राख के बाद

01-02-2026

राख के बाद

सुभाष चन्द्र लखेड़ा (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

वर्ष 2137 लेकिन धरती अब भी जल रही थी; आग से नहीं बल्कि परमाणु युद्ध के दौरान उत्सर्जित अवशिष्ट विकिरण से। तीसरे विश्वयुद्ध को बीते चौंतीस वर्ष हो चुके थे और आकाश अब कोई नीला नहीं था। उसने अपना रंग खो दिया था, जैसे किसी ने उसके ऊपर राख का पर्दा डाल दिया हो। 

माया “न्यूरॉन-आर्काइव” की अंतिम अभियंता थी। यह वही नेटवर्क था जिसने युद्ध से पहले मानव चेतना को डिजिटल रूप में सहेजने का प्रयास किया था। जहाँ कभी महानगर की चमक थी, वहाँ अब वह एक अकेले सर्वर के नीचे बैठी थी। मशीन की हल्की ध्वनि में उसे धड़कन जैसी अनुभूति होती थी—कभी उसकी, कभी इस मशीन की, उसे यह फ़र्क़ समझ नहीं आता था। 

“अगर ये फ़ाइलें बच गईं,” उसने सोचा, “तो शायद मानवता फिर जन्म ले सके।” 

बाहर, हवा में लोहे और बर्फ़ की गंध मिल गई थी। कोई पेड़ नहीं, कोई चिड़िया नहीं; बस बिना शरीर वाले ड्रोन हवा में गश्त कर रहे थे। उनकी अपनी कोई चेतना नहीं थी, वे तो युद्ध के प्रोटोकॉल को फ़ॉलो करते हुए अब भी ‘शत्रु’ खोज रहे थे। 

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