सुंदरता

01-06-2026

सुंदरता

सुभाष चन्द्र लखेड़ा (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

सुबह का वक़्त था। दार्जिलिंग में मॉल रोड के किनारे एक बेंच पर बैठकर मुंबई से आया आलोक ठीक सामने बर्फ़ से ढके कंचनजंघा पर्वत के नयनाभिराम दृश्य देख रहा था। तभी उसकी निगाह नीचे पगडंडी से ऊपर आते स्थानीय युवक गोपी गुरंग पर पड़ी। 

पास आकर गोपी ने पूछा, “साब, आप इधर अकेले बैठे क्या कर रहे हैं?” 

आलोक ने कहा, “सामने देखो; सूरज की रोशनी में कंचनजंघा कितना ख़ूबसूरत लग रहा है?” 

वह तपाक से बोला, “साब! आप किस ख़ूबसूरती की बात कर रहे हैं? मैं तो जबसे पैदा हुआ, इसे ऐसा ही देख रहा हूँ।” 

गोपी का जवाब सुनकर उस दिन आलोक सुकरात के शिष्य और अरस्तु के गुरु प्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटो द्वारा ईसा से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व कही इस बात का अर्थ पहली बार समझा कि ”सुंदरता देखने वाले की आँखों में होती है।” 

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