अपना-अपना घोषणा पत्र

01-05-2019

अपना-अपना घोषणा पत्र

सुशील यादव

घोषणा-पत्र जारी करने का दबाव मुझ पर भी कम नहीं था। 

लोग मुझे पार्टी से धकियाये हुए समझते हैं, मगर ऐसा नहीं है। आत्मसम्मान भी कोई चीज़ होती है ऐसा मेरा मानना है। आप पूछेंगे आपका आत्मसम्मान तब क्या घास चरने गया था जब आपसे जूनियर धड़ाधड़ मंत्री बनाए जा रहे थे, निगम के मलाईदार विभागों की लाल बत्तियाँ पा रहे थे। ट्रांसफ़र पोस्टिंग्स में अपनी बातें मनवा रहे थे। अपने ठेकेदारों की उपेक्षा को बर्दाश्त न कर पाने की ज़िद पर अड़े थे? 

बेशक़, बेशुबहा आपका मुझ पर ये आरोप कदाचित ग़लत नहीं हैं। 

हम गाँधीवादियों की वादी से आते हैं। हम में "जियो और जीने दो" जैसा कुछ है, जो हमें टुच्चेपन की राजनीति करने नहीं देता। हम लाख कोशिश करके भी देख लें हमारा नैतिक बल ग़ैर नीतियों के भरोसे हमें ऊपर उठने नहीं देता। 

"आप पर आरोप है कि आप कई घोटालों के जनक रहे हैं जिसमें करोड़ों अरबों की संपत्ति संग्रहित की है। जलाशय घोटाला एक समय सब की ज़ुबान पर था।"

"देखिये जिस जलाशय की बात कह रहे हैं उसमें आज पानी है कि नहीं? यदि पानी है, लोग उसका पीने में, सिंचाई में यदि उपयोग कर रहे हैं तो फिर काहे का घोटाला...? घोटाला तो तब कहते जब एक बूँद पानी नहीं होता, जलाशय हमने काग़ज़ों पर तो बनाए नहीं, अब सरकारी मद से पैसे किसी भी योजना में अनुमानित से ज़्यादा ख़र्च हो ही जाते हैं। हमने अपनी सफ़ाई सभी जाँच एजेंसियों को दे दी है जिसमें हमें क्लीन चिट भी मिली है। हाँ हमें वो आदत नहीं कि क्लीन चिट की तख़्ती को गले में लटका कर दीगर सड़क छाप नेताओं की तरह घूमें।" 

"अब जबकि आप पार्टी से निकाल दिए गये हैं..."

"नहीं, ...मैडम! अपनी राजनीतिक समझ को ज़रा अपडेट कीजिए, हम निकाले नहीं गए हैं, हम स्वत: पार्टी छोड़ के बाहर आये हैं...। आगे कहिये..."

"इसी से जुड़ा प्रश्न है कि वो कौन सी वजह थी जिससे आप पार्टी छोड़ने पर विवश हुए ...आगे आपकी रणनीति क्या होगी...? सत्ताधारी पार्टी की तरफ़ रुख़ करेंगे, या किसी छोटी पार्टी से हाथ मिलायेंगे...?" 

"देखिये न हम सत्ताधारी पार्टी में समाने जा रहे हैं न दीगर पार्टी का दामन थाम रहे हैं, हम अपनी ख़ुद की पार्टी, ख़ुद का ख़ेमा, ख़ुद का संगठन तैयार करके अपनी छोड़ी हुई पार्टी को बता देना चाहते हैं कि उन्होंने हमें कमतर आँकने में जल्दबाज़ी की। जल्द हम अपनी सरकार बना लेंगे..."

"माना, आप सरकार बना लेने का दावा करते हैं लेकिन इलेक्शन तो अभी साल भर दूर है।"

"तब तक हम अपने संगठन को मज़बूत करने, पार्टी के सिम्बल, घोषणा पत्र पर काम करेंगे। गाँवों का दौरा कर जन जागरण किसानों की स्थिति और शौचालय की सुविधा पर डाटा इकठ्ठा करेंगे।" 

"सर जी, ये बीच में शौचालय कहाँ से आ गया....?"

"मैं ऑफ़ द रिकार्ड पूछ रहा हूँ ...आप इस्तेमाल नहीं करतीं...? यही नया सेक्टर है आप देखिएगा ठेकेदार, सरपंच इसी लफड़े में लिपटे हुए मिलेंगे? हम उन खुले में शौच जाने वालों को उनका हक़ दिलाने का आन्दोलन करेंगे।"

"सर जी, आप इसके बदले दारू बंदी पर जनमत करते तो ज़्यादा फ़ायदा होता...?"

"मैडम जी मैं फिर ऑफ़ द रिकार्ड हो रहा हूँ... ये जुमला पढ़ने-सुनने में अच्छा लगता है। इसे प्रैक्टिकल में लाना मुश्किल है। आप जानती हैं नब्बे प्रतिशत कार्यकर्ता दारुखोर होते हैं उनका मनोबल आरंभ से तोड़ दें तो पार्टी दफ़्तर में ताला लगाने की नौबत आन पड़ेगी। अघोषित तौर पर ये बता दूँ कि ठीक इलेक्शन के दो दिन पहले पार्टी अपनी दारू नीति का एलान करेगी। माताओं-बहनों को राहत देने के नाम पर राज में शराबबंदी पार्टी रुख़ का एलान किया जाएगा। आप अपनी तरफ़दार हैं इसलिए ये राज़ की बात आप तक रहे तो अच्छा है।" 

"आपने पार्टी का नाम सोचा है..."

"ज़रूर! पहले प्रदेश का नाम रहेगा, फिर जिस पार्टी को छोड़ रहे हैं उसका नाम आयेगा। आजकल "आप",  "हम" का बोलबाला है, समाजवादी, आदिवासी, परित्यक्त तबक़ों का नाम रखना भी ज़रूरी है सो यही सब के घालमेल पर विचार मंथन चल रहा है।"

"आप एक नई पार्टी का गठन करने जा रहे हैं, जनता आपसे पूछेगी घोषणा-पत्र कहाँ है? जागरूक मतदाता तो बिना किसी घोषणा-पत्र के सदन में जाने नहीं देगा?"

"अपने स्टेट में जहाँ एक ओर प्रबुद्ध शरीफ़ मतदाता हैं तो दूसरी तरफ़ उँगलियों में गिनने लायक़ ही सही, चिड़ीमार, बटेरबाज़, उठाईगीर, कबाड़िये, सुपारी-किल्लर बहुतायत से भरे पड़े हैं। इन्हीं सब को मद्दे-नज़र रखते हुए बहुत अनुसन्धान करके हमारी पार्टी ने इत्मीनान से घोषणा-पत्र तैयार किया है। एंटी हीरो टेक्नीक पर, मतदाताओं को धिक्कारने वाला, इस क़िस्म का घोषणापत्र अजूबा है मगर हमारे आईआईटी पास सलाहकार ने यही सुझाया है। प्वाइंट वाइज़ आप भी ग़ौर फरमाएँ;

जनता को एक रुपये में मिलने वाला अनाज बंद:

"आप पूछेंगे... क्यों?

"भाई साहब, देखिये रुपये किलो अनाज पाकर लोग निकम्मे हो गए हैं। खेतों में काम के वास्ते मज़दूरों का अकाल पड़ गया है। दूसरी जगह के मज़दूर आ-आ कर झुग्गियाँ तानने लगे हैं। कल मतदाता बनेंगे। बेजा कब्ज़े की ज़मीन में हक़ जतायेंगे। रुपया किलो का खाना मिले तो मज़दूरी से, कमाई गई रक़म आमदनी, "पीने" में खप जाती है।
 
"पीने से लिवर ख़राब होता है" का क़िस्सा अस्सी के दशक़ की फ़िल्म में, लम्बू जी ने बख़ूबी बयान किया है। "पीने के बाद के साइड इफ़ेक्ट", मसलन चोरी, डकैती रेप-शेप के मामलों में कमी आ जायेगी। थानेदारों को बेवड़ों के बीच बीज़ी रहना नहीं पड़ेगा। वे आराम से मंत्री जी की, संत्री ड्यूटी निभा सकते हैं?" 

स्कूल में मध्यान-भोजन निरस्त:

"आप पूछेंगे ऐसा क्यों? 

"देखिये, हम मास्टर जी की छड़ी खा-खा के पढ़े हैं। न घर में, न स्कूल में, कहाँ मिलता था खाने को? फिर भी पढ़ लिए। अच्छे से पढ़ लिए। गिनती, पहाड़ा, अद्धा-पौना, इमला, ब्याज, महाजनी, लाभ-हानि सब कुछ पाँचवी क्लास तक सीखा देते थे बिना मध्याह्न वाले स्कूलों के मास्टर जी। बिना केलकुलेटर-कंप्यूटर के, दिमाग़ चाचा चौधरी माफ़िक फ़ास्ट चलता था।

आज, मध्याह्न भोजन खाने वालों को "पाव, अद्धा-पौना" जैसे पहाड़े की पूछो तो नानी की नानी याद आ जाती है। हाँ ये ज़रूर है कि स्कूल से निकलते ही मास्टर जी सहित इन बच्चों को क्वाटर, पाव-अद्धा की फ़िकर सताने लगती है।
 
सरकार ने सुविधा के लिए स्कूलों-मंदिरों के नज़दीक बहुत से "रुग्णालय" खोल रखे हैं। 

खड़ूस मतदाताओ! आपकी सुविधा के लिए हमारी योजना है कि हम ट्रांसपोर्ट-आवागमन को मुफ़्त कर दें। सरकारी ख़ज़ाने में सब्सीडी के बतौर पैसा ही पैसा है। 

सरकारें लुटाती हैं। आप एक जगह से दूसरी जगह जाने में कार-मोटर सायकल में बेजा पेट्रोल फूँक रहे हैं। भारी क़ीमतें देकर बाहर से इन्हें मँगवाना पड़ता है। शहर में न कारें चलेंगी न स्कूटर-मोटर-सायकल, ईंधन की भारी बचत। ट्रैफ़िक समस्या का तुरंत निजात। 

पूँजी-पति मतदाताओ, आपसे कुछ कहना बेकार है। आप किसी की नहीं सुनते। अपना कैंडिडेट आप छुपे तौर पे खड़े किये रहते हो। पैसा फेंकते हो, तमाशा देखते हो। जीते तो वाह-वाह, नहीं तो जो जीता वही सिकंदर। चढ़ावा-चढ़ाने का नया सेंटर चालू हो जाता है। आपकी ज़िद के आड़े हमारी पार्टी आयेगी, बता दिए रहता हूँ? ताक़त लगा देना हमें हारने में... नहीं तो...। ख़ैर! अनाप-शनाप कहने पर, आयोग मुझे धर लेगा, खुल्लम-खुल्ला क्या बोलूँ?

ग़रीब मतदाताओ। घबराने का नइ...? बिकने का नइ ...डरने का नइ...पी के बहकने का नइ....। जब होश में रहने का टाइम आता है, तो तुम सब बे-होश होने का नाटक क्यों करते हो? किसी के खरीदे गुलाम क्यों हो जाते हो? कहाँ मर जाती है तुम्हारी अंतरात्मा? कहाँ बिक जाता है तुम्हारा ईमान ..? 

एक दिन के पीने का इन्तिज़ाम, एक कंबल या एक साड़ी, हज़ार-पाँच सौ के नोट ...

बस यहीं तक है तुम्हारा प्रजातंत्र? 

धिक्कार है तुम्हें और तुम्हारे ईमान को!"

मैं पसीने से लथ-पथ, अपने बिस्तर में, सोते से जाग जाता हूँ! 

आस-पास बिखरे काग़ज़ों में ढूँढता हूँ, कहीं सचमुच मैंने कोई घोषणा पत्र जारी करने का "अपराध" तो नहीं किया? 
 

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