चंबल

दिलीप कुमार (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

इस धरती के बेटी-बेटों 
चम्बल तुमको रहा पुकार
बहुत लहुलुहान ये धरती 
सुनो ज़रा इसकी चीत्कार 
 
जब-जब देश पे आन पड़ी है 
चम्बल ने अपने लाल दिए 
प्राणों की आहुति देकर 
मातृभूमि का हवन किये 
 
बेटी-बहू जो भी चम्बल की 
बलिदानों से कभी ना डरी 
सम्मान सदा इस मिट्टी का देखा
चाहे ना उसकी माँग भरी 
 
वीरों की रही है ये धरती पावन 
जिनकी वीरता है अजब निराली 
बच्चों को यूँ माँएँ हैं पालती 
वीरों से हो ना ये धरती ख़ाली 
 
आओ फिर सब हम मिल जाएँ 
इस धरती का यूँ करें उद्धार 
पावन और महान है चम्बल 
कर ना सके कोई इसपे वार 
 
इस धरती के बेटी बेटों
चम्बल तुमको रहा पुकार

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
कहानी
स्मृति लेख
लघुकथा
बाल साहित्य कविता
सिनेमा चर्चा
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में