इंटरनेशनल स्कूल
दिलीप कुमार
तो मसला ये है साहिबान कि बड़ी मन्नतों से पैदा हुई हमारी औलाद को हमने सोचा कि वर्ल्ड सिटीज़न बनाया जाए ताकि हमारा बच्चा इंटरनेशल लेवल की क़ाबिलियत हासिल कर सके। इंटरनेशनल होने के लिये दो ही विकल्प हैं या तो इंसान के पास बाप द्वारा छोड़ी गई ख़ूब इफ़रात अमेरिकी डॉलर हो जो कि इंटरनेशनल करेंसी है या फिर इंटरनेशनल लेवल की पढ़ाई-लिखाई की क़ाबिलियत हो जो कि इंटरनेशनल स्कूल में पढ़कर ही मिल सकती है।
यही सब सोच कर हम दर्जा एक में ही अपनी बेटी का नाम लिखाने शहर के एक इंटरनेशनल स्कूल में पहुँचे, जो कि हमारे घर से काफ़ी दूर था। पहले तो गेट पर तैनात बाउंसर टाइप संतरी ने हर तरह से मेटल डिटेक्टर लगाकर जाँच की और हमें सख़्ती से ढेर सारे इंस्ट्रक्शन दिए और यह जतलाया कि हमें अंदर जाने दे रहे हैं तो बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं। संतरी ने ख़ुद को सिक्योरिटी ऑफ़िसर बताया मुझे वार्निंग देते हुए कहा, “यहाँ पर चप्पे-चप्पे पर कैमरे लगे हैं। हर चीज़ की रिकार्डिंग और मॉनीटरिंग हो रही है। मोबाइल का इस्तेमाल आप सिर्फ़ फ़ीस पेमेंट के लिये कर सकते हैं। स्कूल में कहीं भी फोटो खींचने, रिकार्डिंग करने या किसी बाहरी को काल करना हरगिज़ अलाउड नहीं है। इसलिये कोई ग़लती या मिस एडवेंचर करने की कोशिश मत करिएगा। हर रूल्स और इंस्ट्रक्शन को फ़ॉलो करना होगा, वरना हम स्कूल के अंदर कोई भी एक्शन ले सकते हैं और किसी भी लेवल तक जा सकते हैं। हमें पूरी अथारिटी है। सो बी केयरफुल।”
उनकी धमकी-चेतावनी से सहमे हुए हम पति-पत्नी और बिटिया स्कूल के अंदर पहुँचे। वहाँ कई हट्टे-कट्टे बाउंसरों और लेडी कमांडों की भाँति महिलाओं की पूछताछ और जाँच पड़ताल से गुज़रते हुए हम एडमिशन रूम में पहुँचे। वहाँ पर सबसे पहले बैठी महिला ने कहा, “आप पहले हमारे स्कूल का ऐप डॉउनलोड कर लीजिये। उसे अपने यूपीआई एकाउंट से कनेक्ट कर लीजिये। हमारा स्कूल बहुत हाई स्टैंडर्ड का है। यहाँ बहुत से लोग एडमिशन की क्वेरी के लिये आते हैं। सबकी हैसियत नहीं होती यहाँ स्कूल में एडमिशन लेने की। और हम ऐसे-किसी ऐरे-ग़ैरे को एडमिशन भी नहीं दे देते।”
उनकी बात से मुझे बहुत ठेस पहुँची कि यह मुँह पर ही मुझे ऐरा-ग़ैरा कह रही है। फिर भी अपना संशय दूर करने के लिये मैंने उसके मन्तव्य को कन्फ़र्म करना चाहा और पूछा, “क्या मतलब है आपका”?
उसने कहा, “हमारे स्कूल में कुछ भी फ़्री नहीं है। यहाँ तक की क्वेरी भी नहीं। अगर डिटेल में आपको स्कूल और अपने बच्चे के सेशन के बारे में जानना-समझना है तो छह सौ रुपये पेमेंट करने होंगे। तब एक एक्ज़ीक्यूटिव पंद्रह मिनट का टाइम आपको देगा। उतने टाइम में जो भी आप स्कूल से रिलेटेड जानना-पूछना चाहें तो हर क़िस्म की क्वेरी कर सकते हैं।”
“उसी में एडमिशन कन्फ़र्म हो जायेगा। या कोई फ़ॉर्म वग़ैरह भी भरना पड़ेगा?” मैंने अपनी जिज्ञासा रखी।
“क्वेरी सेशन में जब आप डिसाइड कर लेंगे कि एडमिशन लेना है आपको रजिस्ट्रेशन कराना पड़ेगा। रजिस्ट्रेशन के लिये क्या-क्या डाक्यूमेंट लगेंगे यह आपको हमारा एक्ज़ीक्यूटिव बता देगा। आपको रजिस्ट्रेशन की एक हज़ार रुपये फ़ीस देनी होगी। फ़ीस कन्फ़र्मेशन होने के बाद हमारे ऐप पर आपको डॉक्युमेंट्स अपलोड करने होंगे। आप जब डॉक्युमेंट्स अपलोड कर देंगे तब हमारा ऑफ़िस डिसाइड करेगा कि आपको स्कूल का एडमिशन फ़ॉर्म दिया जाए या नहीं।”
“जी पढ़ना मुझे नहीं है बल्कि मेरी बच्ची को है। वह तो अभी पढ़ने की पहली दहलीज़ पर है। अभी से उसे क्या डिसाइड करेंगे,” मैंने अपनी बात रखी।
उसने मुझे घूरा और फिर कड़क स्वर में कहा, “मैंने पहले ही कहा था कि हम ऐसे ही किसी ऐरे-ग़ैरे को एडमिशन नहीं देते स्कूल में। हमारी एलीट ख़राब हो जाएगी। हमारी जेन्ट्री की साख ख़राब हो जाएगी। हम पहले बैकग्राउंड चेक करेंगे बच्चे का और आपका भी। आपका बच्चा एलिजबल हुआ तो भी एडमिशन की कोई गारंटी नहीं है। आख़िर एलीट औऱ जेन्ट्री का भी मामला है ये।”
अपनी हैसियत और आत्मसम्मान की खिल्ली उड़ते हुए देखकर मैं दुखी तो हुआ मगर औलाद की बेहतरी के लिये कड़वा घूँट पीते हुए मैंने इसे भी बरदाश्त कर लिया।
फ़ीस भुगतान एवं डाक्यूमेंट अपलोड के बाद हमें कहा गया कि हम स्कूल की कैंटीन में निर्णय का इंतज़ार करें। हम तीनों लोग स्कूल की कैंटीन में गए और इंतज़ार करने लगे तो हमें बताया गया कि कैंटीन में बिना खाने-पीने का ऑर्डर दिए यूँ ही टाइमपास करने की अनुमति नहीं है। इसके अलावा यह भी ताकीद की गयी कि एक बार ऑर्डर सर्व हो जाने के बाद अधिकतम एक घण्टा ही बैठने की अनुमति है। यानी हर घण्टे नया ऑर्डर। दो घण्टे के बाद मेरे मोबाइल पर काउंटर पर पहुँचने का बुलावा आया। कैंटीन छोड़ने पर मुझे साढ़े छह सौ रुपये खाने-पीने के भुगतान करने पड़े। वास्तव में यह टाइमपास का भुगतान था।
उसके बाद काउंटर पर पहुँचने पर एक अति आधुनिक महिला ने हमें बताया, “देखिये सर, हमने आपके डाक्यूमेंट्स और आपके सोशल बैकग्राउंड का एनालिसिस कर लिया है। हमें आपसे सिमपैथी है। हमने डिसाइड किया है कि आपकी हेल्प की जा सकती है।”
उसकी बात सुनकर मेरे चेहरे पर चमक आ गई। मैंने पूछ ही लिया, “यानी मेरी बच्ची को एडमिशन मिल जायेगा!”
“जी नहीं, एडमिशन अभी कन्फ़र्म नहीं हुआ है। हाँ आपको एडमिशन फ़ॉर्म दे रहे हैं। स्टुडेंट का एक टेस्ट-कम-इंटरव्यू होगा। यह पंद्रह मिनट का होगा। उसी के बाद एडमिशन पर कोई फ़ाइनल डिसीज़न होगा। उसके लिये आपको स्कूल के ऐप पर एक हज़ार रुपये जमा करने होंगे। जल्दी डिसाइड कीजिये। हमारे पास बहुत से कंडीडेट इन वेटिंग हैं,” उसने उकताहट भरे स्वर में कहा।
मरता क्या न करता। पैसे जमा किये और बच्ची को अंदर भेजा और अपने देवता-पितरों को सुमिरने लगा।
कोई आधे घण्टे बाद मेरी बच्ची चॉकलेट लेकर हँसती-मुस्कुराती हुई निकली। उस देखकर हमें तसल्ली हुई और उम्मीद बँधी कि अब शायद कुछ अच्छा हो।
बच्ची तो ख़ुश नज़र आ रही थी मगर थोड़ी देर बाद एक बाउंसर नुमा एक्ज़ीक्यूटिव हमारे पास आया और मुझे एक किनारे ले जाते हुए बोला, “आपके लिये एक गुड न्यूज़ है। लेकिन एडमिशन में अभी भी एक प्रॉब्लम है।”
उसकी बात सुनकर मेरा दिल धक्क से हो गया। उसने मेरे डर को भाँपते हुए कहा, “देखिए आपकी बच्ची पढ़ने में तो ठीक है। वह हमारे स्कूल में पढ़ने के लिये तो एलिजिबल है लेकिन प्रॉब्लम यह है कि ये एक प्योर इंटरनेशनल स्कूल है। यहाँ प्योर और अमेरिकन एक्सेंट की इंग्लिश बोली जाती है। जो कि आपकी बच्ची को नहीं आती। इंग्लिश कल्चर, मैनर्स, एटीकेट भी सिखाने पड़ेंगे आपकी बच्ची को। तभी वह क्लास में बाक़ी बच्चों के साथ बैठ पाएगी। हम उसे ऐसे ही क्लास में बैठने की परमिशन नहीं दे सकते, नहीं तो हमारे स्कूल की जेन्ट्री ख़राब हो जाएगी। मेरी बात समझे आप?”
मैंने उसकी बात को समझने की कोशिश की। कुछ-कुछ समझा भी लेकिन अंत में हथियार डालते हुए मैंने कहा, “आप कहना क्या चाहते हैं? जो कहना है साफ़ कहिए। अब मेरी बच्ची का दाख़िला इस स्कूल में हो सकता है या नहीं? और अगर हो सकता है तो मुझे और क्या करना होगा?”
उसके चेहरे की रंगत बदल गई और उसने मुझे ध्यान से देखते हुए कहा, “एडमिशन हो सकता है आपकी बच्ची का। वह एलिजिबल है। मगर क्लास में बाक़ी बच्चों के साथ बराबरी पर लाने के लिये हमें उसको एक स्पेशल प्रिपरेशन कोर्स कराना पड़ेगा। हम आपके जैसे बैकग्राउंड वाले बच्चों को यह कोर्स करवा कर ही क्लास में बाक़ी बच्चों के साथ बैठाते हैं ताकि हमारा इंटरनेशनल स्टैण्डर्ड कम्प्रोमाइज़ न हो। सो आपकी बच्ची को एक महीने पप्रेटरी क्लास में ट्रेंड करेंगे फिर उसे एडमिशन देंगे अपनी एक्चुअल क्लास में। उसके लिये आपको दस हज़ार रुपये डिपाज़िट करने होंगे ऐप से। और हाँ एक बात का ख़्याल रखियेगा यह दस हज़ार रुपये आपके मेन कोर्स की फ़ीस से अलग होंगे,” उसने सधे हुए स्वर में कहा।
मुझे कोई ख़ास हैरानी नहीं हुई। मैं ऐसे ही कुछ और रुपयों की पेनाल्टी की उम्मीद कर ही रहा था और हक़ीक़तन वही हुआ भी।
“तो फिर मेन कोर्स फ़ीस क्या होगी?” मैंने भी आर-पार लड़ने की नीयत से पूछा।
“एनुअल टयूशन फ़ीस पचहत्तर हज़ार, पैंतीस, पच्चीस और पंद्रह हज़ार की तीन तिमाही किश्तों में देनी होगी। बुक्स के बीस हज़ार, यूनिफ़ॉर्म का पंद्रह हज़ार औऱ ट्रांसपोर्ट का सालाना पचास हज़ार। स्कूल टाइम एट थर्टी से थ्री थर्टी रहेगा।”
सब जोड़-गाँठ कर मैंने सोचा कि इतने में तो मेरा कचमूर निकल जायेगा। फिर भी हिम्मत करके मैंने उससे पूछा, “बस इतना ही या और कोई फ़ीस मुझे देनी होगी?”
“जी नहीं। एक रुपये की एक्स्ट्रा फ़ीस आपको नहीं देनी है। हम दूसरे स्कूलों की तरह कोई हिडेन फ़ीस नहीं लेते। फ़ीस आपको और कुछ नहीं देनी है,” उसने मुझे आश्वस्त किया।
उसकी बात सुनकर मैंने चैन की साँस ली।
“मगर पचास हज़ार रुपये का डोनेशन देना होगा। यह स्कूल का डेवलपमेंट चार्ज है। हमें स्टेटस मेंटेन करनी होती है और आपका बच्चा इस स्कूल में पढ़ेगा तो आपकी भी तो स्टेटस बढ़ेगी ना। डोनेशन आपको वन टाइम और एडवांस देना पड़ेगा। आख़िर यह इंटरनेशनल स्कूल है एलीट क्लास के लिये है। ऐरे-ग़ैरों के लिये नहीं। यू अंडरस्टैंड व्हाट आई मीन टू से।”
ये कहकर वह मेरी तरफ़ देखकर कुटिलता से हँसा। उसकी ख़र्चीली हँसी देखकर मेरा रोने का दिल करने लगा।
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