारी], अपने विशेष ज्ञान [विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में] के कारण, यह महसूस करते हैं कि वे अपनी मर्ज़ी से लोगों को बहकाकर अपना अनुयायी बना सकते हैं। ऐसा करके वे जापान में प्रचलित बुद्ध की शिक्षाओं को नष्ट करने का ग़ैर-क़ानूनी काम करते हैं। इन पादरियों को जापान में रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्हें इस सूचना के जारी होने के बीस दिनों के भीतर देश छोड़ने की तैयारी कर लेनी चाहिए।
4. काले [पुर्तगाली और स्पेनिश] जहाज़ व्यापार करने के लिए जापान आते हैं। इसलिए यह मामला एक अलग विषय है। वे अपना व्यापार जारी रख सकते हैं।
5. अब से, जो कोई भी बुद्ध की शिक्षाओं में बाधा नहीं डालता है—चाहे वह व्यापारी हो या न हो—वह ईसाई देशों से जापान में आज़ादी से आ-जा सकता है।
टोयोटोमी हिदेयोशी, “आदेश: मिशनरियों का निष्कासन”
हिदेयोशी के बाद जब इयासु जापान का राजा बना तो उसे भी डर था कि ईसाई लोग जापान के लिए ख़तरा बन सकते थे। उसकी इस धारणा को डच और अँग्रेज़ व्यापारियों ने बढ़ावा दिया, जो व्यापार में फ़ायदा उठाना चाहते थे। इयासु को भारत और फ़िलिपींस में पुर्तगाली और स्पेनिश लोगों की ज़बरदस्ती धर्मांतरण व व्यापारिक चालबाज़ी के बारे में पता था। उसे यह भी ज्ञात हुआ कि वह जापान पर अपना नियंत्रण बनाये रखना चाहते थे। इसलिए इयासु डरता था कि अगर कोई जापानी ईसाई बन जायेगा तो वह बागी दाइम्यो (सामंतों) को उसके ख़िलाफ़ साज़िश रचने में मदद कर सकता है। उसे इसका प्रमाण भी शीघ्र मिल गया। एक ईसाई समुराई ने दूसरे ईसाई समुराई की मदद करने के लिए एक जाली दस्तावेज़ तैयार किया, ताकि वह उस ज़मीन पर अपना दावा कर सके जिसे वह चाहता था। इस घटना से एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया। जाली दस्तावेज़ पकड़ लिए गये। पकड़े जाने पर, उस जाली दस्तावेज़ बनाने वाले ने यह भी दावा किया कि शोगुन की सरकार के एक अधिकारी की हत्या करने की भी वह योजना बना रहे थे।
शोगुन इयासू की धर्मांतरण के प्रति नीति
इयासु ने 1614 में ईसाई धर्म के पालन पर रोक लगा दी और ईसाई प्रचारकों को देश छोड़कर चले जाने का आदेश दिया। जापान के ईसाइयों को चेतावनी दी गई कि अगर उन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा, तो उन्हें मार दिया जाएगा। इयासु को यह साफ़ तौर पर समझ आ गया था कि देश को ईसाई प्रभाव और दूसरी ख़तरनाक ताक़तों से सुरक्षित रखने का सबसे अच्छा तरीक़ा यही है कि विदेशियों के जापान में आने पर रोक लगा दी जाए और जापान के लोगों को देश छोड़कर बाहर जाने से मना कर दिया जाए। जापान के लोगों को देश छोड़कर बाहर जाने से रोकने का एक और फ़ायदा यह भी होगा कि दाइम्यो लोग विदेशों में जाकर उसके ख़िलाफ़ कोई साज़िश नहीं रच सकेंगे।
इसके अतिरिक्त डच और अँग्रेज़ व्यापारियों और पुर्तगाली, स्पेन के व्यापारी, जो केवल व्यापार तक सीमित थे उन पर भी अकुंश रखने के लिए उसने उचित क़दम उठाये। डच व्यापारियों को नागासाकी के बंदरगाह में डेजिमा द्वीप पर एक बस्ती में रखा गया। यह बस्ती एक चारदीवारी वाला परिसर था जिसे छोड़ने की उन्हें अनुमति नहीं थी। केवल लाइसेंस प्राप्त व्यापारिक अधिकारी और अनुवादक (एक ऐसा पद जो बाद में वंशानुगत हो गया) ही उनसे संपर्क कर सकते थे। अँग्रेज़ों को भी शायद यही अधिकार दिए गया परन्तु जापान के साथ व्यापार उनके लिए उतना लाभदायक न था, जितने की उन्होंने उम्मीद की थी। अतः उन्होंने फिर जापान में अपने जहाज़ नहीं भेजे। चीनी व्यापारियों को जापान में प्रवेश करने की अनुमति थी, लेकिन उनका व्यापार नागासाकी तक ही सीमित कर दिया। वह एक विशेष चीनी बस्ती में ही वह रह सकते थे। जापानी केवल कोरिया, चीन, रूस के साथ व्यापार कर सकते थे। जापानियों पर 1635 में विशेष अभियानों को छोड़कर देश के बाहर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया। जापानी केवल कोरिया, चीन और रूस के साथ ही व्यापार कर सकते थे।
इस तरह जापान ने ईसाई मिशनरियों को देश से निकालने के लिया कठोर क़दम उठाये। जब 20 वीं सदी में यूरोप के देशों से जापान के राजनीतिक-कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित हुए, तब भी वहाँ ईसाई मिशनरियों के प्रवेश प्रतिबंध लगा ही रहा।
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