शबे हयात को हम महवेयार कर लेंगे 

01-01-2026

शबे हयात को हम महवेयार कर लेंगे 

डॉ. शोभा श्रीवास्तव (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

1212    11 22    1212    22

 

शबे हयात को हम महवेयार कर लेंगे 
तिरे ख़याल को हम गमगुसार कर लेंगे 
 
ज़रा निगाह से छू लो जो तुम फ़जाओं को, 
तो हम ख़िजाओं को फ़स्ले बहार कर लेंगे 
 
कभी बेताब दिखो इश्क़ में सनम तुम भी, 
भला कब तक हमीं दिल बेक़रार कर लेंगे 
 
मिरी ग़ज़ल में तिरा हुस्न यूँ समाया है, 
सरे आलम को हम नग़्मा निगार कर लेंगे 
 
क़मर मिले न मिले हम कहाँ हैं कम “शोभा”
कि आसमान को ज़िद में शुमार कर लेंगे 
 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

ग़ज़ल
सजल
गीत-नवगीत
कविता
किशोर साहित्य कविता
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
नज़्म
कविता-मुक्तक
दोहे
सामाजिक आलेख
रचना समीक्षा
साहित्यिक आलेख
बाल साहित्य कविता
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में