भर्ती

दिलीप कुमार (अंक: 290, दिसंबर द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

 

पारसनाथ बाबू अलसाये और उदास से लेटे हुए थे। हालाँकि कोई और दिन होता तो इतनी सुबह तक वो तैयार हो जाया करते थे। बरसात के महीने में बादल यहाँ-वहाँ लुका-छिपी करके निकल जाया करते थे। पछुआ हवाओं ने फ़सलों पर तो अपनी वक्रदृष्टि डाल रखी थी, साथ ही साथ बढ़ती उमस ने चरिंद-परिंद सभी को परेशान कर रखा था। 

सरकारी रूप से बाढ़-प्रभावित क्षेत्र घोषित होने के बावजूद इस साल ज़बरदस्त सूखे के आसार थे। बीती रात हो हालाँकि बारिश ज़्यादा तो नहीं हुई थी, लेकिन यहाँ-वहाँ कीचड़ नज़र आने लगा था। मन की दुश्वारियों से परेशान पारसनाथ बाबू ने उमस की तकलीफ़ सहते हुए आँखें मूँदे पडे़ रहना बेहतर समझा, मगर मक्खियों-मच्छरों की भिनभिनाहट से आजिज़ आकर उन्हें आँखें खोलनी पड़ीं। 

कमरे का सरसरी मुआयना करने पर उन्होंने पाया कि बिजली जा चुकी है और टेबल फ़ैन निष्प्राण हो चुका है। वो उठकर बैठ गये और बग़ल में सोई पड़ी अपनी पत्नी की ओर देखा। 

उनकी स्थूल काया वाली पत्नी घोड़े बेच कर सो रही थी। उनकी धर्मपत्नी यानी कांता देवी के कपड़े अस्त-व्यस्त थे, और सोते वक़्त उनकी नाक से “हुम्म-हम्म” की अजीब स्वर की स्वर लहरियाँ निकल रही थीं। 

दरअसल कांता देवी नज़ले की मरीज़ा थीं, इससे उनके श्वास के आवागमन की खरखराहट और नाक से लुढ़क आये द्रव ने उनके चेहरे की विद्रूपता और भी बढ़ा दी थी। 

पत्नी का सम्पूर्ण अवलोकन करने के पश्चात पारसनाथ बाबू न जाने क्यों चिढ़ गये और कांता देवी की तरफ़ उन्होंने पीठ कर ली। 

वे बुदबुदाये, “क्या ख़ाक शासनादेश आया है? तो मंत्री की यह घोषणा भी फ़र्ज़ी ही निकली की रात और सवेरे का टाइम बिजली की कटौती से मुक्त रहेगा। इस शासन से तो पब्लिक को सिर्फ़ घोषणाओं की घुट्टी मिली है बस। वाह रे शासनादेश।” 

“कैसा शासनादेश? क्या भर्ती पर स्टे का कोई शासनादेश आया है?”  पारसनाथ बाबू की पत्नी ने खरखराते स्वर में पूछा। 

पारसनाथ बाबू झल्लाते हुए बोले, “स्टे का नोटिस आता है, शासनादेश नहीं। जब कुछ जानती-बूझती नहीं हो तो फिर क्यों हर मामले में टाँग अड़ाती फिरती हो।” 

“जानती क्यों नहीं हूँ, क्या मैं अनपढ़ हूँ? इतना तो मुझे भी पता है कि स्टे-विस्टे क्या होता है? मैं ख़ुद मैट्रिक पास हूँ, और मेरे बप्पा भी सरकार की सेवा ज़िन्दगी भर किये हैं। इतना तो हम सब बहनें जानती-समझती हैं,” वो तुनक कर बोली। 

पारसनाथ बाबू तपाक से बोले, “तुम और तुम्हारी बहनें, हुंह . . . अब मेरा मुँह मत खुलवाओ कि किस तरह से दूसरों ने तुम लोगों की कॉपियाँ लिखीं और पैसा-कौड़ी देकर पास हो पायी थीं। अगर इतनी ही सब मेधावी थीं, तो क्यों नहीं तुम्हारी भतीजियाँ आठवीं से आगे पास हो पायीं और रही बात तुम्हारे बप्पा की तो वे चपरासी थे, डी.एम. नहीं, जो मुझ पर इतना रोब झाड़ रही हो।” 

कांता देवी को यह बात ख़ासी नागवार गुज़री थी कि पारसनाथ बाबू की इतनी हिम्मत कि वह इस मामले में वो उनके बाप को बीच में लायें। उन्हें याद नहीं पड़ता था कि इससे पहले इतनी अकड़ से पारसनाथ बाबू ने कब उनसे बात की थी? 

अपमान की पीड़ा या क्रोध की अतिरेकता के कारण उनका चेहरा लाल हो गया था। गहरे साँवले और चेचक के दागों से अटे पड़े कांता देवी के चेहरे पर नाराज़गी के भाव स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहे थे। 

मगर माहौल की नज़ाकत को भाँपते हुए क्रोधित होने के बजाय उन्होंने रोना शुरू कर दिया। हालाँकि वो “ऊं, ऊं” करके विशेष प्रकार का रुदन कर रही थीं, मगर उनके गले की खरखराहट से पारसनाथ बाबू भिन्नाते हुए बोले, “बन्द करो ये रांड-रुदन, कोई मर गया है? सुबह-सुबह बच्चे देखेंगे तो क्या कहेंगे?”

तिरिया के इस रुदन रूपी ब्रह्मास्त्र से पारसनाथ बाबू असहाय हो गये। वो जानते थे कि कांता देवी को वो जितना ही समझायेंगे, उनका रुदन उतना ही तेज़ पड़ता जायेगा। मुक़ाबला करने या हावी होने के बजाय पारसनाथ बाबू ने हथियार डाल देना मुनासिब समझा। 

वो थके स्वर में बोले, “अच्छा ठीक है, अब चुप भी करो भई। दरअसल रात को तुमने इतनी देर तक जगाये रखा। सड़क पर इतना कीचड़ था, और तुमने फ़र्ज़ी दो किलोमीटर तक चलवा दिया। चार घंटे ही सोया था, तब तक आँख खुल गई। मेरा ग़ुस्सा बिजली पर था, जो तुम पर उतर गया।” 

“तो तुम सौती (सौतन) की रिस (क्रोध) कठौती पर कर रहे हो। बिजली चली गयी तो इसमें मेरी क्या ग़लती है, और रात को बाहर जाकर न बतियाते, तो क्या यहाँ कमरे में बतियाते। बच्चे सुनते तो?” वो हुमक कर बोलीं। 

“वैसे बच्चे सुन भी लेते, तो ठीक ही होता। आख़िर उन्हें भी तो पता चलता कि उनकी मम्मी कैसी हैं?” पारसनाथ बाबू व्यंग्य से बोले। 

कांता देवी आहत स्वर में बोलीं, “फिर तुम्हारे ताने शुरू हो गये। आख़िर हमारे सामने हमारा बुढ़ापा और तुम्हारा रिटायरमेन्ट मुँह बाये खड़ा है। इन नौकरियों की भर्ती बार-बार नहीं होनी है। हमारे और भी बच्चे हैं। हमें उनके बारे में भी सोचना है। क्या ये सब मेरे ही पेट में जायेगा? तन-पेट काटकर मैं पैसा-पैसा जोड़ती हूँ, अपनी बेटियाँ के लिये ही तो। ज़िन्दा रहने के लिये दो रोटियों और दो धोतियों के अलावा मैं तुम्हारे घर से लेती ही क्या हूँ?” 

“तो अपने बाप के घर से ले आ और जब मुझसे बहस मत करो। जाकर मंजन-वंजन करो, तुम्हारे मुँह से बदबू आ रही है,” इतना कहते हुए पारसनाथ बाबू उठे और तीर की तरह कमरे से बाहर निकल गए। 
 
कांता देवी को यूँ एकाएक कमरे से पारसनाथ बाबू के चले जाने की उम्मीद नहीं थी। वो स्त्रियोचित लक्षणों से सुसज्जित फिर कोई शब्द बाण मार्मिक ढंग से चलाना चाह रही थीं, तब तक पारसनाथ बाबू चले गये। बीती रात उन दोनों प्राणियों पर बहुत भारी गुज़री थी। रात ही क्यों, पूरा हफ़्ता ही उन दोनों का अन्तर्द्वन्द्व में गुज़रा था। 

जो बात कांता देवी को वाजिब और ज़रूरी लगती थी, वही बात पारसनाथ बाबू को वाहियात और पाप लगती थी। 

इस शीतयुद्ध की शुरूआत विगत दो महीनों से हो चुकी थी। दरअसल पारसनाथ बाबू स्वास्थ्य विभाग में वरिष्ठ लिपिक थे। आजकल निदेशालय से जुडे़ हुए थे। वो एक प्राइमरी मास्टर के सुपुत्र थे। बाप ने पढ़ाई-लिखाई तो ज़्यादा नहीं कराई थी, मगर नैतिकता एवं मानवता के पाठ ख़ूब पढ़ाये थे। हालाँकि अभी इस संसार में ऐसी कोई घुट्टी नहीं बन सकी है, जो व्यक्ति को नैतिक एवं सदाचारी बना सके। बाप की मेहनत और सरल, जुझारू व्यक्तित्व के साये में पले-बढ़े पारसनाथ बाबू को रामचरितमानस का एक बड़ा हिस्सा कंठस्थ था। 

उनकी बातें एवं उद्धरण दोहों, चौपाइयों से शुरू होकर नीतिशास्त्र की बातों पर आकर समाप्त होते थे। इस युग में ऐसे मलाईदार विभाग में उनके जैसा धर्मभीरू व्यक्ति का होना कौओं की जमात में हंस के होने के माफिक था। वे परिश्रमी और ईमानदार तो थे ही, साथ में साहबों के मुँह लगे भी थे। मगर वो अपनी पहुँच और रुसूख़ को प्रायः छिपाकर रखते थे, ताकि लोग-बाग उनके ज़रिये महकमें के साहबों से अनुचित सिफ़ारशें न करवा सकें। 

सबसे ज़्यादा दबाव तो उन पर अपात्र लोगों को मेडिकल स्टोर का लाइसेंस दिलाने के बाबत होता था। मगर अपनी पत्नी से वो अपनी पहुँच को छिपा न सके, और यही बात उनके जी का जंजाल बन गया थी। 

साल के शुरूआत में जबसे चपरासियों की भर्ती की प्रक्रिया शुरू हुई थी। तब से नौकरियों में लेन-देन का खेल “खुला खेल फर्रुखाबादी” की तर्ज़ पर चला आ रहा था। साहबों की नीयत लोगों को नौकरियाँ देने की थी, और ज़ाहिर तौर पर उनसे कुछ शुकराना पाने की उम्मीद पाले बैठे थे। 

चपरासियों की भर्ती के लिये योग्यता का कोई मापदंड नहीं था। निश्चित तिथि में जितने भी फ़ॉर्म जमा हो गये, वे सभी वाजिब हक़दार थे। फ़ॉर्म में त्रुटि न हो जाये, इसलिये लोगों ने बाक़ायदा पढे़-लिखे लोगों से फ़ॉर्म भरवाये। इसी आग में घी का काम किया अफ़वाहों के ज़रिये आये उस शासनादेश ने, कि सात साल की नौकरी के बाद उच्च शिक्षित लोग बाबू बना दिये जायेंगे। 

फिर तो एम.ए., एम.एसी. वालों तक के फ़ॉर्म पड़ गये। वैसे भी आजकल के ज़माने में दस्तख़त करना और साइकिल चलाना कौन नहीं जानता? अधिकारियों की दुविधा तब और बढ़ गयी, जब चपरासी की नौकरी के लिये मंत्रियों तक के फोन आने लगे। अब ज़ाहिर तौर पर मैदान में बडे़ खिलाड़ी भी कूद चुके थे, जिन्होंने आपसी प्रतिस्पर्धा में अपनी तरफ़ से ही दस-बीस हज़ार रुपयों में प्राप्त होने वाली नौकरी का रेट डेढ़ दो लाख तक पहुँचा दिया था। 

फिर तो ये भर्ती न हुई, सेहत महकमें के जी का जंजाल हो गयी। साहबों को सूझ ही नहीं रहा था कि वे क्या करें? 

कोई पैसा लिये खड़ा, कोई सिफ़ारिश लेकर हाज़िर और बाद में कोर्ट की जवाबदेही भुगतनी पडे़गी, वो अलग 
से। 

गुज़रे बरसों में सूबे में शायद ही कोई ऐसी बड़ी सरकारी भर्ती हुई होगी, जिसे अदालत में न घसीटा गया हो। उसी मुहिम का हिस्सा बनी इस सरकारी भर्ती ने पारसनाथ बाबू की मुश्किलें बढ़ा दी थीं। पारसनाथ बाबू विभाग की ज़िम्मेदारियों से नहीं, अपितु पत्नी के दबाव से परेशान थे। 

पारसनाथ बाबू की कुल जमा छह संताने थीं। उन्हें कोई पुत्र नहीं था। माँ बाप के इकलौते पारसनाथ बाबू की पहली सन्तान उनके विवाह के अठारह वर्षों बाद पैदा हुई थी। ज़ाहिर था, कि उसकी परवरिश बडे़ लाड़-प्यार से की गयी और उसका नाम रखा गया बब्लरानी प्यार से सब बब्लरानी को “बब्बो” कहकर पुकारते थे। 

मगर ईश्वर ने संतान के लिये की गई पारसनाथ बाबू और उनकी पत्नी कांता देवी की प्रार्थना को शायद आधे-अधूरे मन से ही सुना था। क्योंकि तमाम व्रतों, उपवासों एवं पूजा-अर्चना के बाद पैदा हुई बब्बो एक मंदबुद्धि बालिका थी। 

उसकी विशेष परवरिश के हर सम्भव प्रयास किये गये, और उसी के तहत उसे पाँचवीं दर्जे के बाद स्कूल नहीं भेजा गया ये और बात थी कि उसके नाना ने किसी और लड़की को परीक्षा में बैठाकर उसे आठवीं की मार्कशीट दिला दी थी। 

लेकिन बोर्ड परीक्षा के फ़ॉर्म और प्रमाण पत्र में फोटो चस्पा किये जाने की अनिवार्यता के चलते बब्लरानी के नाना उसे मैट्रिक न पास करा सके। पूर्ण युवती बनने के पूर्व ही बब्लरानी के विवाह के प्रयास किये जाने लगे। 
काफ़ी तज्वीज़ करने के बाद ठीक बब्लरानी के जोड़ के एक लड़के से उसकी शादी तय कर दी गयी। अब तक माँ बाप के लाड़-प्यार के साये में पली-बढ़ी बब्लरानी को घर गृहस्थी क़ायदे से चलाने के लिये उसकी माँ कांता देवी ने काफ़ी अभ्यास करा दिया था। मगर इस फ़र्क़ की तासीर क्रिकेट के उस मैच के मानिंद ही था, जैसा कि अभ्यास मैच और वास्तविक मैच के बीच स्पष्ट दृष्टिगोचर हो जाती थी। 

मौंजू बात ये थी कि जिस प्रकार बब्लरानी के माँ बाप अपनी बेटी की आंशिक मंदबुद्धिता छिपा ले गये थे। वैसा ही खेल लड़के की तरफ़ से भी खेला गया। दरअसल छह बच्चों की माँ और कर्कशा कांता देवी के आगे पारसनाथ बाबू की एक न चलती थी। 

सीधे, सरल और धर्मभीरू पारसनाथ बाबू को उस कर्कश, चंचला स्त्री कांता देवी ने काफ़ी दबा रखा था। पारसनाथ बाबू बब्लरानी का विवाह पूर्ण परिपक्व हो जाने के बाद तथा ये बात बताकर करना चाहते थे कि उनकी लड़की आंशिक रूप से मंदबुद्धि है। मगर कांता देवी बब्लरानी का विवाह जल्द से जल्द तथा ये तथ्य छुपाकर करना चाहती थी कि उनकी बेटी अधपागल है। 

पारसनाथ बाबू के विरोध के बावजूद कांता ने अपने गाँव की एक सहेली के ज़रिये बब्लरानी के रिश्ते की बात चला रखी थी। 

दुलारी देवी ने पयागपुर जाकर उस लड़के देवी प्रसाद का न सिर्फ़ मुआयना किया था, बल्कि वो घंटा दो घंटा देवी प्रसाद की इलेक्ट्रॉनिक की दुकान पर बिताकर लौटी थीं। अपना परिचय दिये बग़ैर और अपना मंतव्य बताये बिना उन्होंने आस-पास के दुकानदारों से दरयाफ़्त करके इस बात की तस्दीक़ कर ली थी कि मिस्त्री से दुकानदार बने देवीप्रसाद की कमाई में उनकी बब्बो राज रजेगी। 

देवी प्रसाद शक्ल-सूरत से कुछ ख़ास नहीं दिखता था और तमाम दरयाफ़्त के बाद कांता देवी महज़ इतना पता लगा पायी थी कि पयागपुर में वो एक इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान का स्वामी था, जो शायद साझे में थी। आख़िरकार वो इस बात से मुतमईन हो ही गयी कि देवी प्रसाद ही उनकी बब्लो के लिये उचित वर है। 

अलबत्ता अपने विश्वस्त सूत्रों के ज़रिये किये गये सर्वे पर वो अपना सहेली से आश्वासन की मौखिक मुहर लगवाकर ही लौटी थीं। 

हमारे भारतवर्ष के देहात सिर्फ़ खेती-किसानी और दरिद्रता के ही नहीं परिचायक हैं, बल्कि यहाँ ठलुहाई भी बडे़ आला दर्जे की होती है। जब कांता देवी अपने दामाद की तलाश में पयागपुर के दौरे पर आयी तो देवी प्रसाद की मदद के बाबत तमाम ठलुओं ने ऐसा ताना-बाना बुना था, जिसमें कांता देवी जैसी चालाक स्त्री भी फँस गयीं। 

स्वयं को काफ़ी होशियार समझने वाली कांता देवी ने इस बाबत सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस-जिस से उन्होंने देवी प्रसाद की दुकान के बाबत दरयाफ़्त की, उन ठलुओं ने पूर्व निर्धारित योजना के तहत देवी प्रसाद की शान में ही क़सीदे गढ़े। 

आख़िर देवी प्रसाद के पक्ष में माहौल करने की एवज़ में उन्हें ज़ोरदार मांसाहारी दावत और दारू जो मिली थी। ख़ुद को काफ़ी चतुर एवं सदैव दूसरों से ज़्यादा बुद्धिमान समझने वाली कांता देवी आख़िर इस जाल में जाने-अनजाने फँस ही गयीं। 

मगर ये पोल उन पर जब तक खुलती तब तक बब्लरानी तीन बच्चों की माँ बन चुकी थीं। ये सब जानकर-बूझकर भी कांता देवी सिर्फ़ तिलमिलाकर ही रह गयी थीं, क्योंकि उनका अपना सिक्का भी तो खोटा था। वास्तव में देवी प्रसाद की पहचान एक अल्लाम गंजेड़ी की थी, और वो उस इलेक्ट्रॉनिक्स शाप का मालिक नहीं था बल्कि वहाँ सिर्फ़ नौकरी करता था। 

बड़ी होशियारी से अपनी सास के दौरे के पूर्व उसने ‘देवी इण्टर प्राइजेस’ का बोर्ड लगवाया था, और ऐसे शातिराना तरीक़े से गोटियाँ फ़िट की थीं कि उसी के ‘ठलुआ क्लब’ के लोग ही कांता देवी से मिलें उसके पक्ष में बयान दें। सबको झाँसा देने वाली कांता देवी ख़ुद एक नशेड़ी के झाँसे में आ गईं। 

बाद में देवी प्रसाद एक नकारा पति और अल्लाम नशेड़ी ही साबित हुआ था। देवी प्रसाद दिन भर गाँजा पिये धुत्त रहता था और रात भर पत्नी को हलाल करता था। धीरे-धीरे उसने बब्लरानी के सारे ज़ेवर गहने बेच डाले। 

पति और उसके ज़ुल्मोसितम तक ही बात होती तो ग़नीमत थी, मगर देवरानी और ननद के तानों ने बब्लरानी का जीना दुश्वार कर दिया था। कभी प्यार से बब्बो कही जाने वाली बब्लरानी ससुराल में प्रायः पगली के नाम से ही सम्बोधित की जाने लगी थी। 

नतीजतन पानी सर से ऊपर गुज़रता देख बब्लरानी ने अपने मासूम बच्चों सहित माँ बाप के घर में शरण ली। बब्लरानी अपने साथ सिर्फ़ संवेदनायें ही नहीं लाई थी, बल्कि तीन बच्चे भी लाई थी, जिन्हें भूख मुसलसल सताती रहती थी। 

दुख की घड़ी में वो मायके में शरण माँगने आई थी, मगर उसकी कुँवारी बहनों की नज़रें बता रही थी कि इस बार बब्लरानी का आना उन्हें रास नहीं आया था। 

बब्लरानी की बहनों के चेहरों पर चिन्ता तो बराबर नुमायाँ हुआ करती थी, मगर वो बब्लरानी के भविष्य को लेकर नहीं अपितु इस बात की थी कि बब्लरानी तीन प्राणियों समेत मुस्तकिल रूप से इस घर में रहने को आ धमकी है। 

सो बाक़ी पाँचों बहनें अब बब्लरानी से स्नेह नहीं अपितु ईर्ष्या किया करती थी। माँ की मौन-सहमति पर बहनों के बढ़ते तानों के बीच ही पिछले तीन वर्षों से बब्लरानी के दिन गुज़र रहे थे। इस दौरान देवी प्रसाद हर दस पंद्रह दिन पर आता था, मगर उसके आने-जाने से घर में किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। 

इन तीन सालों के दौरान बब्लरानी दो बार गर्भवती भी हुई। मगर उसकी माँ ने उसका गर्भपात करवा दिया। तीन पुत्रियों के बाद लड़के की आस लगाये देवी प्रसाद के लिये ये सब किसी सदमें से कम नहीं था। मगर बब्लरानी पर न अब उसका आधिपत्य रह गया था, न नियन्त्रण। 

वो पूरी तरह से अपनी माँ के बस में थी। कभी-कभार जब नशा देवी प्रसाद पर हावी नहीं होता था तब उसके अन्दर छुपे हुए पुरुष का अहं जागृत होता और वो बब्लरानी को विदा कराने की बातें भी करता था। 
 मगर कांता देवी की घुड़कियों से उसकी रूह फ़ना हो जाया करती थी। अब तक देवी प्रसाद अपने रोज़ी-रोज़गार को तिलांजलि दे चुका था। इसी दौरान चपरासियों की भर्ती भी शुरू हो गयी। 

साहबों के मुंहलगे, स्वच्छ एवं ईमानदार छवि के पारसनाथ बाबू के लिये अपने निठल्ले दामाद देवी प्रसाद को चपरासी बना देना कोई बड़ी बात न थी। वो भी बग़ैर घूस-पात के, मगर इसमें अड़चनें थी तो सिर्फ़ कांता देवी की तरफ़ से। 

उनके पहले तर्क में कुछ दम था ज़रूर, कि देवी प्रसाद नशेड़ी है। उसकी नौकरी लगवा भी दो, तो कल को उसने नौकरी छोड़ दी तो . . . ? 

इसीलिए कांता देवी का ये तर्क था कि देवी प्रसाद के बजाय ये नौकरी बब्लरानी की लगवाई जाये। मगर बब्लरानी के लिये तज्वीज़ की गयी इस नौकरी की सबसे ख़तरनाक शर्त कांता देवी ने ये लगा रखी थी कि पारसनाथ बाबू इस नौकरी के लिये देवी प्रसाद से डेढ़ लाख वसूलें। 

पहली बार जब ये प्रस्ताव दुलारी देवी ने पारसनाथ बाबू के सामने रखा था, तो वो अपना आपा तक खो बैठे थे। मगर वो जानते थे कि उनकी कर्कश पत्नी जिस बात के पीछे पड़ जाती है, उसे मनवा कर ही दम लेती है। 
 अपनी नीति का ख़ुलासा करते हुए कांता देवी यूँ तर्क देती थीं, “हमने भी तो देवी प्रसाद का दहेज़ दिया था, वो भी गिनकर पूरे एक लाख। हालाँकि उसके बाप को दिया था, मगर माना गया तो बब्लरानी के ही नामे में। फिर इस नौकरी के साथ बब्लरानी और देवी प्रसाद की पूरी गृहस्थी सेटल हो जानी थी। तब क्यों ना देवी प्रसाद से वो ये रक़म वसूलें। क्योंकि उनके और भी लड़कियाँ थी और बुढ़ापा भी सामने था। पुत्र भी तो नहीं था इसलिये बुढ़ापे में रुपया पैसा ही साथी था। सो क्यों ना इस मौक़े को कैश किया जाये।”

पारसनाथ बाबू ने कहा, “पर देवी देगा कहाँ से?”

कांता देवी ने तत्काल कहा, “जहन्नुम से लाकर देगा। नौकरी चाहिये तो खेत बेचे, बाप से क़र्ज़ा निकलवाये, वो अगर पैसे नहीं देगा तो मैं बब्लरानी को विदा नहीं करूँगी। वो भर्ती (पूँजी) लगायेगा तभी पैसे का सुख पायेगा। वरना बब्लरानी के साथ रहना उसे नसीब नहीं होगा। वैसे अगर वो पैसे नहीं देगा तो बब्लरानी को पाल हम रहे है तो उसकी तनख़्वाह कौन लेगा?” 

पारसनाथ बाबू ने चौंकते हुए पूछा, “यानी अब हम बेटी की तनख़्वाह उठायेंगे और दामाद से घूस वसूलकर उससे अपनी दूसरी बेटी का ब्याह करेंगे। यही कहना चाहती हो ना तुम?” 

कांता समझाते हुए बोली, “इसमें चौंकने की क्या बात है? इसे आसानी से लो। हमने बेटी में भर्ती लगाई है, विवाह के इतने सालों बाद तक उसे पाला पोसा है। उसके बच्चों की भी परवरिश की है। अपना सब कुछ हम उसी पर लुटा दें क्या?” 

पारसनाथ बाबू संशकित स्वर में बोले, “अगर साहबों तक ये बात पहुँच गयी और कल ये बात खुल गयी तब तो मारे शर्म के मैं जीते जी मर जाऊँगा। क्या मैं अपनी बेटी से नज़रें मिला सकूँगा?” 

कांता देवी दृढ़ स्वर में बोली, “ऐसा क्यों कहते हो? मैं भी तो उसकी माँ हूँ। क्या मैं उससे नज़रें नहीं मिलाऊँगी? और साहबों तक ये बात कैसे पहुँचेगी? अगर कल को ये बात खुल भी गयी तो मैं सबसे निपट लूँगी। आख़िर बब्लरानी को अपने ससुराल से कुछ न कुछ तो हासिल करना ही चाहिये।” 

पारसनाथ बाबू प्रार्थना के स्वर में गिड़गिड़ाते हुए बोले, “क्यों मेरा लोक-परलोक बिगाड़ने पर तुली हो।” 

कांता देवी शान्त स्वर में बोली, “तुम्हें कुछ नहीं करना है, सब कुछ तो मैं करूँगी।” 

पारसनाथ बाबू ने शंकित स्वर में पूछा, “क्या करोगी तुम?” 

कांता देवी ने कहा, “उससे तुमको कोई मतलब नहीं, तुम बस इस मामले में कोई भी हाँ-ना मत करना, बिल्कुल चुप रहना। तुम्हें किसी को कोई जवाब नहीं देना है, वो सब मेरा सरदर्द है। कल मैंने समधी को बुलवाया है। भगवान के वास्ते तुम कल चुप रहना या घर से कहीं चले जाना।” 

काफ़ी देर तक ये शास्त्रार्थ चलता रहा, हालाँकि कुछ समय पश्चात् कांता देवी ही बोलती गयीं और पारसनाथ बाबू सर झुकाकर हाँ हूँ करते रहे। 

अंततः खीझकर पारसनाथ बाबू कमरे से जाने लगे तो कांता देवी बोलीं, “तो क्या फ़ैसला है तुम्हारा?” 

पारसनाथ बाबू चुप रह गये। 

कांता देवी ने माहौल को हल्का करते हुए कहा, “आज ही बिस्कुट नमकीन वग़ैरह लाकर रख दो। कल समधी आएँगे।” 

पारसनाथ बाबू सुस्त स्वर में बोले, “ठीक है।” 

कांता देवी ने फिर प्रश्न किया, “तो बताया कुछ नहीं तुमने अपने फ़ैसले के बारे में?” पारसनाथ बाबू ने दुलारी देवी को वक्र दृष्टि से देखा, दाँत पीसते हुए और कुछ बड़बड़ाते हुए कमरे से बाहर निकल गये। दुलारी देवी के होंठों पर मुस्कान आ गयी। वे जानती थी कि जब पारसनाथ बाबू मन ही मन घुटने लगते हैं, तो उनकी बातों का प्रतिरोध नहीं कर पाते। कान्ता देवी यें बात भी बख़ूबी जानती थीं कि दिन-ब-दिन पारसनाथ बाबू का प्रतिरोध क्षीण पड़ता जायेगा, क्योंकि आने वाले दिनों में वो अपने हमले तेज़ जो करने वाली थीं। 

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