गृहलक्ष्मी

01-06-2026

गृहलक्ष्मी

सुभाष चन्द्र लखेड़ा (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

उस घर में आज की सुबह पहले जैसी नज़र नहीं आ रही थी। कल तक पचपन वर्षीया जानकी जी सुबह छह बजे उठकर परिवार के लिए चाय बनाती थी। सात बजे उनकी उन्नीस वर्षीया बेटी ऊर्मि उनके साथ किचन में नाश्ते के लिए आटा गूँधने के बाद सब्ज़ी काटती थी। इस बीच जानकी जी चाय के कप-प्लेट धो-पोंछ कर एक ओर रख देती थी। उधर इस दौरान उनके पति गंगा प्रसाद जी चाय पीकर बरामदे में झाड़ू लगाकर अख़बार पढ़ने लगते थे। चाय पीने के बाद उनका बेटा अशोक छत पर गमलों में पौधों को पानी देने के बाद रजाइयों और तकियों को सलीक़े से वापस उस बड़े संदूक के हवाले कर देता था जिसे वह वर्षों से बड़े कमरे के उस कोने में देखता आया है। ख़ैर, आज गंगा प्रसाद जी सीधे अख़बार पढ़ने लगे थे और जानकी जी स्नान कर रही थी। ऊर्मि सोयी हुई थी और अशोक छत पर पौधों को पानी देने के बजाय बालों में
कंघी कर रहा था। 

दरअसल, कल तक ये सब जो भी घरेलू काम करते थे, आज से इन सबकी छुट्टी क्योंकि दो दिन पहले अशोक का विवाह जिस लड़की शोभा से हुआ, आज से ये सभी काम उसी गृहलक्ष्मी को करने हैं। 

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