पीर पराई
दिलीप कुमार
सावन के महीने में खतौली क़स्बे से गुज़र कर काँवड़ियों का बहुत बड़ा हुजूम हरिद्वार की तरफ़ जाता था।रास्ते में काँवड़ियों के नाश्ते, भोजन, आराम के इंतज़ाम गाँव के लोग अकेले या समहू में कर रहे थे।
गाँव में सड़क के किनारे ही अरुणा का घर था, वो एक बड़े नर्सिंग होम में नौकरी करती थी मगर बेहद मामूली तनख़्वाह पर। काम इज़्ज़त का था मगर नर्सिंग होंम का एक कल्चर होता है। जिसमें दिखाई तो सब कुछ समृद्ध देता है मगर सेलरी नाम की ही देते हैं।
छुट्टियों में अरुणा की बड़ी बहन नीलम भी दो बच्चों के साथ में काँवड़ का पर्व मनाने मायके आई थी।
दूर-दराज़ से शिव भक्त प्रार्थनाएँ करते हुए हरिद्वार जा रहे थे जहाँ से गंगाजल लेकर उन्हें शिवजी को चढ़ाना था। किसी को नौकरी, किसी को संतान, किसी को मनपसंद विवाह तो कोई ये मन्नत माँगने जा रहा था कि उसके खेतों से हाइवे या राजमार्ग निकल जाए ताकि उसके ज़मीनों की क़ीमत आसमान छू ले।
चारों तरफ़ काँवड़ियों का हुजूम दिखाई पड़ता था और “बोल बम”, “बम भोले”, “हर-हर महादेव” की गूँज सुनाई देती थी।
अरुणा की बड़ी बहन नीलम के पति और बच्चों के साथ मायके आने से घर का बजट थोड़ा सा और तंग हो गया था। क्योंकि उस घर की आमदनी इतनी ही थी कि किसी से माँगना न पड़े और किसी को कुछ दे पाने की हैसियत में तो वो लोग बिल्कुल न थे। लेकिन मनुष्य की संवेदना कब उसे बैठने देती है फिर चाहे वह सकारात्मक हो नकारात्मक।
अरुणा और नीलम ने काँवड़ियों की ज़रूरतों का जायज़ा लेने के लिये गाँव के बाहर का एक चक्कर लगाया, वहाँ भोजन, आराम के बेहद इफ़रात इंतज़ाम थे।
उन्होंने सरकारी स्टालों और धर्मार्थ स्टालों पर भी देखा, लेकिन वहाँ पर कहीं भी ऐसी दवाइयों के इंतज़ाम नहीं थे जिनकी बेहद ज़रूरत थी, और अगर दवाइयाँ भी तो सिर्फ़ नाम मात्र की।
अरुणा और नीलम लौट आईं। दोनों बहनों के हाथ तंग थे, मगर मन में कहीं-न-कहीं एक कसमसाहट थी।
उन दोनों के हाथ में लिस्ट थी जिसमें घर और बाहर के काँवड़ियों के खाने-पीने का ज़रूरी सामान उन्हें लाना था।
अरुणा ने कहा, “दीदी, क्या कहती हो, वही करें हम जो हमारा मन कह रहा है या वो करें जो गाँव वाले करते हैं। अगर हम अपने हिसाब से चलेंगे तो गाँव वाले ताना देंगे कि हमने धर्म का काम नहीं किया।”
नीलम ने कहा, “अरुणा, पेट भरने के तो सभी इंतज़ाम किए दे रहे हैं और काँवड़ियों के आराम की भी व्यवस्था है। मगर बेहद तकलीफ़ उठा कर ये काँवड़िये कोसों पैदल चल कर जा रहे हैं, इनके पैरों में इतनी सूजन, छीलन और घाव हैं। ऐसी दवाइयाँ न तो स्टाल पर हैं और हैं भी तो उन्हें कोई काँवड़ियों के पाँवों में लगाने वाला नहीं है। तुम अपनी नर्सिंग की जानकारी का इस्तेमाल इन काँवड़ियों की सेवा पर क्यों नहीं करती? इलाज तुम करो, इलाज में मदद और सेवा मैं भी करूँगी।”
अरुणा ने सहमति से सिर हिलाया। दोनों बहनों ने खाने-पीने के सामान की लिस्ट फाड़ दी और वो दोनों बाज़ार से मलहम-पट्टी, डेटॉल ख़रीद लाईं।
ढेर सारे खाने और आराम करने के स्टालों के बीच उन्होंने भी अपना एक स्टाल लगाया जिसमें वो थके, घायल लोगों की मलहम-पट्टी और सेवा-टहल करने लगीं। उनके सामान कम पड़ने लगे थे मगर काँवड़ियों का ताँता नहीं टूट रहा था उनके स्टाल पर। थके-हारे घायल काँवड़ियों की सेवा ही उनके लिये सच्ची शिव भक्ति थी। काँवड़ियों के पाँव धुलवाते, उनकी मलहम पट्टी करने से उनकी आत्मा में एक अजीब क़िस्म की तृप्ति भर रही थी।
गाँव के लोग भौचक्के हो कर उनके स्टाल को देख रहे थे। पराई पीर को हरने के बाद जब वो दोनों काँवड़ियों को विदा करती तो बोलतीं “हर-हर महादेव” स्टाल छोड़कर जाते हुए काँवड़िये भी उनसे कहते “हर-हर महादेव।”
अरुणा मल्हम पट्टी करती हुए गाती, “वैष्णव जन तो तेने कहिये पीर पराई जाने रे”।
तो नीलम भी आगे का अंतरा गाती उसके बाद दोनों बहनें खिलखिलाकर हँस पड़तीं, उन्हें हँसता देखकर उनके स्टाल के घायल और थके हुए काँवड़िये भी मुस्कराने लगते।
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