उन दिनों ये शहर...

13-04-2015

उन दिनों ये शहर...

सुशील यादव

उन दिनों ये शहर बेतरतीब हुआ करता था
मगर दिल के बहुत, करीब हुआ करता था

यूँ लगता था, तुझे छू के बस आई हो हवा
मेरे बियाबान का ये नसीब हुआ करता था

छीन कर मेरी परछाई, मुझसे बिछड़ने वाले
‘तमस’, तेरे वजूद का रक़ीब हुआ करता था

मेरे माँगने से वो मुझको देता भी क्या
मेरा ख़ुदा, मेरी तरह, ग़रीब हुआ करता था

0 Comments

Leave a Comment

लेखक की अन्य कृतियाँ

दोहे
हास्य-व्यंग्य आलेख/कहानी
ग़ज़ल
कविता
नज़्म
विडियो
ऑडियो