क़ुदरत का क्रोध

01-02-2026

क़ुदरत का क्रोध

सुभाष चन्द्र लखेड़ा (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

वर्ष 2098 में पृथ्वी अपने इतिहास के सबसे ऊँचे औसत तापमान 48.6°C पर पहुँच चुकी थी। पिछले सौ वर्षों में वैश्विक औसत तापमान में 3.7°C की वृद्धि ने पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित कर दिया था। 

ग्लेशियर लगातार पिघल रहे थे; नासा के ऑर्बिटल सेंसर “क्रायोसैट-12” ने रिपोर्ट दी थी कि हिमालय की स्थायी बर्फ़़ की परत का 92 प्रतिशत हिस्सा जल में परिवर्तित हो चुका है। 

उष्ण देशों में रहना असंभव हो गया था। खेत सूख चुके थे, नदियाँ भाप बन चुकी थीं, और भोजन का उत्पादन आधे से भी कम रह गया था। जब पानी हथियार बन गया, तो सीमाएँ खो गईं। धरती पर युद्ध अब ज़मीन के लिए नहीं, जल के लिए होने लगा। 

फिर वही हुआ जिससे सब डरते थे—तीसरा विश्व युद्ध। 

वर्ष 2103 के मई महीने में यूरोप से उठी एक चिंगारी पंद्रह दिन में पूरी दुनिया को जला गई। और उसके अगले पंद्रह दिनों में, वह दुनिया ही नहीं बची जिसकी रक्षा में इंसान लड़ रहे थे। तीन-चौथाई मानवता परमाणु आग में झुलसकर समाप्त हो गई। बाक़ी बचे लोग विकिरण से त्रस्त, जीवन और मौत के बीच भटक रहे थे। 

पृथ्वी अब मौन थी। हवा में हर ओर बस बारूद की गंध थी। कहीं कोई संगीत नहीं; सिर्फ़ पछतावे की करुण ध्वनि। क़ुदरत जैसे कह रही थी: “जब इंसान ने मुझे बाँटना चाहा, मैंने उसे याद दिलाया कि मैं बिना बाँटे भी सबका अंत कर सकती हूँ।” 

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