आठवें आयोग की आठ कलाएँ

15-07-2026

आठवें आयोग की आठ कलाएँ

दिलीप कुमार (अंक: 301, जुलाई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

हिंदी बेल्ट में आठवें नम्बर को जीवन में बहुत बड़ा महत्त्व दिया जाता है। मसलन कुछ उच्च पदों पर आसीन लोगों का कुछ लोग नवीं फ़ेल कहकर मज़ाक उड़ाते रहते हैं जो कि ठीक बात नहीं है। वह लोग आठवीं पास भी तो हैं। यह क्या मामूली बात है? आठ नम्बर हमारे यहाँ एक महत्त्वपूर्ण एवं निर्णायक नंबर माना जाता है। महाभारत में गंगापुत्र भीष्म भी अपने पिता की आठवीं संतान थे। उनके बाक़ी सात भाई तो जीवित ना रह सके मगर उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त हुआ था। इसी तरह भगवान श्रीकृष्ण भी अपने माता-पिता की आठवीं संतान थे। वह भी सकुशल एवं निर्बाध रहे जबकि उनके अन्य भाई जी नहीं सके। आठ की महिमा अपरंपार है। पर आजकल तो आठवें वेतन आयोग की चर्चा ज़ोरों पर है। जहाँ छठवें वेतन आयोग के भारी-भरकम एरियर ने लोगों की ज़िन्दगी बदल दी थी। उस दौर में एरियर के बदौलत सरकारी कर्मियों ने कारें, प्लाट और मकान इतने ख़रीदे कि जीडीपी में उछाल आ गया था। लोग सातवें वेतन आयोग से ही ऐसे उम्मीद लगाए बैठे थे मगर छठवें से अलहदा सातवें वेतन आयोग को सरकार ने समय से लागू कर दिया तो लोगों को ज़्यादा एरियर नहीं मिल सका। सो अब लोगों की उम्मीदें आठवें वेतन आयोग पर टिकी हैं। देश में क्रिकेट के बाद सबसे ज़्यादा चर्चित विषय फ़िटमेंट फ़ैक्टर है। हर बंदा अपनी-अपनी कैल्कुलेशन करने बैठा है कि उसे कितना मिलना है और उसके कितने सपने इससे पूरे होंगे। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जब से आठवें वेतन आयोग के गठन की घोषणा हुई है तब से ही सरकारी कर्मचारियों की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। आमतौर पर सरकारी कर्मचारी अपने काम के वर्कलोड से काफ़ी नाख़ुश रहा करते हैं उनके भी मन में ख़ुशी ने आख़िरकार दस्तक दी। जबकि सरकारी कर्मियों के घरवालों के तो मन में लडडू फूटने लगे हैं। एकाउंट्स वाले अंसारी साहब जिनकी आवाज़ बहुत कम सुनने को मिला करती थी। क्योंकि पहली बात तो अपने काम के वर्कलोड से गुमसुम रहा करते थे, और अगर नाख़ुश नहीं होते थे तो गुटखा की पीक को मुँह में भरे रहते थे जिससे उनके चेहरे के मनोभाव पता नहीं लग पाते थे। वो हज़रात आजकल ख़ुशी से गुनगुनाते रहते हैं। वह आठवें वेतन आयोग से जुड़ी सोशल मीडिया की हर पोस्ट और रील देखा करते हैं और कोई भी नया अपडेट होने पर चहकते हुए लोगों को ख़ुश-मिज़ाजी से मोबाइल खोल कर दिखाते और फिर जोड़–गाँठ कर बताते, “भाईजान मेरे हिसाब से तो 34 परसेंट इंक्रीमेंट पक्का है। अगर इंफ़्लेशन इंडेक्स को सरकार ने ठीक से कंसीडर किया तो यह बढ़त 44-45 परसेंट तक भी हो सकती है।” उनकी बात पर विभाग के लोगों को संशय होता तो कोई गूगल करता तो कोई एआई से पूछता। गुप्ता जी का तो यह प्रिय शग़ल बन गया था। वह रोज़ ऑफ़िस में आकर मोबाइल में ऊँची आवाज़ में हैंडफ्री करके एआई से पूछते कि “आठवें वेतन आयोग के लागू होने से सरकारी कर्मचारियों की सेलरी कितने परसेंट बढ़ेगी?”

एआई से उनको जैसे ही उनको मनपसंद उत्तर मिलते वैसे ही उनकी बाँछें खिल जातीं। उनकी इस बाल-सुलभ क्रीड़ा पर दफ़्तर के लोग मंद–मंद मुस्कुराते। मिस गुलाटी ने अपनी शादी की डेट को आगे बढ़ा दिया है ताकि वो नये वेतन आयोग की बढ़ी हुई आमदनी से सिंगापुर की बजाय स्विटज़रलैंड में अपना हनीमून मना सकें। जहाँ आठवें वेतन आयोग की प्रस्तावित आमदनी के इजाफ़े की उम्मीद ने सरकारी लोगों की ख़ुशियों को बढ़ा दिया है, वहीं दूसरी ओर समाज के कुछ लोग इसे बात से काफ़ी खुन्नस खाये बैठे हैं। मिसेज श्रीवास्तव, जो दिनभर अपनी बालकनी में बैठकर दूसरों के घरों की ख़ुशियाँ और ग़म ताड़ने की निशुल्क सेवा किया करती थीं। वह दूसरों के घरों की सूचनाओं को निकाल कर उसमें तीन-तेरह करके फिर पूरे महल्ले में बाँट दिया करती थीं। वह अपने महल्ले के तीन पड़ोसियों से आजकल जली-भुनी रहती हैं, क्योंकि वो तीनों सरकारी थे। उनकी वेतन बढ़ने की ख़बरों से उन्हें बेहद नाराज़गी थी। अक़्सर वह अपनी बालकनी में बबडबड़ाती रहती, “सरकारी कर्मचारियों को तो पहले से ही सेलरी काफ़ी ज़्यादा थी। सरकार बेवजह फिर इनकी सेलरी बढ़ा रही है। ऐसे तो इन्हें कम काम करने और ज़्यादा सेलरी लेने की आदत पड़ जायेगी।”

वहीं ट्रांसपोर्ट कंपनी चलाने वाले और जीएसटी चोरी का मुक़दमा झेल रहे शुक्ला जी की भी इस मसले पर कमोबेश ऐसी ही राय बन गई थी। वह भी अक़्सर दाँत पीसते हुए कहते “सारी मौज तो सरकारी लोगों की है। हम तो बस टैक्स भरने के लिए पैदा हुए है।”

इस सबके इतर सरकारी कर्मचारियों के घर का माहौल तो और भी मौजू हो चला है। सिंह साहब का लड़का हर दिन अपने घर वालों को ताकीद करता है कि “अब मैं साठ–सत्तर हज़ार की स्कूटी से नहीं बल्कि बल्कि साढ़े तीन लाख की स्पोर्टस बाईक से कॉलेज जाऊँगा।” मिसेज सिंह ने तो अभी से से ही ख़र्चों की एक लंबी लिस्ट बनानी शुरू कर दी थी। उन्होंने ड्राइंग रूम की दीवारों पर लगी सभी तस्वीरों को उतार दिया है और उस पर उन्होंने होम थियेटर लगवाने की बात फ़ाइनल कर दी है। पूरा किचन मॉड्यूलर और ऑटोमैटिक तो हर हाल में होगा ही। महल्ले में जो मिसेज सक्सेना रहती है वह अब अक़्सर इतराते हुए बताती है कि ” मॉर्निंग वाक करने से कोई ख़ास फ़ायदा नहीं है। इससे वज़न बहुत मामूली ही घटता है मेरे हसबैंड ने कहा है कि जैसे ही वेतन आयोग का एरियर आयेगा वो मेरा लाइपोसक्सन करवा देंगे। इससे बॉडी का सारा एक्स्ट्रा फैट निकल जाता है।” उनकी बात सुन कर उनके साथ मॉर्निंग वाक करने वाली महिलाएँ जल–भुन जातीं और कलप कर पीठ पीछे कहतीं कि “इनके कोई बाल बच्चा तो है नहीं सो अपने फ़िगर को सुधारने के लिए जी भर के ख़र्च कर लें। हमें तो अपने बच्चों की बेहतरी पर ख़र्च करना है।” बच्चों ने अपनी बेहतरी की बात सुनी तो उन्होंने भी प्ले स्टेशन से लेकर हिल स्टेशन तक सपने बुनने शुरू कर दिये।

दफ़्तर का माहौल ख़ासा दिलचस्प हो चला है। दफ़्तर में जो बॉस नामक प्राणी है जिसके हाथ में वार्षिक इंक्रीमेंट और बोनस नाम का रामबाण होता है। इसीके डर से सारे अधीनस्थ उससे साल भर डरे-डरे रहते है। बॉस नामक प्राणी भी परेशान है कि वेतन आयोग की वजह से उसके अधीनस्थों की सेलरी तो बढ़ जायेगी मगर इस सब में उनका कोई रोल नहीं होगा। सो वह हितोपदेशक की तरह जब-तब समझाते रहते हैं कि “देखो, सरकार वेतन बढ़ रहा है तो सरकार हमसे उम्मीद करती है कि हमें अपनी परफॉर्मेंस भी बढ़ानी चाहिएँ। अब सब लोग समय से ऑफ़िस आयें-जाएँ और काम और भी तेज़ी से किया करें।”

ऑफ़िस के लोग मन ही मन सोच रहे थे, “ये तो वही बात हो गई कि वेतन की बढ़त अभी लागू नहीं हुई मगर साहब के ताने-उलाहने पहले से ही लागू हो गये।”

सोशल मीडिया पर तो इस मसले पर मीम्स की बाढ़ आयी हुई है। कितना वेतन बढ़ेगा इसका अभी पता नहीं मगर उसपे मीम इंडस्ट्री ने पहले ही फलना-फूलना शुरू कर दिया। एक मीम तो ख़ासा वायरल हो गया, जिसमें एक सरकारी कर्मचारी को एक आराम कुर्सी पर एसी के नीचे सोते हुए दिखाया गया है और उसके नीचे कैप्शन में लिखा है “जनता में महँगाई से शोक, पर इनकी तो हर हाल में है मौज।” 

वेतन आयोग सिर्फ़ आमदनी में वृद्धि ही नहीं, बल्कि सामाजिक भूचाल भी लाता है। सरकारी कर्मचारी इस घोषणा के बाद ख़ुद अजीब असमंजस में है। एक तरफ़ तो कुछ लोगों की भड़ास, तो दूसरी ओर परिवार के असीमित सपने। वेतन आयोग जहाँ कर्मचारियों के जीवन में कुछ आर्थिक तसल्ली लाता है। वहीं समाज और पड़ोसी इसे जलन और कटाक्ष की नज़रों से भी देखते है। सबका अपना-अपना नज़रिया है। लेकिन सरकारी कर्मचारी का जीवन इन्हीं सपनों 'तानों' और ज़रूरी 'ख़र्चों' के गुणा-भाग के बीच झूलता रहता है। 

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