दिल तो है चाक शार के मारे

01-04-2025

दिल तो है चाक शार के मारे

डॉ. शोभा श्रीवास्तव (अंक: 274, अप्रैल प्रथम, 2025 में प्रकाशित)

 

बहर: ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़बून महज़ूफ़ मक़तू
अरकान: फ़ाएलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
तक़्तीअ: 2122    1212    22
 
दिल तो है चाक शार के मारे
बारहा तुझ से रार के मारे
 
बे-वफ़ाई नसीब में शामिल
बेहया तेरे ज़ार के मारे
 
गुल तिरी जुल्फ़ में लगा देता
पर मैं बेबस हूँ ख़ार के मारे 
 
बोझ बच्चे को तुम न दो इतना
टूट जाए न भार के मारे
 
शाम सिमटी हुई किताबों सी
वो है दिलकश बयार के मारे
 
तोड़कर दिल गया वो है जब से
नींद आई न ख़्वार के मारे
 
फिर कभी वो नहीं दिखा'शोभा'
प्यार में अपनी हार के मारे
 
चाक=विदीर्ण, छलनी, फटा हुआ 
शार=तकरार, झगड़ा, बदी, उपद्रव, फूट
बारहा=बार-बार, प्रायः, बहुधा 
रार=लड़ाई, झगड़ा, टंटा, हुज्जत
ज़ार=अशक्त, हानिकर 
ख़ार=काँटा, फाँस
बयार=हवा का हल्का धीमा ठंडा झोंका
ख़्वार=अपमान, तिरस्कार, निष्फल मेहनत

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

ग़ज़ल
सजल
गीत-नवगीत
कविता
किशोर साहित्य कविता
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
नज़्म
कविता-मुक्तक
दोहे
सामाजिक आलेख
रचना समीक्षा
साहित्यिक आलेख
बाल साहित्य कविता
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में