नाम इतना है उनकी अज़मत का
डॉ. शोभा श्रीवास्तव
बहर: ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़बून महज़ूफ़ मक़तू
अरकान: फ़ाएलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
तक़्तीअ: 2122 1212 22
नाम इतना है उनकी अज़मत का
शौक़ दिल को है अब तो क़ुरबत का
बज़्म में आप जो नहीं आए
रंग निखरा न मेरी शिरकत का
ये ग़ज़ल आपकी नज़र कर दूँ
ग़र इशारा हो मुझको हज़रत का
शाम इठला के मुझसे कहती है
दौर अब आ गया लो उल्फ़त का
तुम ग़वारा करो जो दिल मेरा
ख़्वाब सच कर दूँ मैं तो जन्नत का
अब तो मैं सिर्फ रब के दम से हूँ
है मुहाफ़िज वही निज़ामत का
मैं तो मसरूफ़ हूँ बहुत ‘शोभा’
प्यार है काम लम्बी फ़ुर्सत का
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