वेद नहीं, वेदना पढ़ो

01-02-2026

वेद नहीं, वेदना पढ़ो

डॉ. प्रियंका सौरभ (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

वेदों की चर्चा बहुत, मंचों पर दिन-रात। 
भूखे की पीड़ा पढ़ो, समझो हुआ प्रभात॥
 
ग्रंथों से ऊँची हुई, भाषण की हर शान। 
रोती आँखें पूछतीं, छुपा कहाँ भगवान॥
 
धर्मसभा में भीड़ है, शब्दों का व्यापार। 
दर्द समझने की कला, हुई आज लाचार॥
 
मूर्ति आगे हाथ हैं, पीछे बंदे मौन। 
आँसू पढ़ना सीख ले, ऐसा सच्चा कौन॥
 
ढोल ज्ञान का है बजा, क्या टीवी-अख़बार। 
मज़दूरों की साँस पर, चुप हैं सब दरबार॥
 
शास्त्रों से सत्ता बनी, नीति बनी पहचान। 
पर पीड़ा की भावना, खो बैठा इंसान॥
 
हुए धर्म के रंग कई, जाति-ध्वज-व्यवहार। 
करुणा न रही अगर तो, सब है व्यर्थ विचार॥
 
वेद पढ़े, उपदेश दिए, मंच रहे गुलज़ार। 
दुख की भाषा जो न पढ़े, वो कैसा संस्कार॥
 
संविधान, ग्रंथ, नीति सब, रखे गए तरतीब। 
पर मानव की वेदना, रह गई क्यों ग़रीब॥
 
ईश्वर खोजे हर जगह, पत्थर, ग्रंथ, दुकान। 
जिसने पढ़ ली वेदना, वह सच्चा इंसान॥

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