जेल की सलाखों के पीछे नईम को वह दिन याद आया जब सलीम ने उसे अपने धंधे में हाथ बँटाने को कहा था। जब उसने सलीम से थोड़ा खुलकर बताने को कहा तो उसके माथे पर ठंडे मौसम में भी पसीना आ गया। उसने सलीम को समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन सलीम तो शायद कई वर्षों से आतंकियों का मुलाज़िम था। ख़ैर, जब नईम ने उसे थोड़ा कड़क होकर आतंकवाद से दूर रहने के लिए कहा तो उसने उलटे नईम को अपनी 'ना' की सज़ा भुगतने की धमकी दी। 

बहरहाल, वक़्त बीतता रहा और नईम को उसके बाद कभी सलीम नहीं मिला। दो वर्ष बीत चुके थे कि तभी एक दिन पुलिस सलीम के घर आ धमकी और उसे पकड़ कर थाने ले गई। थाने में उसे एक कोने में हथकड़ी में बँधा सलीम बैठा नज़र आया। कुछ देर बाद उसे बताया गया कि सलीम ने पुलिस को बताया था कि नईम भी आतंकवादी गतिविधियों में उसकी मदद करता था। 

नईम को अब सिर्फ एक ही पछतावा था कि उसने सलीम के आतंकी होने की सूचना पुलिस को उसी दिन क्यों नहीं दी जब उसने उसे अपने धंधे में शामिल होने को कहा था।

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